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                <title>Malnutrition - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Malnutrition RSS Feed</description>
                
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                <title>धमकी से नहीं चलेगा पानी का रिश्ता, पाकिस्तान को आतंकवाद का हिसाब देना होगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div>पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक बार फिर भारत को सिंधु जल समझौते के मुद्दे पर धमकी देने की कोशिश की है। उनका कहना है कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी में कोई कमी करने या उसे रोकने की कोशिश हुई तो पाकिस्तान इसका मुंहतोड़ जवाब देगा। साथ ही उन्होंने कश्मीर पर पाकिस्तान के पुराने रुख को दोहराते हुए कहा कि इस मुद्दे पर उनका देश कभी पीछे नहीं हटेगा। अपने भाषण में उन्होंने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की प्रशंसा करते हुए यह दावा भी किया कि उनके नेतृत्व में पाकिस्तान ने भारत को पराजित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185260/water-relations-will-not-work-through-threats-pakistan-will-have"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1002151168.jpg" alt=""></a><br /><div>पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक बार फिर भारत को सिंधु जल समझौते के मुद्दे पर धमकी देने की कोशिश की है। उनका कहना है कि पाकिस्तान के हिस्से के पानी में कोई कमी करने या उसे रोकने की कोशिश हुई तो पाकिस्तान इसका मुंहतोड़ जवाब देगा। साथ ही उन्होंने कश्मीर पर पाकिस्तान के पुराने रुख को दोहराते हुए कहा कि इस मुद्दे पर उनका देश कभी पीछे नहीं हटेगा। अपने भाषण में उन्होंने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की प्रशंसा करते हुए यह दावा भी किया कि उनके नेतृत्व में पाकिस्तान ने भारत को पराजित किया। शहबाज शरीफ के इन बयानों से साफ है कि पाकिस्तान आज भी वास्तविकता को स्वीकार करने के बजाय धमकी, दुष्प्रचार और भावनात्मक नारों का सहारा लेकर अपनी जनता को भ्रमित करना चाहता है।</div><div><br /></div><div>सबसे बड़ा सवाल यह है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को आज अचानक सिंधु नदी का पानी इतना याद क्यों आ रहा है? क्या वे यह भूल गए हैं कि भारत ने दशकों तक एक अंतरराष्ट्रीय समझौते का सम्मान करते हुए पाकिस्तान को उसके हिस्से का पानी दिया? क्या वे यह भूल गए हैं कि भारत ने हमेशा यह माना कि पड़ोसी देशों के साथ संबंध केवल सीमा और सुरक्षा से नहीं, बल्कि मानवता, सहयोग और आपसी विश्वास से भी चलते हैं? लेकिन पाकिस्तान ने बार-बार उस विश्वास को चोट पहुंचाई है। जब पाकिस्तान की धरती से प्रशिक्षित आतंकवादी भारत में निर्दोष नागरिकों का खून बहाते हैं और उसके बाद पाकिस्तान पानी के सवाल पर भारत को धमकी देता है, तो यह उसकी दोहरी नीति का सबसे बड़ा उदाहरण बन जाता है।</div><div><br /></div><div>पहलगाम में निर्दोष पर्यटकों को निशाना बनाकर की गई आतंकवादी घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। नाम पूछकर लोगों की हत्या करने जैसी अमानवीय घटना का दर्द केवल उन परिवारों का दर्द नहीं है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया। यह पूरे भारत की पीड़ा है। किसी व्यक्ति की मौत गोली से हो, आतंकवादी हमले में हो या किसी अन्य कारण से, उसके परिवार के लिए उसका दुख समान होता है। ऐसे में पाकिस्तान यदि आतंकवादियों को संरक्षण देने के आरोपों से स्वयं को अलग नहीं करता और दूसरी तरफ भारत से पानी की मांग भी धमकी के स्वर में करता है, तो उसके रवैये पर सवाल उठना स्वाभाविक है।</div><div><br /></div><div>सिंधु जल समझौता भारत की उदारता और दूरदर्शिता का भी प्रतीक रहा है। वर्ष 1960 में हुए इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के पानी का बंटवारा निर्धारित किया गया। पूर्वी नदियों रावी, ब्यास और सतलुज के पानी के उपयोग का अधिकार भारत को मिला, जबकि पश्चिमी नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब के पानी का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। इतने वर्षों तक भारत ने इस समझौते का सम्मान किया। लेकिन परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। जब कोई देश लगातार सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप झेलता है और भारत की सुरक्षा तथा नागरिकों को निशाना बनाने वाली गतिविधियों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं करता, तो भारत के सामने अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा की समीक्षा करना स्वाभाविक है।</div><div><br /></div><div>पाकिस्तान को यह समझना होगा कि पानी कोई धमकी देकर हासिल करने वाली वस्तु नहीं है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में समझौते तभी मजबूत रहते हैं, जब उनके पीछे आपसी विश्वास और जिम्मेदारी की भावना हो। पाकिस्तान यदि भारत से अच्छे संबंध चाहता है तो उसे सबसे पहले आतंकवाद के मुद्दे पर गंभीरता दिखानी होगी। भारत के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने वालों पर कार्रवाई करनी होगी और यह भरोसा पैदा करना होगा कि पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। केवल भाषण देने और भारत को धमकाने से दोनों देशों के बीच विश्वास पैदा नहीं हो सकता।</div><div><br /></div><div>कश्मीर को लेकर भी पाकिस्तान को वास्तविकता समझने की जरूरत है। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और भारत अपनी संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए पूरी तरह सक्षम है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जितनी बार चाहें कश्मीर पर पुराने बयान दोहरा सकते हैं, लेकिन इससे जमीन पर वास्तविकता नहीं बदलेगी। कश्मीर के नाम पर दशकों तक आतंकवाद को बढ़ावा देने की नीति ने पाकिस्तान को क्या दिया, यह पाकिस्तान की आर्थिक और सामाजिक स्थिति देखकर समझा जा सकता है। यदि कश्मीर वास्तव में पाकिस्तान की चिंता का विषय है तो उसे आतंकवाद और हिंसा का रास्ता छोड़कर शांतिपूर्ण संबंधों की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।</div><div><br /></div><div>शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में चीन-पाकिस्तान दोस्ती को हिमालय से भी ऊंचा बताया। पाकिस्तान को यह समझ लेना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति भावनाओं पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों पर चलती है। चीन और पाकिस्तान के बीच भले ही रणनीतिक और आर्थिक संबंध हों, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि चीन भारत के साथ अपने व्यापक हितों को छोड़कर पाकिस्तान की हर नीति का समर्थन करेगा। चीन एक बड़ी आर्थिक शक्ति है और भारत भी विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से आगे बढ़ रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक संबंधों का महत्व पाकिस्तान से कहीं अधिक व्यापक है। इसलिए केवल चीन का नाम लेकर भारत को धमकाने की कोशिश पाकिस्तान की कमजोर रणनीति को ही उजागर करती है।</div><div><br /></div><div>पाकिस्तान को यह भी समझना चाहिए कि किसी देश की शक्ति केवल हथियारों से तय नहीं होती। आर्थिक क्षमता, तकनीकी सामर्थ्य, राजनीतिक स्थिरता, कूटनीतिक प्रभाव, मजबूत संस्थाएं और जनता का विश्वास किसी राष्ट्र की वास्तविक ताकत बनते हैं। भारत इन सभी क्षेत्रों में लगातार अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। इसके विपरीत पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद, महंगाई और जल संकट जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे समय में भारत को धमकी देने के बजाय पाकिस्तान को अपनी ऊर्जा अपने देश की समस्याओं के समाधान में लगानी चाहिए।</div><div><br /></div><div>पाकिस्तान में जल संकट गहराता जा रहा है तो उसका समाधान भारत को धमकी देना नहीं है। पाकिस्तान को अपनी सिंचाई व्यवस्था में सुधार करना होगा, पानी की बर्बादी रोकनी होगी, जल संरक्षण बढ़ाना होगा और अपने राज्यों के बीच पानी के बेहतर प्रबंधन की व्यवस्था करनी होगी। सिंध और बलूचिस्तान जैसे क्षेत्रों में पानी की कमी की शिकायतें केवल भारत के कारण नहीं समझी जा सकतीं। पाकिस्तान की आंतरिक जल प्रबंधन व्यवस्था, बढ़ती आबादी, कृषि पर दबाव और जलवायु परिवर्तन भी इसके महत्वपूर्ण कारण हैं। अपनी नाकामी का दोष भारत पर डाल देना आसान है, लेकिन इससे पाकिस्तान की समस्या हल नहीं होगी।</div><div><br /></div><div>भारत के लिए भी यह समय भावनाओं में बहने के बजाय दृढ़ और संतुलित नीति अपनाने का है। भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी चाहिए और आतंकवाद के खिलाफ अपनी नीति में किसी प्रकार की कमजोरी नहीं दिखानी चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष तथ्यों, कानून और जिम्मेदार राष्ट्र की छवि के साथ मजबूती से रखा जाए। भारत ने दुनिया को कई बार दिखाया है कि वह शांति चाहता है, लेकिन शांति को कमजोरी नहीं समझता।</div><div><br /></div><div>शहबाज शरीफ को यह याद रखना चाहिए कि धमकियों से रिश्ते नहीं सुधरते। यदि पाकिस्तान सचमुच भारत के साथ अच्छे संबंध चाहता है तो उसे पहले आतंकवाद की नीति छोड़नी होगी। भारत के नागरिकों के जीवन और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करके पाकिस्तान एक ओर आतंकवाद को बढ़ावा दे और दूसरी ओर पानी के अधिकार की दुहाई दे, यह दोहरा रवैया स्वीकार नहीं किया जा सकता।</div><div><br /></div><div>भारत ने वर्षों तक पड़ोसी होने के नाते उदारता दिखाई है। लेकिन उदारता का अर्थ कमजोरी नहीं होता। भारत शांति का पक्षधर है, पर अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता नहीं कर सकता। पाकिस्तान चाहे जितनी धमकियां दे, भारत अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेने में सक्षम है। उसे यह समझना होगा कि पानी मांगने से पहले विश्वास अर्जित करना पड़ता है और विश्वास के लिए आतंकवाद का रास्ता छोड़ना पड़ता है। पाकिस्तान यदि सच में शांति चाहता है तो उसे बंदूक, आतंकवाद और धमकी की भाषा छोड़कर बातचीत, सहयोग और जिम्मेदारी की भाषा अपनानी होगी। यही उसके लिए भी बेहतर है और पूरे उपमहाद्वीप के भविष्य के लिए भी।</div><div>         *कांतिलाल मांडोत*</div><div><br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 17:19:41 +0530</pubDate>
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                <title>भुखमरी के खिलाफ आखिर कब जंग जीतेगी दुनिया?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक विज्ञान के इस युग में मानव ने अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए विलासिता की हर छोटी-बड़ी वस्तु का आविष्कार कर लिया है और जीवन को लगातार अधिक सुविधाजनक बनाता जा रहा है। लेकिन शरीर को तंदुरुस्त रखने के लिए पेट की भूख मिटाने वाली कोई चमत्कारी गोली आज तक नहीं खोजी जा सकी है। यही कारण है कि भोजन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए मनुष्य को निरंतर कर्म करना पड़ता है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक विज्ञान के इस युग में जब हर क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब कृषि क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। वैज्ञानिक तकनीकों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181769/when-will-the-world-finally-win-the-war-against-hunger"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hunger_201910122110.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक विज्ञान के इस युग में मानव ने अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए विलासिता की हर छोटी-बड़ी वस्तु का आविष्कार कर लिया है और जीवन को लगातार अधिक सुविधाजनक बनाता जा रहा है। लेकिन शरीर को तंदुरुस्त रखने के लिए पेट की भूख मिटाने वाली कोई चमत्कारी गोली आज तक नहीं खोजी जा सकी है। यही कारण है कि भोजन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए मनुष्य को निरंतर कर्म करना पड़ता है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक विज्ञान के इस युग में जब हर क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब कृषि क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। वैज्ञानिक तकनीकों और आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने से दुनिया के अनेक देशों में फसलों की बंपर पैदावार हो रही है। इससे न केवल किसान समृद्ध हो रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि देश भी आर्थिक रूप से मजबूत बन रहे हैं। किंतु यह विडंबना ही है कि खाद्यान्न उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि के बावजूद आज भी दुनिया के कई देशों में लोग भयावह भुखमरी के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं। यह स्थिति किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक व्यथित कर देती है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार आधा दर्जन देशों में भुखमरी की स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि लोगों को एक समय का शुद्ध और पौष्टिक भोजन भी नसीब नहीं हो पा रहा है। विश्व के लगभग </span>50 <span lang="hi" xml:lang="hi">देशों में करीब </span>30 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ लोगों को एक वक्त का भोजन भी बड़ी मुश्किल से उपलब्ध हो पाता है और वे अक्सर खाली पेट रात गुजारने को विवश रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार दुनिया की लगभग </span>8.5 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत आबादी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात करीब </span>70 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ लोगों को भरपेट और पौष्टिक भोजन उपलब्ध नहीं हो पाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण कुपोषण की समस्या लगातार विकराल रूप धारण करती जा रही है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया के अधिकांश देश विकसित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकासशील और प्रगतिशील राष्ट्रों की श्रेणी में शामिल होने की होड़ में लगे हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उनके भीतर युद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिवृष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बढ़ती महंगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक असमानता और कमजोर खाद्य वितरण प्रणाली जैसी समस्याओं के कारण गरीबी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भुखमरी और कुपोषण लगातार बढ़ रहे हैं।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले भारत की स्थिति का आकलन भी वैश्विक भुखमरी सूचकांक </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">की रिपोर्ट से किया जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें </span>123 <span lang="hi" xml:lang="hi">देशों में भारत का स्थान </span>102<span lang="hi" xml:lang="hi">वां बताया गया है। यह स्थिति दर्शाती है कि देश में आज भी करोड़ों लोगों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। भारत कृषि प्रधान देश है और कृषि को उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोगों का भोजन से वंचित रहना चिंता और आत्ममंथन का विषय है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">केंद्र और राज्य सरकारें गरीब एवं वंचित वर्गों के लिए अनेक खाद्यान्न योजनाएं संचालित कर रही हैं। </span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन योजनाओं का लाभ लाखों-करोड़ों जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी यदि भुखमरी और कुपोषण की समस्या बनी हुई है तो कहीं न कहीं खाद्यान्न वितरण प्रणाली में मौजूद कमियों को दूर करने की आवश्यकता है। साथ ही समाज और नागरिकों को भी भोजन तथा अन्न की बर्बादी रोकने के लिए गंभीरता से विचार करना होगा।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोजन की बर्बादी के मामले में भारत विश्व के अग्रणी देशों में गिना जाता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में हर वर्ष </span>8 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ टन से अधिक भोजन बर्बाद हो जाता है। यदि दृढ़ इच्छाशक्ति और प्रभावी प्रबंधन के साथ इस बर्बादी को रोका जाए तो देश में कुपोषण और भुखमरी की स्थिति में काफी हद तक सुधार संभव है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व से भुखमरी समाप्त करने के लिए वैश्विक महाशक्तियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भी अपने आर्थिक और सामरिक हितों से ऊपर उठकर सोचना होगा। हथियारों के सौदों पर अरबों-खरबों डॉलर खर्च करने के बजाय विश्व शांति और खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जिन देशों में भुखमरी के हालात गंभीर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां मानवीय आधार पर खाद्यान्न और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराकर उन्हें बदहाली से उबारने का प्रयास किया जाना चाहिए।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव जाति का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि एक ओर दुनियाभर की सरकारें सुरक्षा और शांति के नाम पर हथियारों के विशाल भंडार तैयार कर रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं दूसरी ओर युद्ध और संघर्षों के कारण पर्यावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों को भारी नुकसान पहुंच रहा है। </span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परिणामस्वरूप कहीं अकाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं सूखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं बाढ़ और कहीं अन्य प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अंततः भुखमरी की समस्या को और अधिक गंभीर बना रही हैं। दुनिया के देश हथियारों के बल पर सीमाओं की जंग तो जीत सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अपने ही नागरिकों के पेट की भूख के खिलाफ लड़ाई आखिर कब जीतेंगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्रश्न आज समूचे विश्व के सामने एक यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा है। जब तक दुनिया की प्राथमिकताओं में मानव जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाद्य सुरक्षा और मानवीय संवेदनाएं सर्वोच्च स्थान प्राप्त नहीं करेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक भुखमरी के खिलाफ यह जंग अधूरी ही रहेगी।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अरविंद रावल</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Jun 2026 17:56:39 +0530</pubDate>
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