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                <title>Electoral Reforms - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Electoral Reforms RSS Feed</description>
                
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                <title>EVM तुरंत बंद हो, बैलेट पेपर से हो चुनाव</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>बिकापुर, अयोध्या।</strong> भारतीय जन समाज पार्टी ने आज केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को चेतावनी देते हुए मांग की कि देश में लोकतंत्र की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए EVM को तुरंत बंद किया जाए और आगामी सभी चुनाव बैलेट पेपर से कराए जाएं। भारतीय जन समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ब्रजमोहन सिंह ने कहा: "जिस मशीन पर देश की जनता को भरोसा नहीं, उस मशीन से देश का भविष्य तय नहीं हो सकता। अमेरिका, जर्मनी, नीदरलैंड जैसे देश EVM को खारिज कर चुके हैं। फिर भारत में इसे थोपने का क्या कारण है? हम सरकार को चेतावनी देते हैं-EVM</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184623/evm-should-be-closed-immediately-and-elections-should-be-done"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/646029.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>बिकापुर, अयोध्या।</strong> भारतीय जन समाज पार्टी ने आज केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को चेतावनी देते हुए मांग की कि देश में लोकतंत्र की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए EVM को तुरंत बंद किया जाए और आगामी सभी चुनाव बैलेट पेपर से कराए जाएं। भारतीय जन समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ब्रजमोहन सिंह ने कहा: "जिस मशीन पर देश की जनता को भरोसा नहीं, उस मशीन से देश का भविष्य तय नहीं हो सकता। अमेरिका, जर्मनी, नीदरलैंड जैसे देश EVM को खारिज कर चुके हैं। फिर भारत में इसे थोपने का क्या कारण है? हम सरकार को चेतावनी देते हैं-EVM पूरी तरह बंद हो। अन्यथा देश की जनता का चुनाव प्रणाली से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा।"<br /><br />सिंह ने कहा कि लोकतंत्र की आत्मा पारदर्शिता है। बैलेट पेपर ही एकमात्र ऐसा तरीका है जिसमें वोटर खुद अपनी पर्ची देख सकता है और गिनती सबके सामने होती है। उन्होंने यह भी कहा कि देश में कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। चाहे कोई भी संगठन हो, पंजीकृत हो या न हो, संविधान और कानून के दायरे में रहकर ही काम करना होगा। साफ-सुथरी छवि और साफ-सुथरा चुनाव भारतीय जन समाज पार्टी का मूल सिद्धांत है।</div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय जन समाज पार्टी की प्रमुख मांगें:</div>
<div style="text-align:justify;">1. EVM को तत्काल प्रभाव से बंद किया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;">2. 2027 के सभी चुनाव बैलेट पेपर से कराए जाएं।</div>
<div style="text-align:justify;">3. सभी राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की फंडिंग में पूर्ण पारदर्शिता लागू हो।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 22:11:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राजनीतिक हस्तक्षेप से परे हो - छात्रसंघ चुनाव</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में विश्वविद्यालयों में होने वाले छात्रसंघ चुनावों का इतिहास स्वतंत्रता पूर्व काल से जुड़ा हुआ है। उस दौर में छात्र संगठनों ने न केवल विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। स्वतंत्रता के बाद देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में प्रत्यक्ष प्रणाली से छात्रसंघ चुनाव नियमित रूप से आयोजित होने लगे।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निस्संदेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूलों और कॉलेजों के छात्रसंघ चुनावों ने देश को अनेक कुशल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूरदर्शी और जनप्रिय नेता दिए हैं। ऐसे अनेक जनप्रतिनिधि छात्र राजनीति से निकलकर लोकसभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्यसभा तथा केंद्र एवं राज्य</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183622/be-beyond-political-interference-student-union-elections"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/orig_49_1659309656.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में विश्वविद्यालयों में होने वाले छात्रसंघ चुनावों का इतिहास स्वतंत्रता पूर्व काल से जुड़ा हुआ है। उस दौर में छात्र संगठनों ने न केवल विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। स्वतंत्रता के बाद देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में प्रत्यक्ष प्रणाली से छात्रसंघ चुनाव नियमित रूप से आयोजित होने लगे।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निस्संदेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूलों और कॉलेजों के छात्रसंघ चुनावों ने देश को अनेक कुशल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूरदर्शी और जनप्रिय नेता दिए हैं। ऐसे अनेक जनप्रतिनिधि छात्र राजनीति से निकलकर लोकसभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्यसभा तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों के महत्वपूर्ण पदों तक पहुँचे और राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक विश्वविद्यालयों में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक छात्रसंघ चुनाव लोकतांत्रिक मूल्यों और छात्र हितों के प्रतीक बने रहे। उनकी सकारात्मक गूँज गाँवों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कस्बों और महानगरों तक सुनाई देती थी। किंतु समय के साथ राजनीति के बढ़ते दखल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनबल और बाहुबल के प्रभाव ने छात्रसंघ चुनावों की गरिमा को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप अनेक राज्यों में ये चुनाव हिंसक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवादास्पद और अत्यधिक खर्चीले होते चले गए।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजस्थान सहित कई राज्यों में छात्रसंघ चुनावों पर प्रतिबंध लगाने के पीछे मुख्य कारण छात्र गुटों के बीच बढ़ती हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाहरी तत्वों का हस्तक्षेप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वविद्यालय परिसरों में भय का वातावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छात्रों एवं प्राध्यापकों को धमकाना तथा गंभीर आपराधिक घटनाएँ रहीं। यही कारण है कि कई राज्यों में आज भी प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनावों पर प्रतिबंध लागू है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके विपरीत दिल्ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में राज्य सरकारों एवं विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा निर्धारित कड़े नियमों के अंतर्गत आज भी प्रत्यक्ष प्रणाली से छात्रसंघ चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न कराए जाते हैं। वहीं कुछ राज्यों में चुनाव केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय राजनीति का इतिहास इस बात का साक्षी है कि लगभग प्रत्येक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दल में ऐसे अनेक नेता हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से की और आगे चलकर देश एवं राज्यों के नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी राज्यों में विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ चुनाव स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शांतिपूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्पक्ष और लोकतांत्रिक वातावरण में संपन्न कराए जाएँ। इसके लिए राज्य सरकारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वविद्यालय प्रशासन तथा सभी राजनीतिक दलों को दलगत हितों से ऊपर उठकर सकारात्मक पहल करनी होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">छात्रसंघ चुनाव राजनीतिक हस्तक्षेप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनबल और बाहुबल से मुक्त होकर केवल छात्रों के जनसमर्थन और लोकप्रियता के आधार पर संपन्न होने चाहिए। यही व्यवस्था लोकतंत्र की वास्तविक भावना को मजबूत करेगी और विद्यार्थियों में नेतृत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तरदायित्व तथा राष्ट्र निर्माण की भावना विकसित करेगी। यदि युवा पीढ़ी को छात्र जीवन से ही लोकतांत्रिक मूल्यों का व्यावहारिक प्रशिक्षण मिलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भविष्य में देश को अधिक संवेदनशील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सक्षम और उत्तरदायी नेतृत्व प्राप्त होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अरविंद रावल</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 21:50:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वन नेशन, वन इलेक्शन: जेपीसी पहुंचेगी पणजी और लखनऊ</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">प्रस्तावित <strong>संविधान (एक सौ उनतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2024</strong> तथा <strong>संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2024</strong> के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श के उद्देश्य से <strong>'एक राष्ट्र, एक चुनाव'</strong> विषय पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) 10 से 15 जुलाई, 2026 तक गोवा की राजधानी पणजी और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का अध्ययन दौरा करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">समिति के अध्यक्ष <strong><span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">पी. पी. चौधरी</span></span></strong> के नेतृत्व में होने वाले इस दौरे का उद्देश्य प्रस्तावित विधेयकों के देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनाव प्रणाली और शासन व्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का व्यापक अध्ययन करना तथा विभिन्न हितधारकों से सुझाव प्राप्त</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182820/one-nation-one-election-jpc-will-reach-panaji-and-lucknow"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/image-38-1024x612.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">प्रस्तावित <strong>संविधान (एक सौ उनतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2024</strong> तथा <strong>संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2024</strong> के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श के उद्देश्य से <strong>'एक राष्ट्र, एक चुनाव'</strong> विषय पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) 10 से 15 जुलाई, 2026 तक गोवा की राजधानी पणजी और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का अध्ययन दौरा करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">समिति के अध्यक्ष <strong><span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">पी. पी. चौधरी</span></span></strong> के नेतृत्व में होने वाले इस दौरे का उद्देश्य प्रस्तावित विधेयकों के देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनाव प्रणाली और शासन व्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का व्यापक अध्ययन करना तथा विभिन्न हितधारकों से सुझाव प्राप्त करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">अध्ययन दौरे के दौरान समिति क्षेत्रीय स्तर पर संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, राज्य प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों, वित्तीय एवं शैक्षणिक संस्थानों के प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों, राज्य बार परिषदों, संबंधित उच्च न्यायालयों के अधिवक्ता संघों, विभिन्न पेशेवर संगठनों तथा नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के साथ विस्तृत परामर्श करेगी। इन बैठकों में चुनाव प्रणाली में संभावित बदलावों, प्रशासनिक व्यवस्था, वित्तीय प्रभाव, संवैधानिक पहलुओं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">समिति का यह अध्ययन दौरा देशभर में आयोजित किए जा रहे क्षेत्रीय परामर्शों की श्रृंखला का अगला चरण है। इससे पहले समिति मुंबई, देहरादून, चंडीगढ़, शिमला, बेंगलुरु और गांधीनगर में भी इसी प्रकार के अध्ययन दौरे और परामर्श बैठकें आयोजित कर चुकी है। इन बैठकों में विभिन्न राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों, उपमुख्यमंत्रियों, विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारियों, राजनीतिक दलों के नेताओं, बैंकों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों तथा विभिन्न नियामक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने अपने सुझाव प्रस्तुत किए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">पूर्व में आयोजित इन परामर्श बैठकों में महाराष्ट्र, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, चंडीगढ़ तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के प्रतिनिधियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई थी। इसके अलावा <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">भारतीय रिज़र्व बैंक</span></span>, <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड</span></span> तथा <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक</span></span> जैसी प्रमुख संस्थाओं के अधिकारियों एवं विशेषज्ञों ने भी समिति के समक्ष अपने विचार रखे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">समिति को उम्मीद है कि पणजी और लखनऊ में होने वाले आगामी अध्ययन दौरे के दौरान भी विभिन्न वर्गों से उपयोगी सुझाव प्राप्त होंगे। इन सुझावों के आधार पर समिति प्रस्तावित <strong>संविधान (एक सौ उनतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2024</strong> और <strong>संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2024</strong> पर अपनी रिपोर्ट को और अधिक व्यापक तथा व्यावहारिक बनाने की दिशा में आगे बढ़ेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की अवधारणा को लेकर देशभर में विभिन्न स्तरों पर चर्चा जारी है। ऐसे में संयुक्त संसदीय समिति का यह अध्ययन दौरा विभिन्न पक्षों की राय को समाहित करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Jul 2026 18:17:39 +0530</pubDate>
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                            </item>
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                <title>कांग्रेस ने वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देने की मांग की।</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस ने रविवार को वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग की। पार्टी का तर्क है कि ऐसा करने से वोटरों को दबाने और मनमाने ढंग से अयोग्य ठहराने के खिलाफ़ मज़बूत सुरक्षा मिलेगी। स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (</span>SIR) <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रक्रिया के तहत अलग-अलग राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि भारत के चुनाव आयोग का "साफ़ तौर पर पक्षपाती कामकाज" - जिसके बारे में उन्होंने आरोप लगाया कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर काम कर</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181819/congress-demanded-that-the-right-to-vote-be-given-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas20.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस ने रविवार को वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग की। पार्टी का तर्क है कि ऐसा करने से वोटरों को दबाने और मनमाने ढंग से अयोग्य ठहराने के खिलाफ़ मज़बूत सुरक्षा मिलेगी। स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (</span>SIR) <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रक्रिया के तहत अलग-अलग राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि भारत के चुनाव आयोग का "साफ़ तौर पर पक्षपाती कामकाज" - जिसके बारे में उन्होंने आरोप लगाया कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर काम कर रहा था - "पूरी तरह से बेनकाब" हो गया है। उन्होंने कहा कि अब वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देने का समय आ गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि इसे न्यायिक समीक्षा और सुरक्षा का सर्वोच्च स्तर मिल सके।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का ज़िक्र किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें दो जजों की बेंच ने फुटपाथ पर चलने के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया था। उन्होंने सवाल किया कि वोट देने के अधिकार को - जिसे उन्होंने लोकतंत्र के लिए बहुत ज़रूरी बताया - वैसी ही मान्यता क्यों नहीं मिलनी चाहिए।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस नेता ने याद दिलाया कि संविधान सभा ने सरदार पटेल की अध्यक्षता में मौलिक अधिकारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्पसंख्यकों और आदिवासी व बहिष्कृत क्षेत्रों पर एक सलाहकार समिति बनाई थी। </span>21-22<span lang="hi" xml:lang="hi"> अप्रैल</span>, 1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> को हुई बैठक के दौरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समिति ने इस बात पर विस्तार से चर्चा की थी कि क्या वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया जाना चाहिए।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. बी.आर. अंबेडकर और बाबू जगजीवन राम ने वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने का ज़ोरदार समर्थन किया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि सरदार पटेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सी. राजगोपालाचारी और अन्य लोगों का तर्क था कि ऐसा करने से रियासतें भारतीय संघ में शामिल होने में हिचकिचा सकती हैं। उनका मानना था कि संविधान में सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार (यूनिवर्सल एडल्ट फ्रेंचाइजी) देना ही काफ़ी होगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश ने कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">सरदार पटेल का खुद यह मानना था कि सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार अपने आप में एक अंतर्निहित मौलिक अधिकार है। यही अनुच्छेद </span>326<span lang="hi" xml:lang="hi"> की पृष्ठभूमि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सभी वयस्कों को वोट देने के अधिकार के आधार पर चुनाव कराने का प्रावधान करता है।" उन्होंने कहा कि वोट देने का अधिकार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जन प्रतिनिधित्व अधिनियम</span>, 1951' <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत एक कानूनी अधिकार है या एक स्पष्ट मौलिक अधिकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस पर बहस सात दशकों से ज़्यादा समय से चल रही है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश ने कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">अलग-अलग राय सामने आई हैं। हाल ही में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्च </span>2023<span lang="hi" xml:lang="hi"> के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले में जस्टिस अजय रस्तोगी ने अपनी असहमति वाली राय में कहा कि वोट देने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।"</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने वोटिंग से जुड़े कई अधिकारों को पहले ही मान्यता दी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें उम्मीदवारों के आपराधिक बैकग्राउंड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके आर्थिक हितों और राजनीतिक फंडिंग के स्रोतों को जानने का मतदाताओं का अधिकार शामिल है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने तर्क दिया</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">इसने वोट की गोपनीयता की रक्षा की है और </span>NOTA <span lang="hi" xml:lang="hi">के ज़रिए सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार को मान्यता दी है। इसलिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह और भी अजीब बात है कि वोट देने का अधिकार अभी भी सिर्फ़ एक कानूनी अधिकार बना हुआ है। इससे जुड़े सभी अधिकारों को मौलिक घोषित किया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मुख्य अधिकार - जिसके बिना बाकी अधिकार मौजूद नहीं रह सकते - अभी भी कानूनी अधिकार ही बना हुआ है।"रमेश ने कहा कि वोट देने के अधिकार का दर्जा बढ़ाने से लोकतांत्रिक सुरक्षा उपाय मज़बूत होंगे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री के इशारे पर काम करने वाले भारत के चुनाव आयोग के खुले तौर पर पक्षपाती कामकाज के बुरी तरह बेनकाब होने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब समय आ गया है कि वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे इसे न्यायिक समीक्षा और सुरक्षा का उच्चतम स्तर मिल सके।"</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश ने आगे कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">यह मतदाताओं को दबाने या मनमाने ढंग से अयोग्य ठहराने के खिलाफ़ सुरक्षा उपाय लागू करने की दिशा में एक मज़बूत कदम होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो </span>SIR (<span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष गहन संशोधन) प्रक्रिया के तहत अलग-अलग राज्यों में बहुत बड़ी संख्या में हुए हैं। इसका मतलब यह भी होगा कि चुनाव आयोग के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट की ज़्यादा निगरानी रहेगी।"</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Jun 2026 19:24:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पार्टियों की टूट व टूटता भरोसा: लोकतंत्र में सबसे बड़ा नुकसान यही है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181509/the-biggest-loss-in-democracy-is-the-breakdown-of-parties"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया जाता है - "सिद्धांतों से समझौता", "जनता के हित में फैसला"। लेकिन नतीजा एक ही निकलता है - वोटर का भरोसा टूटना।</p><p style="text-align:justify;"><br />टूट क्यों रही हैं पार्टियां? इस पर हमारी सोच वही है जो लगभग सभी की होती है। सत्ता और पद का गणित- पार्टी टूटने का 80% कारण विधायकों और सांसदों की टिकट और मंत्री पद की भूख है। जब हाईकमान टिकट काटता है या किसी और को आगे बढ़ाता है, तो नाराज नेता दूसरी पार्टी या नई पार्टी बना लेते हैं। परिवारवाद और हाईकमान कल्चर-<br />कई क्षेत्रीय पार्टियां एक परिवार के इर्द-गिर्द घूमती हैं। जब दूसरी पीढ़ी तैयार होती है, तो पुराने नेता खुद को साइडलाइन महसूस करते हैं और बगावत करते हैं।</p><p style="text-align:justify;"><br />विचारधारा का कमजोर होना- पहले पार्टियों की पहचान किसी विचारधारा से होती थी। अब ज्यादातर पार्टियां "पावर ब्लॉक" बन गई हैं। विचारधारा बदलते देर नहीं लगती, क्योंकि एजेंडा सत्ता है। वोटर का भरोसा कैसे टूटता है?- जब तुमने 2019 में किसी पार्टी को वोट दिया था, तुमने उसके घोषणापत्र, नेता और विचारधारा पर भरोसा किया था। 2023 में वही विधायक दूसरी पार्टी में चला जाए और 2024 में तीसरी पार्टी में, तो सवाल उठता है। मैंने वोट किसको दिया था? व्यक्ति को, सिंबल को, या पार्टी को?</p><p style="text-align:justify;"><br />क्या मेरा वोट मायने रखता है? अगर चुनाव के बाद गठबंधन बदल जाए तो जनादेश का मतलब क्या रहा? सब एक जैसे हैं- ये सनक नहीं, टूटे भरोसे की उपज है। 2023 के कर्नाटक और महाराष्ट्र चुनाव के बाद CSDS के सर्वे में 47% लोगों ने कहा कि "दलबदल से लोकतंत्र कमजोर होता है"। इसका असर कहां दिखता है? चुनावी राजनीति पर- लोग अब स्थानीय उम्मीदवार देखने लगे हैं, पार्टी नहीं। "पार्टी कोई भी हो, मेरा काम करे" वाला ट्रेंड बढ़ रहा है। नीति निर्माण पर- सरकारें अस्थिर हो जाती हैं। 5 साल का प्लान 2 साल में बदल जाता है क्योंकि गठबंधन बदल गया। युवा राजनीति से दूर हो रहे हैं- कॉलेज चुनावों में भी भागीदारी घट रही है। युवाओं को लगता है कि राजनीति सिर्फ सौदेबाजी है। नोटा का बढ़ना- 2019 के बाद से कई सीटों पर नोटा को मिले वोट 2-3% तक पहुंच गए हैं। ये विरोध का साइलेंट तरीका है।</p><p style="text-align:justify;"><br />               दलबदल कानून कहां फेल हुआ?- 1985 में 52वां संविधान संशोधन लाकर दलबदल विरोधी कानून बनाया गया। मकसद था कि विधायक पार्टी न बदलें। लेकिन कानून में एक खामी छोड़ दी गई - अगर 2/3 विधायक साथ छोड़ दें तो वो "विलय" कहलाता है और अयोग्यता नहीं लगती। इसी खामी का फायदा लेकर महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश में सरकारें गिरीं। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि स्पीकर का फैसला समय पर नहीं आता, जिससे कानून का मकसद ही खत्म हो जाता है। क्या हो सकता है समाधान?- 2/3 वाली छूट हटाओ- अगर पार्टी टूटती है तो सबको अयोग्य ठहराओ। फिर जनता के पास जाओ और दोबारा चुनाव लड़ो।</p><p style="text-align:justify;"><br />फंडिंग में पारदर्शिता-  चुनाव आयोग को हर लेन-देन का हिसाब मिले ताकि नेताओं को खरीद-फरोख्त न हो सके। आंतरिक लोकतंत्र-  पार्टियों में चुनाव हों, युवा और कार्यकर्ताओं की सुनवाई हो। जब अंदर लोकतंत्र होगा तो बाहर टूट कम होगी। वोटर एजुकेशन-  लोगों को समझाना होगा कि वोट सिंबल को जाता है, व्यक्ति को नहीं। ये बात स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई जाए। स्थानीय मुद्दों पर वोट-  लोग अब पानी, सड़क, स्कूल को देखकर वोट कर रहे हैं, न कि बड़े नेता के नाम पर। सोशल मीडिया पर जवाबदेही- विधायक अगर पाला बदलता है तो अगले 6 महीने तक ट्रोल होता है। ये डर कुछ हद तक काम कर रहा है। नए विकल्प की तलाश AAP जैसे दल इसी भरोसे के संकट से पैदा हुए। पार्टियों का टूटना लोकतंत्र में स्वाभाविक है, लेकिन जब हर 2 साल में गठबंधन और दल बदल जाएं, तो जनता को लगता है कि उसका वोट सिर्फ सत्ता का सीढ़ी है।</p><p style="text-align:justify;"><br />लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है, ये भरोसे का कॉन्ट्रैक्ट है। जब पार्टियां उस कॉन्ट्रैक्ट को तोड़ती हैं, तो नुकसान वोटर को होता है। और एक बार भरोसा टूट जाए, तो उसे दोबारा जोड़ने में 10 साल लग जाते हैं।<br />अगली बार जब कोई नेता पाला बदले, तो सवाल पूछो: "तुम पार्टी बदले, मेरी समस्या बदली क्या?"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 20:39:21 +0530</pubDate>
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