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                <title>allahabad high court news - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>allahabad high court news RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>जस्टिस शेखर यादव कल होंगे रिटायर, महाभियोग प्रस्ताव होगा खत्म</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस शेखर कुमार यादव बुधवार (15 अप्रैल) को सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं, जबकि उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पिछले एक साल से अधिक समय से लंबित है। उनके रिटायर होने पर अब महाभियोग का प्रस्ताव निरर्थक (बेकार) हो जाएगा। जस्टिस यादव ने 12 दिसंबर 2019 को हाईकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी और 26 मार्च 2021 को उन्हें स्थायी न्यायाधीश बनाया गया।<br /><br /><strong>आपत्तिजनक शब्दों की खूब आलोचना हुई</strong></div>
<div style="text-align:justify;">8 दिसंबर 2024 को प्रयागराज में विश्व हिंदू परिषद के विधिक प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में "समान नागरिक संहिता की संवैधानिक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176202/justice-shekhar-yadav-will-retire-tomorrow-impeachment-motion-will-end"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1001715990.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस शेखर कुमार यादव बुधवार (15 अप्रैल) को सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं, जबकि उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पिछले एक साल से अधिक समय से लंबित है। उनके रिटायर होने पर अब महाभियोग का प्रस्ताव निरर्थक (बेकार) हो जाएगा। जस्टिस यादव ने 12 दिसंबर 2019 को हाईकोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी और 26 मार्च 2021 को उन्हें स्थायी न्यायाधीश बनाया गया।<br /><br /><strong>आपत्तिजनक शब्दों की खूब आलोचना हुई</strong></div>
<div style="text-align:justify;">8 दिसंबर 2024 को प्रयागराज में विश्व हिंदू परिषद के विधिक प्रकोष्ठ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में "समान नागरिक संहिता की संवैधानिक आवश्यकता" विषय पर व्याख्यान देते हुए जस्टिस यादव ने कहा था कि देश बहुसंख्यक समाज की इच्छाओं के अनुसार चलेगा। इस दौरान उन्होंने एक आपत्तिजनक शब्द का भी प्रयोग किया, जिसकी व्यापक आलोचना हुई। इस भाषण पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यादव से स्पष्टीकरण मांगा था। यही नहीं उनसे कहा गया था कि आप खेद प्रकट कर दीजिए, परंतु उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया था और कहा था कि उन्होंने ऐसा कुछ भी गलत नहीं बोला है।<br /><br /><strong>13 दिसंबर को महाभियोग प्रस्ताव</strong><br />इसके बाद 13 दिसंबर 2024 को उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव राज्यसभा के महासचिव को सौंपा गया, जिस पर 55 सांसदों के हस्ताक्षर थे, जो आवश्यक 50 सांसदों की संख्या से अधिक है। हालांकि यह महाभियोग प्रस्ताव अभी भी राज्यसभा में लंबित है, लेकिन इससे पहले ही जस्टिस यादव सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनके रिटायरमेंट के अवसर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में फुल कोर्ट रेफरेंस आयोजित गया है। फुल कोर्ट रेफरेंस बुधवार को चीफ जस्टिस की कोर्ट में अपराह्न 3.45 पर रखा गया है।  इसमें हाईकोर्ट के सभी जजों के अलावा बार एसोसिएशन के अधिवक्ता सदस्य तथा हाईकोर्ट रजिस्ट्री के अधिकारी शामिल होंगे। हाईकोर्ट की तरफ से सभी को शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Apr 2026 21:02:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सजा माफी और समय पूर्व रिहाई की नीति पर कोर्ट ने सरकार से मांगी जानकारी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सजा माफी और समय पूर्व रिहाई नीति पर राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी है। 25 मई को मामले की सुनवाई होगी। यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान जनहित याचिका पर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार की ओर से दाखिल अनुपालन हलफनामे में कहा गया कि सितंबर 2024 से फरवरी 2026 के बीच 3746 आवेदन आए। इनमें से 3447 विचार के लिए उठाए गए थे, 2570 आवेदन निस्तारित कर दिए गए।शेष 877 आवेदन अभी लंबित हैं, उन पर अंतिम निर्णय नहीं हो सका है।</p>
<p style="text-align:justify;">2570 निस्तारित मामलों में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176069/court-sought-information-from-the-government-on-the-policy-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सजा माफी और समय पूर्व रिहाई नीति पर राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी है। 25 मई को मामले की सुनवाई होगी। यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान जनहित याचिका पर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार की ओर से दाखिल अनुपालन हलफनामे में कहा गया कि सितंबर 2024 से फरवरी 2026 के बीच 3746 आवेदन आए। इनमें से 3447 विचार के लिए उठाए गए थे, 2570 आवेदन निस्तारित कर दिए गए।शेष 877 आवेदन अभी लंबित हैं, उन पर अंतिम निर्णय नहीं हो सका है।</p>
<p style="text-align:justify;">2570 निस्तारित मामलों में 1357 कैदियों को रिहाई दी गई है, जबकि 1213 के आवेदन खारिज कर दिए गए। इस पर कोर्ट ने राज्य सरकार को 25 मई तक विस्तृत अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का समय दिया है। पूछा है कि रिहा किए गए 1357 कैदियों के पक्ष में किन आधारों पर निर्णय लिया गया, यह स्पष्ट किया जाए। वहीं, 1213 कैदियों के खारिज आवेदन का भी बताए जाएं।।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 21:49:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दीवानी मामलों के लिए पुलिस के पास जाने की प्रवृत्ति कानून के शासन को कमज़ोर करती है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में इस बात को 'परेशान करने वाला' बताया कि जनता दीवानी मामलों के समाधान के लिए पुलिस और कलेक्टरों के पास जाती है, क्योंकि यह प्रवृत्ति कानून के शासन की बुनियाद को कमज़ोर करती है। ऐसे मामलों में समाधान के लिए उन गैर-कानूनी एजेंसियों को बढ़ावा देती है, जिनका उन मामलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होता।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने दलजीत सिंह और एक अन्य व्यक्ति द्वारा दायर एक आपराधिक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं।उनकी याचिका में एक FIR को चुनौती दी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175319/the-tendency-to-approach-the-police-for-civil-matters-undermines"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में इस बात को 'परेशान करने वाला' बताया कि जनता दीवानी मामलों के समाधान के लिए पुलिस और कलेक्टरों के पास जाती है, क्योंकि यह प्रवृत्ति कानून के शासन की बुनियाद को कमज़ोर करती है। ऐसे मामलों में समाधान के लिए उन गैर-कानूनी एजेंसियों को बढ़ावा देती है, जिनका उन मामलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होता।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने दलजीत सिंह और एक अन्य व्यक्ति द्वारा दायर एक आपराधिक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं।उनकी याचिका में एक FIR को चुनौती दी गई, जो मूल रूप से एक व्यावसायिक विवाद से संबंधित थी। यह विवाद याचिकाकर्ताओं द्वारा अपने माल को अलग-अलग जगहों पर पहुंचाने के लिए किराए पर लिए गए वाहनों के भाड़े का भुगतान न करने को लेकर था।</p>
<p style="text-align:justify;">शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उस पर गोली चलाई गई, लेकिन गोली किसी को लगी नहीं। खंडपीठ ने गौर किया कि यह पहली नज़र में "दिखावटी आरोप" था, जिसे जान-बूझकर एक दीवानी विवाद को आपराधिक रंग देने के लिए गढ़ा गया।खंडपीठ ने टिप्पणी की, "यह बहुत परेशान करने वाली बात है कि समाज के हर तबके के लोग सभी प्रकार के दीवानी मामलों के समाधान के लिए पुलिस और ज़िलों के कलेक्टरों के पास जाने की ज़िद करते हैं, जबकि इन मामलों पर अधिकार क्षेत्र दीवानी अदालत का होता है। यह प्रवृत्ति, जिसे समाज के सभी वर्गों द्वारा बढ़ावा दिया जाता है, कानून के शासन की बुनियाद को कमज़ोर करने और ऐसे मामलों में समाधान के लिए उन गैर-कानूनी एजेंसियों को बढ़ावा देने की संभावना रखती है, जिनका उन मामलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होता।"</p>
<p style="text-align:justify;">इस पृष्ठभूमि में पहली नज़र में मामला बनता देख, अदालत ने याचिका स्वीकार कर ली और नोटिस जारी किए।खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत दी और निर्देश दिया कि जब तक कोई अगला आदेश नहीं आ जाता, तब तक उन्हें BNS की धारा 109(1), 116(2) और 352 के तहत दर्ज FIR में गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।। अदालत ने मुरादाबाद के सीनियर पुलिस अधीक्षक से एक हलफनामा भी मांगा, जिसमें यह स्पष्टीकरण मांगा गया कि पुलिस ने यह FIR किस आधार पर दर्ज की। इस मामले को 15 अप्रैल को आदेश के लिए सूचीबद्ध किया गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/175319/the-tendency-to-approach-the-police-for-civil-matters-undermines</link>
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                <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 20:03:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बंगाल एसआईआर: जाँच के बाद डॉक्टर से पुलिसकर्मी तक के नाम गायब</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की एसआईआर प्रक्रिया में एडजुडिकेशन यानी जाँच के बाद संदेह दूर होने का दावा किया गया था, लेकिन इससे हालात और उलझने लगे हैं। अंडर एडजुडिकेशन यानी जाँच के अधीन रखे गए हाई कोर्ट के पूर्व जज, बीएलओ से लेकर डॉक्टर, वकील, पुलिसकर्मी तक के नाम काटे जाने की रिपोर्टें आ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हाई कोर्ट के पूर्व जज के नाम काटे जाने के मामले में विवाद होने पर भले ही उनका नाम जोड़ दिया गया हो, लेकिन क्या बाक़ी मामलों में ऐसा है? क्या नाम काटे गए लोगों को ट्रिब्यूनल में सुनवाई को</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174642/names-of-doctors-to-policemen-missing-after-bengal-sir-investigation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1754143774943_bihar_sir_draft_voter_list.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट की एसआईआर प्रक्रिया में एडजुडिकेशन यानी जाँच के बाद संदेह दूर होने का दावा किया गया था, लेकिन इससे हालात और उलझने लगे हैं। अंडर एडजुडिकेशन यानी जाँच के अधीन रखे गए हाई कोर्ट के पूर्व जज, बीएलओ से लेकर डॉक्टर, वकील, पुलिसकर्मी तक के नाम काटे जाने की रिपोर्टें आ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हाई कोर्ट के पूर्व जज के नाम काटे जाने के मामले में विवाद होने पर भले ही उनका नाम जोड़ दिया गया हो, लेकिन क्या बाक़ी मामलों में ऐसा है? क्या नाम काटे गए लोगों को ट्रिब्यूनल में सुनवाई को मौक़ा मिल रहा है? यदि अब तक ट्रिब्यूनल ही नहीं बना है तो क्या लाखों लोग मतदाता सूची और वोट देने के अधिकार से वंचित नहीं हो जाएँगे?</p>
<p style="text-align:justify;">ये सवाल इसलिए खड़े हो रहे हैं कि राज्य में अंडर एडजुडिकेशन रहे मतदाताओं के बड़े पैमाने पर नाम कटने के मामले सामने आए हैं। राज्य में कुल 60 लाख से ज्यादा मामले ‘अंडर एडजुडिकेशन’ यानी जांच के अधीन थे। 705 न्यायिक अधिकारियों की टीम ने अब तक 37 लाख मामलों का फ़ैसला कर लिया है। दो सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी हो चुकी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव आयोग ने यह साफ़ नहीं किया है कि अब तक कितने नाम हटा दिए गए हैं, लेकिन मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अब तक पूरे राज्य में 15 लाख से ज्यादा नाम हटाए जा चुके हैं। राज्य में सबसे ज़्यादा मुर्शिदाबाद में 11 लाख और मालदा में 8.28 लाख मामले जांच के अधीन थे।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 19 ट्रिब्यूनल बनने थे, जो 23 जिलों को कवर करेंगे, लेकिन अभी तक पूरी तरह सेटअप नहीं हुए। प्रभावित लोग कह रहे हैं कि समय बहुत कम बचा है। नामांकन की आखिरी तारीख नजदीक है, ऐसे में लाखों सच्चे वोटर चुनाव से बाहर हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कई गांवों में लोग चुनाव बहिष्कार की बात कर रहे हैं, जब तक इन मामलों की सुनवाई न हो। चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया डुप्लिकेट, मृत, स्थानांतरित या संदिग्ध प्रविष्टियों को हटाने के लिए है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग दावा कर रहे हैं कि दस्तावेज देने के बावजूद उनका नाम बिना वजह काटा गया। यह मुद्दा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले काफी गर्माया हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:11:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण की कानूनी बाध्यता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि CrPC की धारा 125 या BNSS की धारा 144 के कानूनी प्रावधानों के तहत बहू पर अपने सास-ससुर के भरण-पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह देखते हुए कि BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है और यह केवल उन व्यक्तियों की श्रेणियों तक ही सीमित है, जिनका उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया, जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी की कि सास-ससुर उक्त प्रावधान के दायरे में नहीं आते हैं।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने इस बात पर भी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174640/there-is-no-legal-obligation-on-the-daughter-in-law-to-maintain"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court8.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि CrPC की धारा 125 या BNSS की धारा 144 के कानूनी प्रावधानों के तहत बहू पर अपने सास-ससुर के भरण-पोषण की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। यह देखते हुए कि BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार एक कानूनी अधिकार है और यह केवल उन व्यक्तियों की श्रेणियों तक ही सीमित है, जिनका उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया, जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी की कि सास-ससुर उक्त प्रावधान के दायरे में नहीं आते हैं।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि कोई नैतिक दायित्व, चाहे वह कितना भी बाध्यकारी क्यों न लगे, किसी कानूनी आदेश के अभाव में कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।"विधायिका ने अपनी समझदारी से, सास-ससुर को उक्त प्रावधान के दायरे में शामिल नहीं किया। दूसरे शब्दों में, विधायिका की यह मंशा नहीं है कि उक्त प्रावधान के तहत बहू पर उसके सास-ससुर के भरण-पोषण का दायित्व डाला जाए।"</p><p style="text-align:justify;">इसके साथ ही पीठ ने एक बुजुर्ग दंपति द्वारा अपनी बहू के खिलाफ दायर की गई एक आपराधिक पुनरीक्षण खारिज की। याचिकाकर्ताओं ने आगरा के प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट द्वारा अगस्त, 2025 में पारित आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें BNSS की धारा 144 के तहत भरण-पोषण की मांग करने वाले उनके आवेदन खारिज कर दिया गया था।</p><p style="text-align:justify;">माता-पिता ने यह दलील दी कि वे वृद्ध, अनपढ़, निर्धन हैं और अपने दिवंगत बेटे के जीवित रहते पूरी तरह से उसी पर निर्भर हैं। उन्होंने यह तर्क दिया कि उनकी बहू, जो उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत है, उसकी अपनी पर्याप्त स्वतंत्र आय है और उसे दिवंगत बेटे के सभी सेवा और रिटायरमेंट लाभ भी प्राप्त हुए हैं। याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया कि अपनी वृद्ध सास-ससुर के भरण-पोषण के बहू के नैतिक दायित्व को कानूनी दायित्व के रूप में माना जाना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह संकेत मिले कि बहू को पुलिस में नौकरी अनुकंपा के आधार पर मिली थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दिवंगत बेटे की संपत्ति के उत्तराधिकार से संबंधित दलीलें भरण-पोषण की इन संक्षिप्त कार्यवाहियों में विचार के दायरे में नहीं आती हैं। अतः, फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई अवैधता, विकृति या त्रुटि न पाते हुए हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनर्विचार याचिका खारिज की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:07:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को राहत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़ी एक अहमखबर है, जहां चर्चित संत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज यौन शोषण के मामले में अग्रिम जमानत याचिका को मंजूरी दे दी है।इसी मामले में सह-आरोपी और उनके शिष्य मुकुंदानंद को भी कोर्ट ने अग्रिम जमानत प्रदान की है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">दोनों के खिलाफ प्रयागराज के झूंसी थाना में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें शिविर के दौरान बटुकों के यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।जानकारी के अनुसार, इस मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई 27 फरवरी को पूरी हो गई थी, जिसके बाद अदालत ने दोनों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174186/relief-to-swami-avimukteshwarananda-from-allahabad-high-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img-20260325-wa0193.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट से जुड़ी एक अहमखबर है, जहां चर्चित संत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज यौन शोषण के मामले में अग्रिम जमानत याचिका को मंजूरी दे दी है।इसी मामले में सह-आरोपी और उनके शिष्य मुकुंदानंद को भी कोर्ट ने अग्रिम जमानत प्रदान की है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दोनों के खिलाफ प्रयागराज के झूंसी थाना में एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें शिविर के दौरान बटुकों के यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।जानकारी के अनुसार, इस मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई 27 फरवरी को पूरी हो गई थी, जिसके बाद अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए यह निर्णय सुनाया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने आरोपियों को गिरफ्तारी से राहत देते हुए अग्रिम जमानत दे दी, हालांकि मामले की जांच जारी रहेगी।यह मामला सामने आने के बाद क्षेत्र में काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां एक ओर समर्थक इस फैसले को न्यायिक राहत मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पीड़ित पक्ष न्याय की मांग पर कायम है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 20:24:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ऐसी कौन सी आफत थी जो वकील का घर गिरा दिया: हाई कोर्ट </title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>इलाहाबाद।</strong> हाईकोर्ट ने झुंसी अदावा स्थित अधिवक्ता का घर गिराए जाने के मामले में प्रयागराज विकास प्राधिकरण (पीडीए) की कार्रवाई पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने पूछा है कि ऐसी कौन सी आफत थी कि केस सुनवाई पर है और मकान गिरा दिया गया। कोर्ट ने इस मामले में पीडीए से मंगलवार को पूरा ब्योरा तलब किया है। यह आदेश मुख्य न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर और न्यायमूर्ति आशुतोष कुमार की खंडपीठ ने राजबहादुर व चार अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।</div>
<div>  </div>
<div>इसके पहले कोर्ट में सुनवाई शुरू होते हुए हाईकोर्ट बार एसोसिएशन अध्यक्ष अशोक सिंह ने पीडीए अधिकारियों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/136714/what-was-the-disaster-that-the-high-court-demolished-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-11/img-20231104-wa0158.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>इलाहाबाद।</strong> हाईकोर्ट ने झुंसी अदावा स्थित अधिवक्ता का घर गिराए जाने के मामले में प्रयागराज विकास प्राधिकरण (पीडीए) की कार्रवाई पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने पूछा है कि ऐसी कौन सी आफत थी कि केस सुनवाई पर है और मकान गिरा दिया गया। कोर्ट ने इस मामले में पीडीए से मंगलवार को पूरा ब्योरा तलब किया है। यह आदेश मुख्य न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर और न्यायमूर्ति आशुतोष कुमार की खंडपीठ ने राजबहादुर व चार अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।</div>
<div> </div>
<div>इसके पहले कोर्ट में सुनवाई शुरू होते हुए हाईकोर्ट बार एसोसिएशन अध्यक्ष अशोक सिंह ने पीडीए अधिकारियों की इस कार्रवाई पर नाराजगी जाहिर करते हुए कार्रवाई को बिल्डर्स के साथ मिलीभगत बताई। अध्यक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि जिस अधिवक्ता का घर गिराया गया उस भूमि के पीछे दो बीघे का प्लॉट एक बिल्डर का है। पीडीए अधिकारियों ने उसके लिए रास्ता बनाने के लिए यह घर गिराया।</div>
<div> </div>
<div>कहा कि आमतौर पर पीडीए किसी का घर गिराता है तो उस मकान के आगे का हिस्सा तोड़ दिया जाता है लेकिन अधिवक्ता का पूरा मकान गिराया गया। उस स्थान पर और भी मकान बने हैं लेकिन पीडीए ने किसी और के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। उन मकानों की भूमि की प्रकृति भी उसी तरह की है, जैसी अधिवक्ता के मकान की थी।</div>
<div> </div>
<div>पीडीए की ओर से उपस्थित अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने कहा कि याची ने 2017 में निर्माण कराया था। पीडीए की ओर से नोटिस दिया गया था याची ने मंडलायुक्त के यहां अपील दाखिल की अपील खारिज हो गई। इसके बाद वह हाईकोर्ट आया तो कोर्ट ने उनसे स्वामित्व के कागजात दिखाने को कहा था, लेकिन याची अभी कागजात नहीं दिखा पाया।</div>
<div> </div>
<div>इस पर कोर्ट ने पूछा कि जब केस सुनवाई पर था, उसके एक दिन पहले क्यों मकान गिरा दिया। इस पर पीडीए की ओर से कहा गया कि यह एक रूटीन कार्रवाई थी लेकिन, कोर्ट ने इस दलील को नहीं माना और मंगलवार को पूरा ब्योरा तलब किया है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Nov 2023 12:31:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पुलिस स्टेशन में होने वाली शादी का रिवाज़ ख़त्म, अब नहीं होगी मान्य: HC </title>
                                    <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में विवाह संस्कार की कई पद्धतियां हैं. इन्हीं के आधार पर विवाह को मान्यता मिलती है. लेकिन, इसके कई शॉर्टकट्स निकाले जा चुके हैं. ऐसा ही एक शॉर्टकट है पुलिस स्टेशन में शादी का. पुलिस के सामने एक दूसरे को अपनाना अब शादी नहीं रह जाएगा. क्योंकि इस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा है कि सप्तपदी हिंदू विवाह का अनिवार्य तत्व है.</p>
<p>रीति रिवाजों के साथ संपन्न हुए विवाह को ही कानून की नज़र में वैध विवाह माना जाएगा. अगर वैदिक विधि से शादी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/135532/the-tradition-of-marriage-taking-place-in-police-station-will"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-10/hindi-divas11.jpg" alt=""></a><br /><p>हिंदू धर्म में विवाह संस्कार की कई पद्धतियां हैं. इन्हीं के आधार पर विवाह को मान्यता मिलती है. लेकिन, इसके कई शॉर्टकट्स निकाले जा चुके हैं. ऐसा ही एक शॉर्टकट है पुलिस स्टेशन में शादी का. पुलिस के सामने एक दूसरे को अपनाना अब शादी नहीं रह जाएगा. क्योंकि इस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा है कि सप्तपदी हिंदू विवाह का अनिवार्य तत्व है.</p>
<p>रीति रिवाजों के साथ संपन्न हुए विवाह को ही कानून की नज़र में वैध विवाह माना जाएगा. अगर वैदिक विधि से शादी संपन्न नहीं कराई गई है तो इस तरह के विवाद कानून की नजर में अवैध रहेंगे. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस संजय कुमार सिंह की एकल पीठ ने वाराणसी की स्मृति सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह की वैधता को स्थापित करने के लिए सप्तपदी एक अनिवार्य तत्व है.</p>
<p>कोर्ट की टिप्पणी से साफ है कि हिंदू विवाह के ऐसे तरीके जिसमें सात फेरे यानी कि सप्तपदी को शामिल नहीं किया जाता वह कानूनन वैध नहीं होगा. उत्तर प्रदेश में पुलिस स्टेशन में कराई गई शादियां इस दायरे में आती हैं. इलाहाबाद हाई कोर्ट की सिविल और पारिवारिक विवादो के मामलों की जानकार अधिवक्ता अभिलाषा परिहार का कहना है कि कई बार लड़के-लड़कियों के अफेयर से जुड़े मामले पुलिस स्टेशन में पहुंचने के बाद पुलिसकर्मी थाने में ही लड़के-लड़कियों की शादियां करा देते हैं.</p>
<p>इसमें थाने में बने मंदिर में देवी-देवताओं को साक्षी मानकर लड़के से लड़की की मांग में सिंदूर लगवा देते हैं, और एक दूसरे को माला पहनवा देते हैं. इस तरह की शादियों में न तो फेरे होते हैं न ही सप्तपदी होती है. ऐसे में थाने में होने वाली शादियों की वैधता पर अब सवाल उठेंगे और उन्हे विधिक रूप से मान्य नहीं माना जाएगा.</p>
<p>इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस संजय कुमार सिंह ने वाराणसी की स्मृति सिंह उर्फ मौसमी सिंह की याचिका पर सुनवाई के बाद दिए गए अपने आदेश में यह टिप्पणी की है. इसमें स्मृति सिंह ने अपने पति सत्यम सिंह पति सहित ससुराल वालों पर तलाक दिए बगैर दूसरा विवाह करने का आरोप लगाते हुए वाराणसी जिला अदालत में परिवाद दायर किया था. जिस पर कोर्ट ने याची को सम्मन जारी कर तलब किया था.</p>
<p>इस परिवाद और समन को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई. इसमें याची का कहना था कि उसका विवाह 5 जून 2017 को सत्यम सिंह के साथ हुआ था लेकिन विवादों के कारण याची ने पति और ससुराल वालों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और मारपीट आदि का मुकदमा दर्ज कराया था.</p>
<p>यह भी आरोप लगाया कि ससुराल वालों ने उसे मारपीट कर घर से निकाल दिया है. पुलिस ने पति व ससुराल वालों के खिलाफ अदालत में चार्ज शीट दाखिल की है. इसी बीच पति और ससुराल वालों की ओर से पुलिस अधिकारियों को एक शिकायती पत्र देकर कहा गया कि याची ने पहले पति से तलाक लिए बिना दूसरी शादी कर ली है.</p>
<p>इस शिकायत की सीओ सदर मिर्जापुर ने जांच की और उसे झूठा करार देते हुए रिपोर्ट लगा दी. इसके बाद याची के पति ने जिला न्यायालय वाराणसी में परिवाद दाखिल किया अदालत ने इस परिवाद पर याची को सम्मन जारी किया था. जिसे चुनौती देते हुए कहा गया कि याची द्वारा दूसरा विवाह करने का आरोप सरासर गलत है.</p>
<p>हाईकोर्ट में दाखिल इस याचिका में कहा गया की याची की ओर से दर्ज कराए गए मुकदमे का बदला लेने की नीयत से यह आरोप लगाया गया है. परिवाद में विवाह समारोह संपन्न होने का कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है. न ही सप्तपदी का कोई साक्ष्य है जो की विवाह की अनिवार्य रस्म है. एकमात्र फोटोग्राफ साक्ष्य के तौर पर लगाया गया है. कोर्ट ने कहा कि याची के खिलाफ दर्ज शिकायत में विवाह समारोह संपन्न होने का कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है. जबकि वैध विवाह के लिए विवाह समारोह का सभी रीति-रिवाज के साथ संपन्न होना जरूरी है.</p>
<p>इसी में सप्तपदी यानी सात फेरों का जिक्र कोर्ट में आया. कोर्ट ने कहा कि यदि विवाह समारोह की यह प्रक्रिया पूरी नहीं है तो कानून की नजर में यह वैध विवाह नहीं होगा. वर्तमान मामले में इसका कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है. कोर्ट ने कहा कि यह स्पष्ट है कि सिर्फ याची को परेशान करने के उद्देश्य से एक दूषित न्यायिक प्रक्रिया शुरू की गई है. जो न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है. इसी आधार पर न्यायालय ने 21 अप्रैल 2022 को याची के विरुद्ध जारी समन आदेश और परिवाद की प्रक्रिया को रद्द कर दिया है.</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/135532/the-tradition-of-marriage-taking-place-in-police-station-will</link>
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                <pubDate>Thu, 05 Oct 2023 14:40:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
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