संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कारों में रामलीला कलाकारों की उपेक्षा क्यों

डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनन्दी बेन पटेल द्वारा बीती 13 फरवरी को संगीत, नृत्य, नाट्य आदि विभिन्न विधाओं के 128 कलाकारों तथा लेखकों को संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार प्रदान किये गए थे| पुरस्कार प्राप्त करने वालों में वर्ष 2009 से 2019 तक वर्षवार चयनित हुए कला साधक शामिल हैं| केन्द्रीय संगीत नाटक अकादेमी, नयी दिल्ली द्वारा वर्ष 2018 के पुरस्कार प्राप्त करने वालों की सूची भी जारी हो चुकी है| संगीत, नृत्य, नाट्य आदि विभिन्न विधाओं से जुड़े 45 कलाकारों एवं विद्वानों को जल्द ही राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित करवाया जायेगा| यहाँ आश्चर्य की बात यह है कि उपरोक्त पुरस्कार प्राप्त करने वालों में रामलीला का एक भी कलाकार नहीं है| न तो उ.प्र.संगीत नाटक अकादेमी द्वारा जारी की गई वर्ष 2009 से 2019 तक की सूची में एक भी रामलीला कलाकार का नाम है और न ही केन्द्रीय संगीत नाटक अकादेमी की सूची में| इसके पूर्व के वर्षों में भी प्रथम दृष्टया कहीं भी किसी रामलीला कलाकार का नाम संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार प्राप्त करने वालों की सूची में दृष्टिगोचर नहीं होता है|

रामलीला भारत का एक मात्र ऐसा लोकनाट्य है जिसके सबसे अधिक मंचन होते हैं| वह भी विभिन्न भाषाओँ में| यह लोकनाट्य देश ही नहीं बल्कि विश्व के दर्जन भर से भी अधिक देशों में मंचित होता है| वर्ष 2005 में यूनेस्को द्वारा विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में भी रामलीला को सूचीबद्ध किया जा चुका है| इसके बावजूद भी संगीत नाटक अकादेमी द्वारा रामलीला कलाकारों की उपेक्षा समझ से परे है| वह भी उत्तर प्रदेश में, जहाँ इस लोकनाट्य और इसके नायक का जन्म हुआ है| इसके पीछे कहीं न कहीं चयनकर्ताओं की रामलीला के प्रति संकीर्ण मानसिकता का दर्शन होता है| क्योंकि संकीर्ण मानसिकता के लोग अक्सर रामलीला को हिन्दू समाज का एक धार्मिक आयोजन मानकर कला की दृष्टि से सदैव इसकी उपेक्षा करते रहते हैं| उन्हें यह भलीभांति समझना चाहिए कि रामलीला यदि मात्र हिन्दू समाज का धार्मिक आयोजन होता तो इसके मंचन इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे मुस्लिम देशों तथा श्रीलंका, थाईलैण्ड, वियतनाम, लाओस एवं कम्बोडिया जैसे बौद्धधर्मी देशों में न हो रहे होते|

नेपाल, रूस, मारीशस, सूरीनाम, त्रिनिडाड एवं टोबैगो आदि अनेक देशों में भी रामलीला को विशेष महत्व प्राप्त है| त्रिनिडाड की संसद ने तो रामलीला के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए वाकायदा कानून पारित करके राष्ट्रिय स्तर पर एक रामलीला परिषद् का गठन किया है| इस तरह से रामलीला को विश्व के लोकनाट्य के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है| ऐसे लोकनाट्य के कलाकारों की संगीत नाटक अकादेमी द्वारा उपेक्षा किये जाने से आश्चर्य चकित होना स्वाभाविक है| रामलीला अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र राम के जीवन से जुड़ी घटनाओं का मात्र नाट्य रूपान्तरण नहीं है बल्कि यह भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के उच्च आदर्शों की एक सम्पूर्ण गाथा है|

यह गाथा है उच्च मानवीय मूल्यों की| यह गाथा है उच्च आदर्शवादी समाज की| यह गाथा है आदर्शों के उच्चतम शिखर पर दृढ़ता से खड़ी राजनीति की| यह गाथा है आदर्श परिवार की| यह गाथा है मर्यादा की सीमाओं में बंधे ईमानदार एवं दृढ़ निश्चयी व्यक्तित्व की| इसीलिए अति प्राचीन होते हुए भी रामलीला में सर्वथा नवीनता का दर्शन होता है| यह बात पूर्ण दावे से कही जा सकती है कि भारत का कोई भी लोकनाट्य, लोकगीत या लोक संगीत जिनके पुरस्कृत कलाकारों की एक बड़ी सूची दोनों ही संगीत नाटक अकादेमियों के पास है, ऐसा नहीं है जो भारत की प्राचीन संस्कृति के सार्वभौमिक स्वरुप का दर्शन कराने की क्षमता रखता हो| जबकि रामलीला भारत की प्राचीन संस्कृति एवं सभ्यता को स्वयं में समेटे हुए अनेकता में एकता का संदेश सदियों से देती चली आ रही है|

अयोध्या, बनारस, कानपुर, बाँदा, मथुरा और दरभंगा (विहार) जैसे कई शहर रामलीला की व्यावसायिक मण्डलियों के बहुत बड़े गढ़ के रूप में प्रतिष्ठित हैं| उसमें भी कानपुर की रामलीला अपनी प्रयोगधर्मिता के लिए दूर-दूर तक चर्चित है| जहाँ के अनगिनत कलाकारों ने अपना पूरा जीवन इस लोकनाट्य के लिए सम्पर्पित कर दिया है| कानपुर और आसपास के जनपदों में पूरे वर्ष रामलीला के हजारों मंचन होते हैं और लगभग प्रत्येक कलाकार एक वर्ष में 100 से भी अधिक मंचों पर अभिनय करने जाता है| जनक का अभिनय करने वाले सिर्फ जनक का ही अभिनय करते हैं, परशुराम का अभिनय करने वाले सिर्फ परशुराम का अभिनय करते हैं तथा लक्ष्मण का अभिनय करने वाले सिर्फ लक्ष्मण का अभिनय करते हैं| यही स्थिति अन्य पात्रों की भी है| यहाँ के आयोजकगण स्वयं ही अपने मंच के लिए पात्रों का चयन उनके अभिनय कौशल के आधार पर करते हैं| ऐसे कलाकारों को उनके अभिनय विशेष के लिए ही जाना जाता है और उन्हें उसी अभिनय के लिए ही सदैव आमन्त्रित किया जाता है|

कानपुर की विशेष संवाद शैली दूर-दूर तक चर्चित| जो हर रोज नवीनता से ओतप्रोत रहती है| मात्र 10 वर्ष की आयु से रामलीला में अभिनय शुरू करने वाले 90 वर्षीय पं.इन्द्र नारायण मिश्र को दर्जनों राग-रागिनियाँ कंठस्थ हैं और वह रामलीला का कोई भी अभिनय करने की सामर्थ्य आज भी रखते हैं| 89 वर्षीय पं.वंश लाल त्रिपाठी ‘शलभ’ ने सन 1946 में जनक का अभिनय प्रारम्भ किया था| कानपुर और इसके आसपास का बच्चा-बच्चा आज भी उन्हें जनक के प्रभावशाली अभिनय के लिए जानता है| उन्होंने 4 हजार से भी अधिक मंचो पर जनक का अभिनय किया है| कानपुर में रामलीला के ऐसे दर्जनों अभिनेता हैं, जिनका अभिनय कौशल सहज ही लोगों को आकर्षित करता है और उनके नाम पर हजारों लोगों की भीड़ जुटती है| क्या इन अभिनेताओं की कला को प्रोत्साहन नहीं मिलना चहिये? लेकिन मिले भी तो कैसे? आखिर किसके पास इतना समय है कि कोई इन्हें ढूंढकर इनकी कला को परख सके और यदि कोई ढूंढ भी ले तो संगीत नाटक अकादेमी की चयन समिति की दृष्टि में उसकी कोई अहमियत नहीं होती है| संगीत नाटक अकादेमी केन्द्र की हो या प्रदेश की, दोनों में ही पुरस्कारों के लिए कलाकारों के चयन का जो तरीका है वह भी अदभुत है| वर्तमान व्यवस्था के अनुसार केवल अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कलाकार ही दूसरे कलाकार की अनुसंशा कर सकता है| ऐसे में रामलीला के कलाकारों की अनुशंसा भला कौन और क्यों करेगा? क्योंकि रामलीला का तो कोई कलाकार ऐसा है ही नहीं जिसे केन्द्र या प्रदेश की संगीत नाटक अकादेमी से कभी सम्मानित किया गया हो और दूसरी विधा वाला कलाकार रामलीला कलाकार की अनुशंसा करने से रहा|

कदाचित दूसरी विधा वाला कोई कलाकार पुरस्कार के लिए यदि किसी रामलीला कलाकार की अनुशंसा कर भी दे तो चयन समिति उस पर विचार नहीं करती है| केन्द्रीय संगीत नाटक अकादेमी से सम्मानित पं.रामदयाल शर्मा ने बीते वर्ष पं.वंश लाल त्रिपाठी के नाम की अनुशंसा की थी| परन्तु चयन समिति ने उस पर कोई विचार ही नहीं किया| बांसुरी वादक को सम्मान मिल सकता है, नक्कारा वादक को सम्मान मिल सकता है, तबला वादक को सम्मान मिल सकता है, लोकगायकों को सम्मान मिल सकता है कुटीयट्टम और यक्षगान के कलाकारों को सम्मान मिल सकता है, नौटंकी के कलाकारों को सम्मान मिल सकता है| लेकिन भारतीय संस्कृति के सार्वभौमिक स्वरुप को आत्मसात कराने वाले तथा विश्व में सर्वाधिक मंचित होने वाले लोकनाट्य के कलाकार को सम्मानित करना संगीत नाटक अकादेमी की चयन समिति को स्वीकार नहीं है| दिल्ली स्थित केन्द्रीय संगीत नाटक अकादेमी का कार्यक्षेत्र पूरा भारत है| अतः प्रदेश स्तर की संगीत नाटक अकादेमी का कार्य क्षेत्र सम्बन्धित प्रदेश ही होना चाहिए|

लेकिन उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादेमी कोलकाता, मुम्बई, पूणे और हरियाणा तक के कलाकारों को पुरस्कृत करती है| जबकि उत्तर प्रदेश के मूल लोकनाट्य रामलीला के कलाकारों के प्रति उसका कोई चिन्तन नहीं है| इसके अलावा संगीत नाटक अकादेमी की महापरिषद, कार्यकारी बोर्ड तथा चयन समिति में भी शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति शामिल हो जिसकी पृष्ठभूमि रामलीला से जुडी हुई हो| इससे स्वयं सिद्ध हो जाता है कि देश और प्रदेश के संस्कृति विभाग विश्व स्तरीय लोकनाट्य रामलीला के प्रति कितने अधिक संवेदनशील हैं|

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