‌ पीएम केयर्स फंड पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर



स्वतंत्र प्रभात।

‌प्रयागराज-केयर्स फंड पर उच्चतम न्यायालय ने भी आज अपनी मुहर लगा दी और मंगलवार को वह याचिका खारिज कर दी जिसमें पीएम केयर्स फंड से राशि को राष्ट्रीय आपदा राहत कोष (एनडीआरएफ) में ट्रांसफर करने की मांग की गई थी। जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने कहा कि पीएम केयर्स फंड का पैसा नेशनल डिजास्टर रेस्पॉन्स फंड (एनडीआरएफ) में ट्रांसफर करने का आदेश नहीं दे सकते। ये दोनों अलग-अलग फंड हैं। कोई व्यक्ति एनडीआरएफ में चंदा या अपना योगदान देना चाहे तो उस पर कोई रोक नहीं है। इसके साथ ही नई आपदा राहत योजना की भी कोई आवश्यकता नहीं है।

‌सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (सीपीआईएल) ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण  के जरिए यह याचिका दाखिल की थी। सीपीआईएल का कहना था कि पीएम केयर्स फंड बनाकर सरकार ने आपदा प्रबंधन कानून की अनदेखी की है। आपदा प्रबंधन के लिए किसी भी व्यक्ति या संस्था से दान में मिलने वाली रकम नेशनल डिजास्टर रेस्पॉन्स फंड (एनडीआरएफ) के खाते में ही जानी चाहिए। पीएम केयर्स फंड में जो भी रकम मिली है, उसे एनडीआरएफ में ही ट्रांसफर किया जाए। कोरोना से निपटने के लिए डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत नई योजना बनाकर नोटिफाई की जाए।

‌याचिका में पीएम केयर्स फंड में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष में प्राप्त महामारी से निपटने और धन हस्तांतरित करने को लेकर एक राष्ट्रीय योजना तैयार करने के लिए दिशा-निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि पीएम केयर्स फंड में प्राप्त राशि का कैग द्वारा ऑडिट नहीं किया जा रहा है और इसका खुलासा नहीं किया जा रहा है। याचिका में कहा गया था कि डीएम एक्ट के मुताबिक आपदा प्रबंधन के लिए किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा दिया गया कोई भी अनुदान अनिवार्य रूप से एनडीआरएफ को ट्रांसफर किया जाना चाहिए।

‌केंद्र सरकार ने 8 जुलाई को उच्चतम न्यायालय में एफिडेविट दिया था। उसका कहना था कि कोरोना से राहत के कामों के लिए पीएम केयर्स फंड बनाया गया था। पहले भी ऐसे कई फंड बनाए जाते रहे हैं। एनडीआरएफ जैसा संवैधानिक फंड होने का मतलब यह नहीं है कि वॉल्यूंटरी डोनेशन के लिए पीएम केयर्स जैसे दूसरे फंड नहीं बनाए जा सकते। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी थी कि पीएम केयर्स फंड बनाने का मकसद एनडीआरएफ को फेल करना नहीं था, जैसा कि याचिका में आरोप लगाया गया है।

‌पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय आपदा योजना कोविड 19 के लिए पर्याप्त है।कोविड- 19 से पहले निर्धारित राहत के न्यूनतम मानक कोविड-19 से निपटने के लिए पर्याप्त हैं। केंद्र एनडीआरएफ  का उपयोग कर सकता है। कोई भी संस्था पीएम केयर्स फंड में योगदान करने के लिए निषिद्ध नहीं हो सकती तथा पीएम केयर्स फंड में एकत्रित दान एक चैरिटेबल ट्रस्ट के लिए है। उन्हें एनडीआरएफ में ट्रांसफर करने की आवश्यकता नहीं है। पीठ ने कहा कि पीएम केयर्स फंड चैरिटी फंड की तरह है, इसलिए इसमें जमा रकम को ट्रांसफर करने की कोई जरूरत नहीं है। पीठ ने साफ कर दिया कि कोई भी व्यक्ति या संस्थान एनडीआरएफ में दान कर सकता है। पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार इसकी राशि को उचित जगह ट्रांसफर करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। पीठ ने कहा कि एनडीआरएफ में योगदान करने के लिए किसी भी व्यक्ति और कॉर्पोरेट्स के लिए कोई वैधानिक बाधाएं नहीं हैं।

‌पीठ ने 27 जुलाई को इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। 17 जून को कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया था। अपने जवाब में केंद्र सरकार ने कहा था कि कोविड-19 महामारी के दौरान पीएम केयर्स फंड को स्वैच्छिक दान के लिए बनाया गया है। यह एनडीआरएफ जैसे सांविधिक फंड से अलग है।

‌सरकार ने 28 मार्च को पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के तौर पर यह फंड बनाया था। इसका मकसद कोरोना जैसी इमरजेंसी से निपटने के लिए इंतजाम करना था। पीएम केयर्स फंड के मुखिया प्रधानमंत्री हैं और सरकार इसका संचालन करती है। कोरोना काल में कॉरपोरेट से लेकर इंडिविजुअल तक ने इस फंड में डोनेशन दी।सीपीआईएल का कहना था कि डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट की धारा 46 के तहत नेशनल डिजास्टर रेस्पॉन्स फंड में दान की रकम जमा करने की व्यवस्था है, तो फिर कोरोना से लड़ाई के लिए मिलने वाली डोनेशन पीएम केयर्स फंड में जमा क्यों करवाई जा रही है? पीएम केयर्स फंड का कैग से ऑडिट भी नहीं करवाया जा रहा। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी इस फंड पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि इस फंड में डोनेशन देने वालों का नाम बताने से प्रधानमंत्री क्यों डरते हैं?

‌दरअसल सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (सीपीआईएल) की ओर से वकील प्रशांत भूषण द्वारा दायर याचिका में धारा 11 के तहत एक राष्ट्रीय योजना की स्थापना के लिए, आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 की धारा 10 के साथ पढ़ने के लिए अनुरोध किया गया था, जिससे वर्तमान महामारी से निपटा जा सके  और, डीएम अधिनियम  की धारा 12 के तहत राहत के न्यूनतम मानकों को पूरा किया जा सके। इसमें यह भी कहा गया था कि केंद्र को डीएम अधिनियम की धारा 46 के अनुपालन में कोविड-19 महामारी के खिलाफ लड़ाई में व्यक्तियों से सभी योगदान या अनुदान सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से एनडीआरएफ का उपयोग करने के लिए निर्देशित किया जा सकता है और एनडीआरएफ की धारा 46 (1) (बी) के तहत पीएम केयर्स फंड को उसमें क्रेडिट किया जाएगा। याचिका में कहा गया है कि अब तक पीएम केयर्स फंड में एकत्रित सभी फंड को एनडीआरएफ में हस्तांतरित करने का निर्देश दिया जा सकता है।

‌सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन के लिए वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने तर्क दिया था कि पीएम केयर्स फंड की स्थापना वास्तव में एक संविधान के साथ धोखा है, जो बिना किसी पारदर्शिता के बनाया गया है। याचिका में कहा गया था कि एनडीआरएफ का उपयोग अधिकारियों द्वारा स्वास्थ्य संकट के बावजूद नहीं किया जा रहा है, और पीएम केयर्स फंड की स्थापना डीएम अधिनियम के दायरे से बाहर है। इसमें पीएम केयर्स फंड के संबंध में पारदर्शिता की कमी के मुद्दे को उठाया गया है, जिसमें कहा गया है कि यह कैग ऑडिट के अधीन नहीं है और इसे सार्वजनिक प्राधिकरण की परिभाषा के तहत आरटीआई अधिनियम के दायरे से बाहर घोषित किया गया है।

‌ प्रयागराज ब्यूरो से दया शंकर त्रिपाठी एवं वरिष्ठ पत्रकार तथा कानून के जानकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।