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                <title>maharashtra news - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>बालासाहेब की विरासत से राजनीतिक संघर्ष तक</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना केवल एक राजनीतिक दल नहीं रही, बल्कि वह एक भावनात्मक आंदोलन और मराठी अस्मिता का प्रतीक भी रही है। इस आंदोलन की नींव शिवसेना संस्थापक  बालासाहेब ठाकरे ने रखी थी। उनकी आक्रामक शैली, स्पष्ट विचारधारा और कार्यकर्ताओं पर मजबूत पकड़ ने शिवसेना को महाराष्ट्र की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्तियों में शामिल कर दिया था। लेकिन समय के साथ राजनीति बदली, परिस्थितियां बदलीं और नेतृत्व भी बदला। आज शिवसेना के वर्तमान प्रमुख  उद्धव ठाकरे ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जिसे उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन समय माना जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">पिछले कुछ वर्षों में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181463/from-balasahebs-legacy-to-political-struggle"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/h89om7is_balasaheb-thackeray-uddhav-and-raj-thackeray_625x300_23_january_26.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना केवल एक राजनीतिक दल नहीं रही, बल्कि वह एक भावनात्मक आंदोलन और मराठी अस्मिता का प्रतीक भी रही है। इस आंदोलन की नींव शिवसेना संस्थापक  बालासाहेब ठाकरे ने रखी थी। उनकी आक्रामक शैली, स्पष्ट विचारधारा और कार्यकर्ताओं पर मजबूत पकड़ ने शिवसेना को महाराष्ट्र की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्तियों में शामिल कर दिया था। लेकिन समय के साथ राजनीति बदली, परिस्थितियां बदलीं और नेतृत्व भी बदला। आज शिवसेना के वर्तमान प्रमुख  उद्धव ठाकरे ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जिसे उनके राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन समय माना जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पिछले कुछ वर्षों में उद्धव ठाकरे की राजनीतिक स्थिति लगातार कमजोर होती दिखाई दी है। महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार बनने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला, लेकिन इसी फैसले ने उनके सामने नई चुनौतियां भी खड़ी कर दीं। भाजपा के साथ दशकों पुराने गठबंधन को छोड़कर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ सरकार बनाने का निर्णय शिवसेना के पारंपरिक समर्थकों के एक बड़े वर्ग को स्वीकार नहीं हुआ। पार्टी के भीतर भी असंतोष धीरे-धीरे बढ़ने लगा। यही असंतोष आगे चलकर बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साल 2022 में शिवसेना को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने बगावत कर दी। यह केवल विधायकों का विद्रोह नहीं था, बल्कि शिवसेना की संगठनात्मक ताकत और नेतृत्व क्षमता पर भी बड़ा सवाल था। शिंदे गुट ने दावा किया कि वह बालासाहेब ठाकरे की मूल विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा है। इसके बाद चुनाव आयोग द्वारा पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को मिलने से उद्धव ठाकरे को एक और बड़ा झटका लगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके बाद उद्धव ठाकरे ने शिवसेना (यूबीटी) के रूप में अपनी राजनीतिक लड़ाई जारी रखी। लोकसभा चुनावों में कुछ सफलता मिलने से ऐसा लगा कि पार्टी फिर से मजबूती की ओर बढ़ रही है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने एक बार फिर उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पार्टी के सांसदों में असंतोष और संभावित टूट की खबरों ने यह संकेत दिया है कि संगठन अभी भी स्थिर नहीं हो पाया है। यदि सांसदों का बड़ा समूह अलग रास्ता चुनता है तो यह शिवसेना (यूबीटी) के लिए एक और बड़ा राजनीतिक आघात साबित हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि वे अपने पिता बालासाहेब ठाकरे जैसी जननेता की छवि नहीं बना सके। बालासाहेब कभी चुनाव नहीं लड़े, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में उनकी बात अंतिम मानी जाती थी। उनकी सभाओं में हजारों लोग जुटते थे और उनके एक बयान से राजनीतिक माहौल बदल जाता था। वे अपने समर्थकों के लिए एक करिश्माई नेता थे जिनकी पकड़ संगठन पर पूरी तरह बनी रहती थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके विपरीत उद्धव ठाकरे का व्यक्तित्व अपेक्षाकृत शांत और संयमित माना जाता है। वे टकराव की राजनीति की बजाय संवाद और संगठनात्मक प्रबंधन को प्राथमिकता देते रहे हैं। मुख्यमंत्री के रूप में उनके कामकाज की कई लोगों ने सराहना की, विशेषकर कोविड-19 महामारी के दौरान। लेकिन राजनीति में केवल प्रशासनिक क्षमता ही पर्याप्त नहीं होती। संगठन को एकजुट रखना, कार्यकर्ताओं में उत्साह बनाए रखना और नेतृत्व के प्रति अटूट विश्वास कायम रखना भी उतना ही आवश्यक होता है। यही वह क्षेत्र है जहां उद्धव ठाकरे को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बालासाहेब ठाकरे और उद्धव ठाकरे के बीच सबसे बड़ा अंतर नेतृत्व शैली का दिखाई देता है। बालासाहेब की राजनीति भावनात्मक जुड़ाव, प्रखर हिंदुत्व और आक्रामक वक्तव्यों पर आधारित थी। वे सीधे कार्यकर्ताओं से संवाद करते थे और पार्टी के भीतर असहमति की गुंजाइश बहुत कम रहती थी। दूसरी ओर उद्धव ठाकरे अपेक्षाकृत सौम्य और संस्थागत शैली के नेता हैं। वे गठबंधन राजनीति में विश्वास रखते हैं और कई मुद्दों पर नरम रुख अपनाते दिखाई दिए हैं। यही कारण है कि शिवसेना के कुछ पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं को लगा कि पार्टी अपनी मूल पहचान से दूर जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा से अलग होने का फैसला उद्धव ठाकरे के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। भाजपा और शिवसेना का गठबंधन दशकों पुराना था और दोनों दलों का मतदाता आधार भी काफी हद तक समान था। जब यह गठबंधन टूटा तो शिवसेना के सामने अपनी नई राजनीतिक पहचान स्थापित करने की चुनौती खड़ी हो गई। कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन ने तत्काल सत्ता तो दिलाई, लेकिन लंबे समय में इस फैसले की राजनीतिक कीमत भी चुकानी पड़ी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज स्थिति यह है कि शिवसेना दो हिस्सों में बंटी हुई दिखाई देती है। एक ओर एकनाथ शिंदे का गुट सत्ता में है और उसके पास संगठन का बड़ा हिस्सा तथा आधिकारिक पार्टी पहचान है। दूसरी ओर उद्धव ठाकरे के पास सहानुभूति, एक समर्पित कार्यकर्ता वर्ग और ठाकरे परिवार की विरासत है। लेकिन केवल विरासत के आधार पर राजनीति लंबे समय तक नहीं चल सकती। इसके लिए मजबूत संगठन, प्रभावी नेतृत्व और लगातार जनसंपर्क की आवश्यकता होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल के दिनों में सांसदों और नेताओं की नाराजगी की खबरें यह बताती हैं कि उद्धव ठाकरे को अभी भी संगठन को मजबूत करने के लिए काफी मेहनत करनी होगी। उन्हें यह साबित करना होगा कि शिवसेना (यूबीटी) केवल एक भावनात्मक मंच नहीं, बल्कि भविष्य की एक मजबूत राजनीतिक शक्ति भी है। यदि वे पार्टी के भीतर विश्वास बहाल करने और नए नेतृत्व को आगे लाने में सफल होते हैं तो राजनीतिक वापसी की संभावना बनी रह सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में ठाकरे नाम आज भी प्रभाव रखता है। लेकिन वर्तमान दौर केवल नाम या विरासत के सहारे नहीं जीता जा सकता। राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और दलों के भीतर भी शक्ति संतुलन लगातार बदल रहा है। ऐसे में उद्धव ठाकरे के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी को एकजुट रखना और जनता के बीच यह विश्वास कायम करना है कि शिवसेना (यूबीटी) भविष्य में भी एक मजबूत विकल्प बन सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बालासाहेब ठाकरे ने जिस शिवसेना को संघर्ष, विचारधारा और संगठनात्मक अनुशासन के आधार पर खड़ा किया था, आज वही पार्टी कई हिस्सों में बंटी हुई दिखाई देती है। यह स्थिति केवल उद्धव ठाकरे के लिए ही नहीं, बल्कि उस राजनीतिक विरासत के लिए भी बड़ी परीक्षा है जिसे बालासाहेब ने दशकों की मेहनत से तैयार किया था। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि उद्धव ठाकरे इस संकट से उबरकर अपनी राजनीतिक जमीन फिर से मजबूत कर पाते हैं या महाराष्ट्र की राजनीति में उनका प्रभाव धीरे-धीरे सीमित होता चला जाएगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि वे अपने राजनीतिक जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं और उनके सामने खड़ी चुनौतियां पहले से कहीं अधिक कठिन हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 17:52:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>नागपुर में SBL एनर्जी लिमिटेड की फैक्ट्री में धमाका, 17 लोगों की मौत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज :</strong> महाराष्ट्र के नागपुर जिले के कटोल शहर में रविवार को एक फैक्ट्री में धमाका होने से 17 लोगों की मौत हो गई, जबकि 18 लोग घायल हुए हैं. पुलिस अधिकारियों ने बताया कि NDRF और SDRF की टीमें मौके पर राहत बचाव का काम कर रही हैं.उन्होंने बताया कि यह धमाका कटोल तहसील के राउलगांव में माइनिंग और इंडस्ट्रियल विस्फोटक बनाने वाली SBL एनर्जी लिमिटेड फैक्ट्री में हुआ. पुलिस ने बताया कि धमाके के तुरंत बाद घायलों को नागपुर के एक हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया.</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">फैक्ट्री में रविवार सुबह धमाका हु्आ. यह इतना भीषण था कि</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/172135/17-people-killed-in-blast-in-sbl-energy-limited-factory"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज :</strong> महाराष्ट्र के नागपुर जिले के कटोल शहर में रविवार को एक फैक्ट्री में धमाका होने से 17 लोगों की मौत हो गई, जबकि 18 लोग घायल हुए हैं. पुलिस अधिकारियों ने बताया कि NDRF और SDRF की टीमें मौके पर राहत बचाव का काम कर रही हैं.उन्होंने बताया कि यह धमाका कटोल तहसील के राउलगांव में माइनिंग और इंडस्ट्रियल विस्फोटक बनाने वाली SBL एनर्जी लिमिटेड फैक्ट्री में हुआ. पुलिस ने बताया कि धमाके के तुरंत बाद घायलों को नागपुर के एक हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फैक्ट्री में रविवार सुबह धमाका हु्आ. यह इतना भीषण था कि जिस बिल्डिंग में धमाका हुआ, उसका सारा सामान और मलबा 500 से 700 मीटर दूर जा गिरा. मरने वालों में ज्यादातर महिलाएं हैं.राज्य के मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने भी धमाके की जानकारी मिलने के बाद अधिकारियों को तुरंत मदद देने के निर्देश दिए हैं. सभी घायलों को हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है और इलाके को सील कर दिया गया है. किसी को भी वहां जाने की इजाजत नहीं है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिला कलेक्टर और एसपी मौके पर पहुंच गए हैं. धमाके के बाद मौके पर भीषण आग लग गई, करीब 4 घंटे की लगातार कोशिशों के बाद आग पर भी काबू पा लिया गया है और इसी वजह से रेस्क्यू ऑपरेशन भी तेज कर दिया गया है.महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने घटना पर दुख जताया. उन्होंने एक्स पोस्ट में कहा कि यह बेहद दुखद घटना है. NDRF और SDRF की टीमें मौके पर हैं. 17 लोगों की जान चली गई है. मैं मृतकों को श्रद्धांजलि देता हूं. इस घटना में 18 लोग घायल हुए हैं. घायलों को तुरंत नागपुर शिफ्ट कर दिया गया है. घटना की पूरी जांच के आदेश दे दिए गए हैं."</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>महाराष्ट्र/गोवा</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/172135/17-people-killed-in-blast-in-sbl-energy-limited-factory</link>
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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 21:56:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Success Story: बकरियां चराने वाले का बेटा बन गया IPS अफसर, पढ़ें पूरी सक्सेस स्टोरी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>Success Story: महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के कागल तहसील के यमगे गांव के एक गरीब धनगढ़ परिवार में जन्मे बिरुदेव सिद्धाप्पा ढोणे ने अपने पहले ही प्रयास में UPSC की कठिन परीक्षा पास की। उन्होंने 2024 में परीक्षा दी थी और 551वीं रैंक हासिल कर यह साबित कर दिया कि सच्ची मेहनत और जुनून से कोई भी सपना हकीकत बन सकता है।</p>
<h3><strong>बकरियां चराने वाला बना आईपीएस अफसर</strong></h3>
<p>बिरुदेव का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। बचपन में वे खंभे पर कंबल टांगकर, सिर पर गांधी टोपी और पैरों में भारी धनगढ़ी चप्पलें पहनकर बकरियां चराते थे। लेकिन मन में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/164077/success-story-goat-herders-son-became-ips-officer-read-full"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-12/success-story-.jpg" alt=""></a><br /><p>Success Story: महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के कागल तहसील के यमगे गांव के एक गरीब धनगढ़ परिवार में जन्मे बिरुदेव सिद्धाप्पा ढोणे ने अपने पहले ही प्रयास में UPSC की कठिन परीक्षा पास की। उन्होंने 2024 में परीक्षा दी थी और 551वीं रैंक हासिल कर यह साबित कर दिया कि सच्ची मेहनत और जुनून से कोई भी सपना हकीकत बन सकता है।</p>
<h3><strong>बकरियां चराने वाला बना आईपीएस अफसर</strong></h3>
<p>बिरुदेव का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। बचपन में वे खंभे पर कंबल टांगकर, सिर पर गांधी टोपी और पैरों में भारी धनगढ़ी चप्पलें पहनकर बकरियां चराते थे। लेकिन मन में कुछ बड़ा करने का सपना था। उनके पिता सिद्धाप्पा ढोणे बकरियां चराकर परिवार का पेट पालते थे, जबकि मां अनपढ़ थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी, फिर भी उन्होंने अपने बेटे का हौसला कभी कम नहीं होने दिया।</p>
<p>बिरुदेव का यह सफर एक छोटे-से वाकये से शुरू हुआ था। एक दिन उनका मोबाइल फोन खो गया और वे शिकायत करने पुलिस स्टेशन पहुंचे। वहां उन्हें उचित मदद नहीं मिली, और इसी अपमानजनक अनुभव ने उनके भीतर IPS बनने की आग जला दी। उन्होंने तभी ठान लिया कि एक दिन वे खुद पुलिस अफसर बनेंगे।</p>
<p>दिल्ली में रहकर उन्होंने कठिन हालात में पढ़ाई की। जहां एक ओर अधिकांश छात्र सुविधा से लैस कोचिंग संस्थानों में तैयारी करते हैं, वहीं बिरुदेव ने सीमित संसाधनों में रहकर रोज़ाना 22 घंटे पढ़ाई की। उनके पिता खेत में मेहनत कर 10 से 12 हजार रुपये प्रति माह भेजते थे, जिससे उनका गुजारा होता था।</p>
<p>बिरुदेव पढ़ाई में शुरू से ही अव्वल रहे हैं। उन्होंने दसवीं और बारहवीं की परीक्षा कागल तहसील के मुरगुड केंद्र में टॉप की थी। इसके बाद उन्होंने पुणे के सिओईपी इंजीनियरिंग कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।</p>
<p>जब UPSC का रिजल्ट आया, तो उनके मामा के गांव में एक दोस्त दौड़ता हुआ आया और चिल्लाकर बोला—“बिरुदेव, तू पास झाला रे!” यह सुनते ही मां-बाप की आंखें भर आईं और गांव में जश्न का माहौल बन गया। अनपढ़ माता-पिता को इतना ही समझ में आया कि अब उनका बेटा "साहब" बन गया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शिक्षा</category>
                                            <category>सरकारी नौकरी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Dec 2025 13:03:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sandeep Kumar ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Success Story: बकरियां चराने वाले का बेटा बन गया IPS अफसर, पढ़ें पूरी सक्सेस स्टोरी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>Success Story: महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के कागल तहसील के यमगे गांव के एक गरीब धनगढ़ परिवार में जन्मे बिरुदेव सिद्धाप्पा ढोणे ने अपने पहले ही प्रयास में UPSC की कठिन परीक्षा पास की। उन्होंने 2024 में परीक्षा दी थी और 551वीं रैंक हासिल कर यह साबित कर दिया कि सच्ची मेहनत और जुनून से कोई भी सपना हकीकत बन सकता है।</p>
<h3><strong>बकरियां चराने वाला बना आईपीएस अफसर</strong></h3>
<p>बिरुदेव का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। बचपन में वे खंभे पर कंबल टांगकर, सिर पर गांधी टोपी और पैरों में भारी धनगढ़ी चप्पलें पहनकर बकरियां चराते थे। लेकिन मन में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/162475/success-story-goat-herders-son-became-ips-officer-read-full"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-12/success-story-.jpg" alt=""></a><br /><p>Success Story: महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के कागल तहसील के यमगे गांव के एक गरीब धनगढ़ परिवार में जन्मे बिरुदेव सिद्धाप्पा ढोणे ने अपने पहले ही प्रयास में UPSC की कठिन परीक्षा पास की। उन्होंने 2024 में परीक्षा दी थी और 551वीं रैंक हासिल कर यह साबित कर दिया कि सच्ची मेहनत और जुनून से कोई भी सपना हकीकत बन सकता है।</p>
<h3><strong>बकरियां चराने वाला बना आईपीएस अफसर</strong></h3>
<p>बिरुदेव का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। बचपन में वे खंभे पर कंबल टांगकर, सिर पर गांधी टोपी और पैरों में भारी धनगढ़ी चप्पलें पहनकर बकरियां चराते थे। लेकिन मन में कुछ बड़ा करने का सपना था। उनके पिता सिद्धाप्पा ढोणे बकरियां चराकर परिवार का पेट पालते थे, जबकि मां अनपढ़ थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी, फिर भी उन्होंने अपने बेटे का हौसला कभी कम नहीं होने दिया।</p>
<p>बिरुदेव का यह सफर एक छोटे-से वाकये से शुरू हुआ था। एक दिन उनका मोबाइल फोन खो गया और वे शिकायत करने पुलिस स्टेशन पहुंचे। वहां उन्हें उचित मदद नहीं मिली, और इसी अपमानजनक अनुभव ने उनके भीतर IPS बनने की आग जला दी। उन्होंने तभी ठान लिया कि एक दिन वे खुद पुलिस अफसर बनेंगे।</p>
<p>दिल्ली में रहकर उन्होंने कठिन हालात में पढ़ाई की। जहां एक ओर अधिकांश छात्र सुविधा से लैस कोचिंग संस्थानों में तैयारी करते हैं, वहीं बिरुदेव ने सीमित संसाधनों में रहकर रोज़ाना 22 घंटे पढ़ाई की। उनके पिता खेत में मेहनत कर 10 से 12 हजार रुपये प्रति माह भेजते थे, जिससे उनका गुजारा होता था।</p>
<p>बिरुदेव पढ़ाई में शुरू से ही अव्वल रहे हैं। उन्होंने दसवीं और बारहवीं की परीक्षा कागल तहसील के मुरगुड केंद्र में टॉप की थी। इसके बाद उन्होंने पुणे के सिओईपी इंजीनियरिंग कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।</p>
<p>जब UPSC का रिजल्ट आया, तो उनके मामा के गांव में एक दोस्त दौड़ता हुआ आया और चिल्लाकर बोला—“बिरुदेव, तू पास झाला रे!” यह सुनते ही मां-बाप की आंखें भर आईं और गांव में जश्न का माहौल बन गया। अनपढ़ माता-पिता को इतना ही समझ में आया कि अब उनका बेटा "साहब" बन गया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>शिक्षा</category>
                                            <category>सरकारी नौकरी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 04 Dec 2025 10:35:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sandeep Kumar ]]></dc:creator>
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                <title>चौबीस घंटे के अंदर 24 लोगों की मौत, महाराष्ट्र के नांदेड़ सरकारी अस्पताल का हाल </title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Dr. Shankarrao Chavan Govt Medical College: </strong>महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित डॉ. शंकरराव चव्हाण सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में 30 सितंबर से 1 अक्टूबर (शनिवार और रविवार) के बीच 24 घंटों में 12 नवजात शिशुओं सहित 24 लोगों की मौत की सूचना मिली है. इसी तरह की एक घटना में इस साल अगस्त में ठाणे स्थित सरकारी अस्पताल में 18 लोगों की मौत हो गई थी. ताजा घटनाक्रम के परिणामस्वरूप कड़ी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, विपक्षी दलों ने राज्य सरकार पर आवश्यक दवाओं की आपूर्ति बनाए रखने में विफल रहने का आरोप लगाया है.</p>
<p>चिकित्सा अधिकारियों ने कहा कि</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/135458/24-people-died-within-24-hours-condition-of-nanded-government"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2023-10/nanded-hospital-maharashtra-aa.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>Dr. Shankarrao Chavan Govt Medical College: </strong>महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित डॉ. शंकरराव चव्हाण सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में 30 सितंबर से 1 अक्टूबर (शनिवार और रविवार) के बीच 24 घंटों में 12 नवजात शिशुओं सहित 24 लोगों की मौत की सूचना मिली है. इसी तरह की एक घटना में इस साल अगस्त में ठाणे स्थित सरकारी अस्पताल में 18 लोगों की मौत हो गई थी. ताजा घटनाक्रम के परिणामस्वरूप कड़ी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, विपक्षी दलों ने राज्य सरकार पर आवश्यक दवाओं की आपूर्ति बनाए रखने में विफल रहने का आरोप लगाया है.</p>
<p>चिकित्सा अधिकारियों ने कहा कि अस्पताल में फिलहाल 70 मरीज गंभीर हैं और अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं. घटना के बारे में जानकर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, जिला कलेक्टर अभिजीत राउत अस्पताल पहुंचे और स्थिति की समीक्षा की. अस्पताल अधीक्षक डॉ. एसआर वाकोड़े ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया, ‘जिन 12 नवजात शिशुओं की मौत हुई उनमें से छह बच्चियां शामिल हैं. इनमें से आठ बच्चों ने जन्म से तीन दिनों के भीतर दम तोड़ दिया, जबकि चार को गंभीर हालत में पड़ोसी जिलों सहित निजी अस्पतालों से इस अस्पताल में रेफर किया गया था.</p>
<p>अधीक्षक ने कहा कि इस अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ने वालों की संख्या औसतन 10 से 12 तक है. उन्होंने कहा कि हाल ही में कर्मचारियों के तबादलों के कारण कुछ समस्या हुई, लेकिन ‘हमने यह सुनिश्चित किया कि मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित न हों.’ अस्पताल में आवश्यक और जीवनरक्षक दवाओं की कमी से जुड़े आरोपों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘कुछ दवाएं हाफकिन इंस्टिट्यूट से खरीदी जानी थीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, जिसके कारण कुछ समस्या हुई.</p>
<p>उन्होंने कहा, ‘तेलंगाना की सीमा से लगे इलाकों सहित पड़ोसी जिलों से मरीजों की भारी आमद के कारण दवाओं की भी कमी हो जाती है. हम हमेशा यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे अस्पताल में आवश्यक दवाओं की कमी के कारण किसी मरीज की जान न चली जाए. ऐसी स्थितियों में हम स्थानीय बजट से दवाएं खरीदते हैं हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि कभी-कभी गैर-गंभीर बीमारियों के लिए दवाओं की कमी हो सकती है.’</p>
<p>प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, इन 24 घंटों के दौरान दम तोड़ने वाले 12 वयस्कों में से चार की मौत दिल का दौरा पड़ने से, एक की फूड पॉइजनिंग, दो की किडनी फेल होने से, एक महिला की प्रसव के दौरान हुई जटिलताओं के कारण, तीन एक दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने से और एक की पेट की बीमारी से मौत हो गई.</p>
<p>अस्पताल द्वारा जारी बयान में कहा गया है, ‘हाल के दिनों में अधिक गंभीर मरीज, विशेष रूप से टर्मिनल स्टेज (मौत से पहले की शरीर के कार्य करने की स्थिति में आने वाली गिरावट) वाले, जिला और अन्य क्षेत्रों से आ रहे हैं. समर्पित चिकित्सा टीम और कर्मचारी लगन से उनकी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं. इस मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का समुदाय को उत्कृष्ट सेवाएं प्रदान करने का एक लंबा इतिहास रहा है और सभी भर्ती मरीजों को आवश्यक देखभाल मिल रही है.’</p>
<p>अस्पताल के एक डॉक्टर ने कहा, ‘हालांकि हमारी क्षमता 600 बिस्तरों की है, वर्तमान में हमारे पास 800 से अधिक मरीज भर्ती हैं. हम जिले में एकमात्र तृतीयक देखभाल अस्पताल हैं और हमारे यहां अक्सर गंभीर हालत वाले मरीज आते हैं.’</p>
<p>इसी बीच, मुंबई में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने मौतों को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और घटना की गहन जांच की घोषणा की, जबकि विपक्ष ने राज्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति पर राज्य सरकार की आलोचना की है.</p>
<p>महाराष्ट्र के चिकित्सा शिक्षा मंत्री हसन मुश्रीफ ने कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों को गहन जांच करने का निर्देश दिया गया है. रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी. उन्होंने कहा, ‘मैंने हमारे निदेशक से नांदेड़ का दौरा करने के लिए कहा है. मैं भी वहां जाऊंगा. जांच के आदेश दे दिए गए हैं.’</p>
<p>पूर्व सीएम और वरिष्ठ कांग्रेस विधायक अशोक चव्हाण, जिनके पिता के नाम पर यह अस्पताल है ने, अस्पताल का दौरा करने के बाद कहा, ‘अस्पताल में स्थिति चिंताजनक है. जिन नर्सों का स्थानांतरण हुआ था, उनके रिक्त पदों पर कोई नई नियुक्ति नहीं की गई है. डॉक्टरों की भर्ती की जरूरत है. जिला योजना समिति से पैसे को अभी तक तकनीकी मंजूरी नहीं मिली है, जिससे अस्पताल वित्तीय संकट में है. अस्पताल में वर्तमान में 1,200 मरीज हैं, जबकि क्षमता 500 है.’</p>
<p>चव्हाण ने यह भी आरोप लगाया कि सीटी-स्कैन और अन्य उपकरणों के रखरखाव का भुगतान लंबित है, इसलिए ठेकेदार ने सेवाएं बंद कर दी हैं. हालांकि, अस्पताल के बयान में कहा गया है, ‘अस्पताल में महत्वपूर्ण दवाओं की आपूर्ति है और चालू वित्तीय वर्ष के लिए इसे 12 करोड़ रुपये की धनराशि मिली, जिसमें 4 करोड़ रुपये अतिरिक्त दिए गए हैं.’</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>महाराष्ट्र/गोवा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Oct 2023 15:52:15 +0530</pubDate>
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