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                <title>भुखमरी - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>भुखमरी RSS Feed</description>
                
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                <title>संपादकीय पेज के लिए आलेख </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>अंतर्राष्ट्रीय दबाव बेरोजगारी असमानता से जूझती आज़ादी ! </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इन दिनों देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ का जशन मना रहा है। हुक्मरानों के आह्वान पर देश में घर घर तिरंगा फहराया गया । राजपथ से लेकर जनपथ तक रोशनी की झालर जगमगा रही हैं लेकिन इस खुशहाल भारत के पीछे एक और हकीकत भी छिपी है एक ओर अमेरिका का टेरिफ है चीन की दादागिरी है पाकिस्तान की साजिशें है और  बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता व सस्ते सुलभ न्याय से महरूम हिंदुस्तान, जिसमें आज भी  भूख है, बेगार करने और अन्याय सहने की मजबूरी है, पूंजीवाद के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185258/article-for-editorial-page"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/img_20260727_151239-(1).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>अंतर्राष्ट्रीय दबाव बेरोजगारी असमानता से जूझती आज़ादी ! </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन दिनों देश आजादी की 80वीं वर्षगांठ का जशन मना रहा है। हुक्मरानों के आह्वान पर देश में घर घर तिरंगा फहराया गया । राजपथ से लेकर जनपथ तक रोशनी की झालर जगमगा रही हैं लेकिन इस खुशहाल भारत के पीछे एक और हकीकत भी छिपी है एक ओर अमेरिका का टेरिफ है चीन की दादागिरी है पाकिस्तान की साजिशें है और  बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता व सस्ते सुलभ न्याय से महरूम हिंदुस्तान, जिसमें आज भी  भूख है, बेगार करने और अन्याय सहने की मजबूरी है, पूंजीवाद के हाथों में जकड़ती लोकतांत्रिक व्यवस्था है इन सबसे इतर नारे हैं उम्मीद हैं और इनके बीच बेरोजगारी महंगाई भ्रष्टाचार से कराहता आम आदमी और नशे अभद्रता रीलबाजी में फंसा जेनजी युवा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बेरोजगारी </div>
<div style="text-align:justify;">हालिया आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर लगभग 5.5% है, जो वैश्विक औसत (4.9%) के आसपास और कई प्रमुख जी-20 अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में स्थिर स्थिति में है, हालांकि युवाओं के बीच यह दर तुलनात्मक रूप से अधिक बनी हुई है।आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार देश में कुल बेरोजगारी दर स्थिस्थिर है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्र की दर लगभग 5.1% और शहरी क्षेत्र की दर लगभग 6.4% से 6.6% के बीच दर्ज की गई है।युवा बेरोजगारी की समस्या चुनौती बनकठभारत में 15 से 29 आयु वर्ग के युवाओं में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से अधिक (लगभग 15% से 16% के बीच) है, जो कौशल अंतराल और तकनीक-आधारित बदलावों को दर्शाती है। वैश्विक और भारतीय बाजारों में अनौपचारिक रोजगार और गुणवत्तापूर्ण पूर्णकालिक नौकरियों की उपलब्धता एक बड़ी चिंता बनी हुई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> गरीबी की अंतहीन समस्या </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में आज भी गरीबी की समस्या विकराल बनी हुई है। भारत में 20 करोड़ से भी ज्यादा लोग ऐसे हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे हैं और काफी मुश्किल से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। गरीबी से जुड़े कई ऐसे आंकड़े हैं, जो वाकई डराने वाले हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विभिन्न अंतरराष्ट्रीय और सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, भारत में अभी भी लगभग 23.4 करोड़ लोग गरीबी के स्तर पर जीवन जीने को मजबूर हैं। यह संख्या इस बात पर निर्भर करती है कि गरीबी को मापने के लिए किस मानक या पैमाने का उपयोग किया जा रहा है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक के संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे संकेतकों के आधार पर भारत में लगभग 23.4 करोड़ लोग घोर या बहुआयामी गरीबी में जी रहे हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक है।विश्व बैंक के अत्यधिक गरीबी के आंकड़े बता रहे हैं कि विश्व बैंक के मानकों ($2.15 प्रतिदिन आय) के अनुसार, भारत में अत्यधिक गरीबी में जीने वाले लोगों की संख्या घटकर लगभग 7.5 करोड़ (75 मिलियन) रह गई है। पिछले एक दशक में लगभग 26.9 से 27 करोड़ लोग इस अत्यधिक गरीबी रेखा से बाहर आए हैं। यदि उच्च स्तर यानी लगभग $4.20 प्रतिदिन के मानक को देखा जाए, तो भारत की लगभग 23.9% आबादी (करीब 34.2 करोड़ लोग) आर्थिक सुरक्षा के उस दायरे से नीचे आती है।</div>
<div style="text-align:justify;">उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल 21.92 फीसदी लोग गरीबी की रेखा से नीचे अपना जीवन यापन कर रहे हैं।अगर इनकी संख्या की बात करें तो ये संख्या है 2697.83 लाख यानी 26 करोड़ 97 लाख गरीब हैं, वहीं, इनमें ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा गरीबी होती हैं, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में गरीबी का प्रतिशत 25.70 है जबकि शहरी क्षेत्र में यह प्रतिशत 13.70 फीसदी है। वहीं, कुल गरीबों में भी 21 करोड़ के करीब गरीब सिर्फ ग्रामीण इलाकों में रहते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में 5 करोड़ गरीब लोग रहते हैं. यानी देश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का बड़ा हिस्सा गांव में रहने वाले हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अगर राज्य के हिसाब से देखें तो छोटे राज्यों में हाल ज्यादा बुरा है. जैसे दादरा और नागर हवेली में 39.31 फीसदी, झारखंड में 39.96 फीसदी, ओडिशा में 32. 59 फीसदी गरीब लोग रहते हैं. वहीं, उत्तरप्रदेश में करीब 29 और बिहार में करीब 33 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   भुखमरी </div>
<div style="text-align:justify;">नवीनतम ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2025 रिपोर्ट के अनुसार, कुल 123 देशों की सूची में भारत को 102वां स्थान मिला है। इस सूचकांक में भारत का कुल स्कोर 25.8 है, जो देश में भूख और कुपोषण की स्थिति को 'गंभीर' श्रेणी में रखता है। 123 देशों की पड़ताल में भारत का स्थान 102 वां है इस के अनुसार 25.8श्रेणी गंभीर प्रमुख स्वास्थ्य व पोषण 12.0%बाल बौनापन उम्र के हिसाब से कम लंबाई 32.9%बाल कमज़ोरी लंबाई के हिसाब से कम वजन 18.7% रिपोर्ट में दूसरी सबसे अधिक बाल मृत्यु दर 2.8% है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> भुखमरी सूचकांक वर्ष 2020 में भारत 94वें स्थान पर था।भूख और कुपोषण पर नजर रखने वाली वैश्विक भुखमरी सूचकांक की वेबसाइट के अनुसार चीन, ब्राजील और कुवैत सहित अठारह देशों ने पांच से कम के जीएचआई स्कोर के साथ अग्रिम पंक्ति में है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्ष 2020 में भारत 107 देशों में 94वें स्थान पर था। अब 116 देशों में यह 101वें स्थान पर आ गया है। जीएचआई स्कोर की गणना चार संकेतकों पर की जाती है, जिनमें अल्पपोषण, कुपोषण, बच्चों की वृद्धि दर और बाल मृत्यु दर शामिल हैं।रिपोर्ट के अनुसार, पड़ोसी देश जैसे नेपाल (76), बांग्लादेश (76), म्यांमार (71) और पाकिस्तान (92) भी भुखमरी को लेकर चिंताजनक स्थिति में हैं, लेकिन भारत की तुलना में अपने नागरिकों को भोजन उपलब्ध कराने को लेकर इन देशों ने बेहतर प्रदर्शन किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> आंकड़ों के अनुसार, भारत में में संयुक्त राष्ट्र की अनुमानित गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले 8.3 करोड़ लोग हैं।दुनिया की गरीब जनता का सबसे ज्यादा हिस्सा, 12.2 फीसदी भाग भारत और 12.2 फीसदी नाइजीरिया में है।लेकिन नाइजीरिया में 8,30,05,482 गरीबी रेखा के नीचे हैं जबकि भारत में यह संख्या 8,30,68,597 है।इन हालात में गरीबी को काबू करने की कोई सूरत अभी दूर तक दिखाई नही दे रही है। </div>
<div style="text-align:justify;">कुपोषण साल 2020 की विश्व खाद्य सुरक्षा की रिपोर्ट के अनुसार भारत में उस समय 18.92 करोड़ लोग कुपोषित थे।साल 2021 में ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट में भारत के 27.5 अंक हैं जो कि बहुत ही खराब स्थिति को दर्शाती है।एक वैश्विक पत्रिका द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट कहती है कि 10 में से 7 भारतीय पौष्टिक आहार का खर्च नहीं उठा पाते हैं।एक ओर भुखमरी, दूसरी ओर 10.4 करोड़ टन अनाज सरकारी गोदामों में सड़ने के लिए पड़ा था।</div>
<div style="text-align:justify;">   भ्रष्टाचार </div>
<div style="text-align:justify;">भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2025 में भारत 182 देशों में 91वें स्थान पर है। भारत का कुल स्कोर 39 (100 में से) है, जो पिछले वर्ष (2024 में 96वीं रैंक) की तुलना में पाँच स्थानों का सुधार दर्शाता है। यह रिपोर्ट ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी की जाती है।डेनमार्क, फिनलैंड और सिंगापुर सबसे कम भ्रष्ट देशों में शामिल हैं। भारत का प्रदर्शन (101रैंक)पाकिस्तान (136वीं रैंक), श्रीलंका (107वीं रैंक), और नेपाल (109वीं रैंक) से बेहतर है, लेकिन चीन (76वीं रैंक) और भूटान (18वीं रैंक) से पीछे है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जबकि भ्रष्टाचार अवधारणा सूचकांक 2021 में 180 देशों की सूची में भारत को 85वां स्थान मिला था ।ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ओर से जारी एक रिपोर्ट के अनुसार पिछली बार के मुकाबले भारत की रैंकिंग एक स्थान का सुधार हुआ है। हालांकि रिपोर्ट में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए गए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सार्वजनिक क्षेत्र के भ्रष्टाचार के कथित स्तरों के आधार पर 180 देशों और क्षेत्रों की रैंकिंग की सूची तैयार की जाती है।इस रैंकिंग में सौ में से 40अंक हासिल कर भारत ने 85वां स्थान दर्ज किया है। यह हालात देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को बयान करते हैं।देश के तमाम सरकारी विभागों में बिना रिशवत कोई काम होना टेड़ी खीर है। </div>
<div style="text-align:justify;">   गरीब अमीर के बीच खाई </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 (तीसरा संस्करण) पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के द्वारा जारी की गई है। यह रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के शीर्ष 10% सबसे अमीर लोगों के पास वैश्विक संपत्ति का तीन-चौथाई (लगभग 75%) हिस्सा है, जबकि सबसे निचले 50% हिस्से के पास केवल 2% संपत्ति है।भारत में शीर्ष 10% लोगों के पास राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा है, जबकि निचले 50% लोगों को केवल 15% ही मिलता है।देश के शीर्ष 1% अमीरों के पास कुल संपत्ति का लगभग 40% हिस्सा है, और शीर्ष 10% के पास करीब 65% संपत्ति है।भारत में केवल 15.7% महिलाएं नौकरी कर रही हैं, और कुल श्रम आय में उनका हिस्सा महज 20% के आसपास है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में असमानता गहराई से जड़ें जमा चुकी है, जहाँ शीर्ष 10% राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा अर्जित करते हैं और शीर्ष 1% के पास देश की कुल संपत्ति का 40% हिस्सा है। इसे महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर के 15.7% पर स्थिर बने रहने से और बढ़ावा मिलता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जलवायु असमानता के लिए सबसे धनी 10% लोग निजी पूंजी से होने वाले उत्सर्जन के 77% के लिये उत्तरदायी हैं; केवल शीर्ष 1% अकेले 41% योगदान करते हैं, जो असमान ज़िम्मेदारी और जोखिम को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;">   न्याय बना अन्याय</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश में अदालतों में न्याय के लिए लम्बी लाइन लगीं है अगली पेशी अगले साल के चलते लाखों की संख्या में वादी व पीड़ित तारीख पर चक्कर काटते हुए दुनिया से चले जाते हैं पर न्याय नहीं मिलता। स्थिति यह है कि देशभर की अदालतों में निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कुल 5.64 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित (पेंडिंग) हैं।अदालत के स्तर पर लंबित मामलों का विवरणसुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च अदालत): लगभग 96,000 से अधिक केस पेंडिंग हैं।हाई कोर्ट (उच्च न्यायालय): देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में लगभग 63.76 लाख मामले पेंडिंग हैं।जिला और अधीनस्थ अदालतें (निचली अदालतें): कुल पेंडिंग मामलों का सबसे बड़ा हिस्सा यानी करीब 4.98 करोड़ से अधिक मामले निचली अदालतों में अटके हैं, जो कुल लंबित मामलों का लगभग 85% से अधिक है।</div>
<div style="text-align:justify;">साइबर अपराध </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश में अपराध की स्थिति भी बदतर है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अंतिम उपलब्ध आंकड़े बताते हैं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की नवीनतम "क्राइम इन इंडिया" रिपोर्ट के अनुसार, पारंपरिक शारीरिक और हिंसक अपराधों में मामूली कमी दर्ज की गई है, जबकि डिजिटल व वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। देश में समग्र अपराध दर घटकर लगभग 418.9 प्रति लाख जनसंख्या पर आ गई है। विभिन्न डिजिटल और ऑनलाइन धोखाधड़ी में लगभग 17% से 18% की वृद्धि दर्ज की गई है। कुल साइबर मामलों में से लगभग 72% से अधिक का उद्देश्य वित्तीय ठगी रहा है महिलाओं के विरुद्ध मामलों में आंशिक (लगभग 1.5%) कमी आई है, जबकि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में लगभग 7.8% की वृद्धि देखी गई है। हत्या के मामलों में लगभग 2.4% की गिरावट दर्ज की गई है, हालांकि अपहरण और अन्य विवादित मामलों की संख्या में क्षेत्रीय भिन्नता बनी हुई है। वित्तीय गबन और धोखाधड़ी से जुड़े आर्थिक अपराधों में करीब 4.6% की वृद्धि हुई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय चरित्र में गिरावट </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीयों के राष्ट्रीय चरित्र में गिरावट के प्रमुख लक्षणों में अनियंत्रित भ्रष्टाचार, सार्वजनिक संपत्ति के प्रति लापरवाही, नागरिक अनुशासन का अभाव और राष्ट्रहित की तुलना में व्यक्तिगत स्वार्थ को प्राथमिकता देना शामिल है। समाज में नैतिक मूल्यों और सहिष्णुता की कमी भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कभी भारतीय लोगों का राष्ट्रीय चरित्र विविधता में एकता, सहिष्णुता, आतिथ्य-सत्कार, परिवार के प्रति अटूट जुड़ाव और कठिन परिस्थितियों में भी उच्च सहनशक्ति (लचीलेपन) पर आधारित है। यहाँ के समाज में धर्म, आध्यात्मिकता और सामूहिक जीवन की भावना गहराई तक समाई हुई है।लेकिन अब स्थिति भिन्न हो चली है। समाज में नैतिक और सामाजिक पतन की शुरुआत हो गई है। भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं बल्कि एक सामान्य और स्वीकृत बात बन गई है। लोग अपने अधिकारों के प्रति अत्यधिक जागरूक हैं, लेकिन अपने मूल कर्तव्यों को भूल रहे हैं। विभिन्न समूहों के बीच सहनशीलता घट रही है और असहिष्णुता बढ़ रही है। 'मेरा क्या फायदा' की सोच ने सामूहिक कल्याण और देशभक्ति की भावना को पीछे छोड़ दिया है।सरकारी संपत्तियों, पार्कों और धरोहरों को गंदा करना या नुकसान पहुँचाना आम हो गया है। यातायात नियमों और सामान्य कानूनों का पालन न करने को शान की बात समझा जाता है। अपराध या दुर्घटना के समय मदद करने के बजाय लोग वीडियो बनाने में व्यस्त रहते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में राजनीतिक दलों की आपसी प्रतिद्वंद्विता अब इतना बढ़ गया है कि पिछले एक दशक में देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में सबसे कम समय का उपयोग किया जाता है विपक्ष संसद को अखाड़ा बनाने पर तुला है और सत्ता धारी विपक्ष के साथ सूक्ष्मता आम सहमति बनाने में नाकाम रहे हैं। देश ने नीट पेपर लीक के मुद्दे पर हुए प्रदर्शन में जैनजी के भीतर आक्रोश को देखा वहीं जैनजी के कंधे का इस्तेमाल करने की राजनीति को भी देखा वहीं आंदोलन की आड़ में अराजकता अभद्रता असंयमित गालीबाजी को भी सहन किया। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 17:17:12 +0530</pubDate>
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                <title>भुखमरी के खिलाफ आखिर कब जंग जीतेगी दुनिया?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक विज्ञान के इस युग में मानव ने अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए विलासिता की हर छोटी-बड़ी वस्तु का आविष्कार कर लिया है और जीवन को लगातार अधिक सुविधाजनक बनाता जा रहा है। लेकिन शरीर को तंदुरुस्त रखने के लिए पेट की भूख मिटाने वाली कोई चमत्कारी गोली आज तक नहीं खोजी जा सकी है। यही कारण है कि भोजन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए मनुष्य को निरंतर कर्म करना पड़ता है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक विज्ञान के इस युग में जब हर क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब कृषि क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। वैज्ञानिक तकनीकों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181769/when-will-the-world-finally-win-the-war-against-hunger"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hunger_201910122110.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक विज्ञान के इस युग में मानव ने अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए विलासिता की हर छोटी-बड़ी वस्तु का आविष्कार कर लिया है और जीवन को लगातार अधिक सुविधाजनक बनाता जा रहा है। लेकिन शरीर को तंदुरुस्त रखने के लिए पेट की भूख मिटाने वाली कोई चमत्कारी गोली आज तक नहीं खोजी जा सकी है। यही कारण है कि भोजन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए मनुष्य को निरंतर कर्म करना पड़ता है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक विज्ञान के इस युग में जब हर क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब कृषि क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। वैज्ञानिक तकनीकों और आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने से दुनिया के अनेक देशों में फसलों की बंपर पैदावार हो रही है। इससे न केवल किसान समृद्ध हो रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि देश भी आर्थिक रूप से मजबूत बन रहे हैं। किंतु यह विडंबना ही है कि खाद्यान्न उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि के बावजूद आज भी दुनिया के कई देशों में लोग भयावह भुखमरी के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं। यह स्थिति किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक व्यथित कर देती है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार आधा दर्जन देशों में भुखमरी की स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि लोगों को एक समय का शुद्ध और पौष्टिक भोजन भी नसीब नहीं हो पा रहा है। विश्व के लगभग </span>50 <span lang="hi" xml:lang="hi">देशों में करीब </span>30 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ लोगों को एक वक्त का भोजन भी बड़ी मुश्किल से उपलब्ध हो पाता है और वे अक्सर खाली पेट रात गुजारने को विवश रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार दुनिया की लगभग </span>8.5 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत आबादी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात करीब </span>70 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ लोगों को भरपेट और पौष्टिक भोजन उपलब्ध नहीं हो पाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कारण कुपोषण की समस्या लगातार विकराल रूप धारण करती जा रही है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया के अधिकांश देश विकसित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकासशील और प्रगतिशील राष्ट्रों की श्रेणी में शामिल होने की होड़ में लगे हुए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उनके भीतर युद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अकाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अतिवृष्टि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बढ़ती महंगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक असमानता और कमजोर खाद्य वितरण प्रणाली जैसी समस्याओं के कारण गरीबी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भुखमरी और कुपोषण लगातार बढ़ रहे हैं।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले भारत की स्थिति का आकलन भी वैश्विक भुखमरी सूचकांक </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">की रिपोर्ट से किया जा सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें </span>123 <span lang="hi" xml:lang="hi">देशों में भारत का स्थान </span>102<span lang="hi" xml:lang="hi">वां बताया गया है। यह स्थिति दर्शाती है कि देश में आज भी करोड़ों लोगों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। भारत कृषि प्रधान देश है और कृषि को उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोगों का भोजन से वंचित रहना चिंता और आत्ममंथन का विषय है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">केंद्र और राज्य सरकारें गरीब एवं वंचित वर्गों के लिए अनेक खाद्यान्न योजनाएं संचालित कर रही हैं। </span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन योजनाओं का लाभ लाखों-करोड़ों जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी यदि भुखमरी और कुपोषण की समस्या बनी हुई है तो कहीं न कहीं खाद्यान्न वितरण प्रणाली में मौजूद कमियों को दूर करने की आवश्यकता है। साथ ही समाज और नागरिकों को भी भोजन तथा अन्न की बर्बादी रोकने के लिए गंभीरता से विचार करना होगा।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भोजन की बर्बादी के मामले में भारत विश्व के अग्रणी देशों में गिना जाता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में हर वर्ष </span>8 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ टन से अधिक भोजन बर्बाद हो जाता है। यदि दृढ़ इच्छाशक्ति और प्रभावी प्रबंधन के साथ इस बर्बादी को रोका जाए तो देश में कुपोषण और भुखमरी की स्थिति में काफी हद तक सुधार संभव है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व से भुखमरी समाप्त करने के लिए वैश्विक महाशक्तियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भी अपने आर्थिक और सामरिक हितों से ऊपर उठकर सोचना होगा। हथियारों के सौदों पर अरबों-खरबों डॉलर खर्च करने के बजाय विश्व शांति और खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जिन देशों में भुखमरी के हालात गंभीर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां मानवीय आधार पर खाद्यान्न और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराकर उन्हें बदहाली से उबारने का प्रयास किया जाना चाहिए।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मानव जाति का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि एक ओर दुनियाभर की सरकारें सुरक्षा और शांति के नाम पर हथियारों के विशाल भंडार तैयार कर रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं दूसरी ओर युद्ध और संघर्षों के कारण पर्यावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों को भारी नुकसान पहुंच रहा है। </span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परिणामस्वरूप कहीं अकाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं सूखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं बाढ़ और कहीं अन्य प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अंततः भुखमरी की समस्या को और अधिक गंभीर बना रही हैं। दुनिया के देश हथियारों के बल पर सीमाओं की जंग तो जीत सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अपने ही नागरिकों के पेट की भूख के खिलाफ लड़ाई आखिर कब जीतेंगे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यह प्रश्न आज समूचे विश्व के सामने एक यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा है। जब तक दुनिया की प्राथमिकताओं में मानव जीवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खाद्य सुरक्षा और मानवीय संवेदनाएं सर्वोच्च स्थान प्राप्त नहीं करेंगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक भुखमरी के खिलाफ यह जंग अधूरी ही रहेगी।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अरविंद रावल</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Jun 2026 17:56:39 +0530</pubDate>
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