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                <title>Minimum Support Price - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>आजादी के 79 साल: और आम आदमी का सपना</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal">15<span lang="hi" xml:lang="hi">  अगस्त </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi">  केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं थी। वह भारत के इतिहास का वह क्षण था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब सदियों की गुलामी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलिदान और अनगिनत सपनों के बाद देश ने स्वतंत्रता की सांस ली थी। आजादी के आंदोलन में शामिल लोगों ने केवल विदेशी शासन से मुक्ति का सपना नहीं देखा था। उनके सपने में ऐसा भारत था जहां नागरिक सम्मान के साथ जी सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां भूख और गरीबी मजबूरी न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां शिक्षा हर बच्चे तक पहुंचे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां न्याय पैसे और प्रभाव का मोहताज न हो और जहां लोकतंत्र में आम आदमी</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/186149/79-years-of-independence-and-the-dream-of-the-common"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/hindi-divas13.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal">15<span lang="hi" xml:lang="hi"> अगस्त </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं थी। वह भारत के इतिहास का वह क्षण था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब सदियों की गुलामी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघर्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बलिदान और अनगिनत सपनों के बाद देश ने स्वतंत्रता की सांस ली थी। आजादी के आंदोलन में शामिल लोगों ने केवल विदेशी शासन से मुक्ति का सपना नहीं देखा था। उनके सपने में ऐसा भारत था जहां नागरिक सम्मान के साथ जी सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां भूख और गरीबी मजबूरी न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां शिक्षा हर बच्चे तक पहुंचे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां न्याय पैसे और प्रभाव का मोहताज न हो और जहां लोकतंत्र में आम आदमी की आवाज सबसे महत्वपूर्ण हो।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज हम स्वतंत्रता के </span>79<span lang="hi" xml:lang="hi">वें वर्ष में हैं। भारत ने इन दशकों में लंबी यात्रा तय की है। देश ने विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरिक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनियादी ढांचे और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। भारत आज दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और वैश्विक स्तर पर उसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इस उपलब्धि के बीच एक बुनियादी सवाल आज भी खड़ा है—क्या वह आम आदमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके नाम पर लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था खड़ी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तव में उतना स्वतंत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी पा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका सपना स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था</span>? 1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> में भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता मिली। संविधान ने नागरिकों को समानता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता और न्याय के अधिकार दिए। हर वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार मिला। यह अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि थी। लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता की चुनौती सामने आई। किसी गरीब परिवार का बच्चा अगर अच्छी शिक्षा नहीं पा सकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी युवा को अपनी योग्यता के बावजूद रोजगार के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है या किसी गरीब व्यक्ति को इलाज के लिए अपनी जमीन और संपत्ति तक बेचनी पड़ती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सवाल उठता है कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ उसके जीवन में कितना उतर पाया है। आजादी का मतलब केवल यह नहीं कि देश पर विदेशी शासन न हो। वास्तविक आजादी का अर्थ यह भी है कि नागरिक भय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी और अन्याय से मुक्त होकर अपना जीवन चुन सके। यह स्वीकार करना होगा कि भारत ने </span>79<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों में अभूतपूर्व विकास किया है। गांवों तक सड़कें पहुंची हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली और संचार का विस्तार हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल तकनीक ने आम नागरिक के जीवन को बदला है और करोड़ों लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिला है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन विकास का दूसरा चेहरा भी है। एक तरफ आधुनिक शहर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊंची इमारतें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक्सप्रेसवे और डिजिटल अर्थव्यवस्था है तो दूसरी तरफ ऐसे परिवार भी हैं जिनके लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना आज भी चुनौती है। विकास का मूल्यांकन केवल बड़े प्रोजेक्टों से नहीं होना चाहिए। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि देश का सबसे कमजोर नागरिक कितना बेहतर जीवन जी रहा है। अगर आर्थिक विकास बढ़ता है लेकिन अवसर कुछ वर्गों तक सीमित रह जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो विकास की गति के साथ सामाजिक असमानता भी बढ़ सकती है। इसलिए आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती विकास को अधिक समावेशी बनाना है। भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। युवा आबादी देश की सबसे बड़ी ताकत हो सकती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसके लिए पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार जरूरी है। आज लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों लगा देते हैं। कई नौकरियों के लिए लाखों आवेदन आते हैं जबकि पदों की संख्या सीमित होती है। दूसरी ओर निजी क्षेत्र में भी रोजगार के स्वरूप तेजी से बदल रहे हैं। तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार ने रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ पारंपरिक कामों के भविष्य को लेकर चिंता भी बढ़ी है। इसलिए केवल रोजगार की संख्या नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि रोजगार की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है। ऐसा रोजगार चाहिए जिससे युवा सम्मानपूर्वक अपना भविष्य बना सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवार चला सके और अपनी आकांक्षाओं को पूरा कर सके। स्वतंत्र भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में लंबी दूरी तय की है। स्कूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलेज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वविद्यालय और तकनीकी संस्थानों का विस्तार हुआ है। लेकिन शिक्षा में गुणवत्ता और अवसर की समानता आज भी बड़ी चुनौती है। एक संपन्न परिवार का बच्चा महंगे स्कूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोचिंग और डिजिटल संसाधनों का लाभ उठा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि गरीब परिवार का बच्चा कई बार मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करता है। आजादी का सपना तभी पूरा होगा जब किसी बच्चे का भविष्य उसके माता-पिता की आर्थिक स्थिति से तय न हो। शिक्षा केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं है। यह नागरिक को अपने अधिकार समझने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सवाल पूछने और सही-गलत में अंतर करने की क्षमता देती है। इसलिए शिक्षा में निवेश वास्तव में लोकतंत्र में निवेश है। भारत की अर्थव्यवस्था और समाज में किसान की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। कृषि में तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिंचाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाजार और सरकारी सहायता के विस्तार से किसानों के जीवन में कई बदलाव आए हैं। फिर भी खेती आज भी जोखिम से भरा व्यवसाय है। मौसम की अनिश्चितता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लागत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाजार मूल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्ज और भंडारण जैसी समस्याएं किसान के सामने बनी रहती हैं। किसान की वास्तविक स्वतंत्रता तभी होगी जब उसे अपनी मेहनत का उचित मूल्य मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राकृतिक आपदा में प्रभावी सुरक्षा मिले और खेती आर्थिक रूप से टिकाऊ व्यवसाय बन सके।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसान को केवल चुनावी भाषणों में सम्मान देने के बजाय उसकी आय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा और भविष्य पर गंभीरता से काम करना होगा। लोकतंत्र में नागरिक का सबसे बड़ा भरोसा न्याय व्यवस्था पर होता है। संविधान ने नागरिकों को अधिकार दिए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन अधिकारों की रक्षा तभी संभव है जब न्याय समय पर मिले।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लंबित मुकदमे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगी कानूनी प्रक्रिया और वर्षों तक चलने वाली अदालती लड़ाई आम नागरिक के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। किसी निर्दोष व्यक्ति के लिए वर्षों तक मुकदमा झेलना भी एक प्रकार की पीड़ा है। किसी पीड़ित के लिए वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करना भी न्याय व्यवस्था की परीक्षा है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए न्याय केवल अदालत का फैसला नहीं है। न्याय का वास्तविक अर्थ है—समय पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्पक्ष और सुलभ न्याय। भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में लोकतंत्र का लगातार कायम रहना शामिल है। सत्ता परिवर्तन चुनावों के माध्यम से होता रहा है। जनता सरकारों को चुनती और बदलती रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन लोकतंत्र की गुणवत्ता केवल चुनाव कराने से तय नहीं होती। लोकतंत्र में संवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असहमति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब राजनीतिक बहस जनता के वास्तविक मुद्दों से हटकर केवल आरोप-प्रत्यारोप में बदल जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब आम नागरिक के सवाल पीछे छूट जाते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">जनता को रोजगार चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेहतर शिक्षा चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षित सड़कें चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसानों को बेहतर बाजार चाहिए और युवाओं को अवसर चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीति का केंद्र यदि इन सवालों से हट जाता है तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है। किसी भी समाज की प्रगति का वास्तविक मूल्यांकन उसकी महिलाओं की स्थिति से किया जा सकता है। भारत में महिलाओं ने शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग और सेना सहित लगभग हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित की है। लेकिन सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समान अवसर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक भेदभाव से जुड़े सवाल अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक महिला तभी वास्तव में स्वतंत्र है जब वह बिना भय के घर से बाहर निकल सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी शिक्षा और करियर का फैसला स्वयं कर सके और समाज में उसे समान सम्मान मिले। इसलिए महिलाओं की स्वतंत्रता को केवल कानूनों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। सामाजिक सोच में बदलाव भी उतना ही जरूरी है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज का भारत डिजिटल भारत भी है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने सूचना तक पहुंच को आसान बनाया है। नागरिक सरकार की अनेक सेवाएं ऑनलाइन प्राप्त कर सकता है। डिजिटल भुगतान ने आर्थिक व्यवहार का तरीका बदल दिया है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन डिजिटल युग ने नई चुनौतियां भी पैदा की हैं।साइबर अपराध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऑनलाइन धोखाधड़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फर्जी खबरें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निजता और डिजिटल साक्षरता जैसे सवाल लगातार महत्वपूर्ण हो रहे हैं। आज नागरिक को केवल राजनीतिक और सामाजिक रूप से ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल रूप से भी जागरूक होना पड़ेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">असली आजादी किसे कहेंगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">आखिर आजादी का अर्थ क्या है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या केवल विदेशी शासन से मुक्ति आजादी है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">निश्चित रूप से नहीं। आजादी का अर्थ है—भय से मुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूख से मुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अशिक्षा से मुक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अन्याय से मुक्ति और अवसरों की असमानता से मुक्ति। एक गरीब व्यक्ति यदि अपनी मेहनत से आगे बढ़ सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक युवा अपनी योग्यता के आधार पर रोजगार पा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक किसान अपनी फसल का उचित मूल्य प्राप्त कर सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक महिला सुरक्षित होकर अपने निर्णय ले सकती है और एक नागरिक बिना भय के सरकार से सवाल पूछ सकता है—तभी लोकतांत्रिक आजादी का अर्थ वास्तविक जीवन में दिखाई देगा। भारत ने </span>1947 <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">तक लंबी यात्रा तय की है। इसलिए केवल कमियों की चर्चा करना भी उचित नहीं होगा। देश ने अनेक क्षेत्रों में असाधारण उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन उपलब्धियां मंजिल नहीं होतीं। वे अगली मंजिल की नींव होती हैं। आजादी की </span>79<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं वर्षगांठ हमें उत्सव के साथ आत्ममंथन का अवसर भी देती है। हमें यह पूछना चाहिए कि अगले कुछ वर्षों में भारत को कैसा बनाना है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 21:39:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अजय यादव]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मोदी सरकार में वो समस्याएं जो अभी तक नहीं सुधरीं</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181929/those-problems-which-have-not-been-improved-yet-in-modi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और अनौपचारिक क्षेत्र की अस्थिरता।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि बेरोजगारी को कम करने के लिए सरकार ने बहुत प्रयास किए हैं लेकिन अभी कई प्रयास करने वाकी हैं। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि बेरोज़गारी दर 2017 के मुकाबले घटी है। लेकिन हकीकत में समस्या की प्रकृति बदली है। गुणवत्तापूर्ण रोज़गार की कमी भारतीयों को खल रही है। हर साल 1.2 करोड़ युवा श्रम बाजार में आते हैं, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में वेतन बढ़ोतरी धीमी है। आईटी और स्टार्टअप में छंटनी ने मिडिल क्लास की चिंता बढ़ाई है। अनौपचारिक क्षेत्र पर असर: नोटबंदी, GST और कोविड के बाद छोटे दुकानदार, ठेले वाले और दिहाड़ी मजदूर पूरी तरह उभर नहीं पाए। CMIE और NSSO के सर्वे बताते हैं कि स्वरोज़गार बढ़ा है, लेकिन ये ज़्यादातर मजबूरी का स्वरोज़गार है। कृषि संकट और किसान की आय के लिए बहुत समय से बात चल रही है लेकिन अभी तक इस पर कोई ठोस नीति नहीं बन सकी है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />2016 में सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। 2026 तक वो लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। MSP की सीमित पहुंच : सिर्फ गेहूं-धान के किसान ही MSP का फायदा ले पाते हैं। दाल, तिलहन, फल-सब्जी वाले किसान मंडी के भाव पर निर्भर हैं। कर्ज और जलवायु जोखिम: को लेकर किसान हमेशा से परेशान रहा है। फसल बीमा योजना ने कुछ राहत दी, लेकिन अतिवृष्टि, सूखा और आवारा पशु की समस्या बनी हुई है। तीन कृषि कानूनों के विरोध के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई और बड़े कृषि सुधार रुके हुए हैं।<br />              शिक्षा और स्वास्थ्य में गुणवत्ता का अंतर</p>
<p style="text-align:justify;"><br />शिक्षा: NEP 2020 ने ढांचा बदला, लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, ड्रॉपआउट रेट और लर्निंग आउटकम अब भी कमजोर हैं। ASER रिपोर्ट लगातार बताती है कि कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाता। इसी तरह स्वास्थ्य: आयुष्मान भारत ने कवरेज बढ़ाया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर, नर्स और दवाओं की कमी है। निजी अस्पताल महंगे हैं, और आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च भारत में अब भी GDP का 50% से ज्यादा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />महंगाई का मध्यम वर्ग पर दबाव बहुत बढ़ता जा रहा है। तेल, सब्जी, दाल और किराये की कीमतों में उछाल ने मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। सरकार ने टैक्स स्लैब बदले, लेकिन प्रत्यक्ष कर का बोझ अब भी वेतनभोगी वर्ग पर ज्यादा है।  <br />कोर महंगाई भले नियंत्रण में रही हो, लेकिन खाद्य महंगाई 2022-2024 में दो बार 10% पार कर गई। RBI के बार-बार रेपो रेट बढ़ाने से EMI बढ़ी और घर खरीदना मुश्किल हुआ। नौकरशाही और भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हो रहीं हैं। DBT और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बिचौलियों को कम किया, लेकिन ज़मीन-रजिस्ट्री, पुलिस, म्यूनिसिपल सर्विस में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ। विपक्ष का आरोप है कि ED, CBI जैसी एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल बढ़ा है। वहीं सरकार कहती है कि भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हो रही है। नतीजा ये है कि आम आदमी का भरोसा सिस्टम पर आंशिक ही बहाल हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />सामाजिक ध्रुवीकरण और संवाद की कमी पिछले 12 साल में धार्मिक और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय बहस में हावी रहे। इससे विकास और रोज़गार जैसे मुद्दे कई बार बैकसीट पर चले गए। मीडिया और सिविल सोसाइटी का स्पेस सिकुड़ने की शिकायत विपक्ष और पत्रकार संगठनों से आती रही है। सरकार का पक्ष है कि फेक न्यूज़ और अस्थिरता रोकने के लिए नियम जरूरी हैं। राज्य-केंद्र संबंध और संघीय ढांचा<br />GST लागू होने के बाद राज्यों को मुआवज़ा देने का वादा 2022 में खत्म हो गया। अब कई राज्य कहते हैं कि उनका फिस्कल स्पेस सिकुड़ गया है।  केंद्रीय योजनाओं के नाम पर राज्यों की भूमिका सीमित हो गई है, जिससे संघीय संतुलन पर सवाल उठते हैं।  सुधार हुआ, पर असमान गति से मोदी सरकार ने बुनियादी सुविधाओं, डिजिटल ट्रांजैक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर में ठोस काम किया है। उज्ज्वला, जनधन, सड़क, रेल और UPI इसका उदाहरण हैं। लेकिन रोज़गार की गुणवत्ता, कृषि आय, शिक्षा-स्वास्थ्य की ग्राउंड लेवल क्वालिटी, और महंगाई जैसी समस्याएं अभी भी सिस्टम की कमज़ोरी दिखाती हैं। 2026 तक सरकार की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ प्रोडक्टिविटी और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को भी तेज़ करे, ताकि ये समस्याएं चुनावी मुद्दे बनकर न रह जाएं बल्कि हल हों।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:33:44 +0530</pubDate>
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