संवैधानिक नियमों में एनकाउंटर का जिक्र नहीं, मानवाधिकार आयोग और सुप्रीमकोर्ट ने जारी किए सीआरपीसी के नियम

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मोहित कुमार

सीआरपीसी की धारा पुलिस को बल प्रयोग करने का अधिकार प्रदान करती है।भारतीय संविधान में एनकाउंटर शब्द का जिक्र कहीं नहीं है। पुलिस अपनी रक्षा के लिए सीआरपीसी की धारा 46 के मुताविक बल प्रयोग कर सकती है। आज देखा जाए तो काफी हद तक पुलिस अपना बल प्रयोग गलत दिशा में करती है।

पुलिस अपनी भाषा में इस धारा का प्रयोग अपनी सुरक्षा, चरमपंथी अपराधीयों में हुई मुठभेड में कर सकती है। ऐसी स्थिति में पुलिस द्वारा एनकाउंटर जायज ठहराया जाएगा। पुलिस अपनी आत्मरक्षा के लिए नियमों के मुताविक अपराधी पर गोली चला सकते है।आखिर सीआरपीसी की धारा का मतलब क्या है?पुलिस किसी भी एनकाउंटर को मुठभेड दिखाने का प्रयास करती है, और अपनी आत्मरक्षा करने का जिक्र करती है।

अपराधिक मामले में सीआरपीसी की धारा 46 में जिक्र इस प्रकार हुआ है। कि यदि कोई अपराधी गंभीर घटना को अंजाम देकर पुलस के चंगुल से भागने का प्रयास करता है। और पुलिस के साथ हाथापाई करने की कोशिश करता है, साथ ही पुलिस के हथियार छीनकर हमला करता है। इस स्थिति में पुलिस अपनी रक्षा में अपराध पर जबाबी कार्यवाही कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग ने अपराध संहिता के लिए पुलिस को जवाबी कार्यवाही करने के कुछ नियम कानून बनाए है।एनकाउंटर करने की प्रतिक्रिया पर सुप्रीमकोर्ट के दिशा निर्देशपुलिस के द्वारा मुठभेड़ में की गई हत्याए कानून के मुताविक एकस्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग कहा जाता है।


सुप्रीमकोर्ट के मुताविक स्पष्ट किए कुछ प्रमुख नियम, जिनको पालन करना एनकाउंटर में अतिमहत्वपूर्ण है।
भारत के चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा और जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की बैंच ने 23 सितंबर 2014 एक महत्वपूर्ण फैसले के दौरान एनकाउंटर के विषय का जिक्र किया था। उन्होंने पुलिस मुठभेड़ में हुए एनकाउंटर की निष्पक्ष और स्वतंत्र प्रभार जांच करने का अहम फैसला दिया था।एनकाउंटर से संबंदित कुछ महत्वपूर्ण नियम-* एनकाउंटर से जुडी अपराधिक गतिविधियों की सूचना लिखित रूप में अन्यथा इलेक्ट्रॉनिक आयामों के माध्यम से देना अनिवार्य है।


* अपने ज्यूडिशियल क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अपराधिक गतिविधियों की सूचना मिलती है, कहीं गोलीवारी में किसी की मृत्यू हो जाती है। सूचना मिलने के दैरान तुरंत धारा 157 के तहत कोर्ट में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है।
* एनकाउंटर से जुडे मामले की जांच निष्पक्ष सीआईडी द्वारा अन्यथा दूसरे पुलिस स्टेशनों से करवानी चाहिए। इसकी निगरानी सीनियर ऑफिसर के द्वारा होनी चाहिए, जिसकी पोस्ट रैंक एक स्टेप ऊपर होनी जरूरी है।
* पुलिस फायरिंग में हुई प्रत्येक मौत की धारा 176 के तहत मजिस्ट्रियल जांच करवाना जरूरी है, जिसकी एक रिपोर्ट कॉपी न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास उपस्थित करवानी चाहिए।


* एनकाउंटर से जुडी निस्पक्ष जांच जबतक पूरी नहीं होती, मामले में शंका खत्म नहीं हो जाती तबतक एनएचआरसी को प्रत्येक घटना क्रम की जानकारी देनी चाहिए, एनएचआरसी को जांच में शामिल करना जरूरी होता है। इसकी सूचना मानवाधिकार आयोग को भी भेजना अनिवार्य है।क्या है अनुच्छेद 141?न्यायिक कोर्ट के मुताविक, भारतीय संविधान में अपराधिक गतिविधियों के दौरान एनकाउंटर होता है, तो हमें दिए गए नियमों का पालन करना अनिवार्य है।

संविधान के मुताविक अनुच्छेद 141 सुप्रीम कोर्ट को नये नियम कानून को बनाने में ताकत प्रदान करता है।राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कुछ खास निर्देशसाल 1997 के तत्कालीन एनएचआरसी के अध्यक्ष जस्टिस एमएन वेंकटचलैया ने देश के सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा था, जिसमें उनकों सूचना सरकारी और प्राइवेट संगठनों द्वारा मिली थी, कि पुलिस द्वारा किए गए एनकाउंटर फर्जी है। पुलिस द्वारा अपराधिक मामलों में दोषी को कोर्ट के नियमों का पालन करने की बजह मुठभेड़ दिखाकर एनकाउंटर करने में अधिक महत्व देती है।

पुलिस को कब है किसी अपराधी को मारने का अधिकार?आपको बता दूं कि जस्टिस एमएन वेंकटचलैया साल 1993-94 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश निर्वाचित रहे। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि पुलिस को किसी अपराधी को मारने का अधिकार कानूनी दायरे में जबतक नहीं है तबतक पुलिस प्रशासन पर घातक हमला न हो।पुलिस को एनकाउंटर करने के लिए चयनित दो अधिकार* पुलिस अपनी आत्मरक्षा करने के लिए एनकाउंटर कर सकता है।


 * सीआरपीसी की धारा 146 के तहत पुलिस को बल प्रयोग करने का पूरा अधिकार होता है। अगर किसी ऐसे अपराधी की मुठभेड़ में मौत होती है, जिसको मौत की सजा या आजीवन कारावास निर्धारित की गई हो।पुलिस मुठभेड़ के दौरान हुई मौत में तय किए गए नियम-* एनएचआरसी के द्वारा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एनकाउंटर के लिए तय किए गए नियम,
* पुलिस मुठभेड़ में हुए एनकाउंटर की सूचना मिलते ही थाना प्रभारी या चौकी प्रभारी को उस घटना को रजिस्टर में दर्ज करनी चाहिए ताकि सीनियर ऑफिसर को पूरा माजरा बताया जा सके।
* किसी एनकाउंटर में कोई शंका होती है तो इसकी जांच सीबीआई या दूसरे पुलिस स्टेशनो के सीनियर ऑफिसरों द्वारा करवानी चाहिए।
* अगर एनकाउंटर गलत होता है या जांच में पुलिस अधिकारी दोषी पाए जाते है तो मारे गए व्यक्तियों के परिजनों को उचित मुआवजा मिलना जरूरी है। और पुलिस अधिकारियों पर कार्यवाही के भी निर्देश दिए जा सकते है।एनएचआरसी के द्वारा निर्धारित कुछ महत्वपूर्ण नियम-12 मई 2010 एनएचआरसी के अध्यक्ष जस्टिस जीपी माथुर के मुताविक, पुलिस को अपनी मनमानी से मारने का अधिकार नहीं है। पुलिस पर किसी भी प्रतिक्रिया से जानलेवा हमला होता है तो पुलिस अपना बल प्रयोग कर सकती है।

इस स्थिति में पुलिस पर कोई झूठा आरोप लगे तो उसके खिलाफ आईपीसी के तहत मामला दर्ज करना जरूरी है। और मारे गए लोगों की मजिस्ट्रेट जांच 3 महीने के भीतर होनी चाहिए। राज्य में पुलिस कार्यवाही के दौरान हुई मौतो की पुष्टि कर जांच रिपोर्ट 48 घंटे के भीतर एनएचआरसी को सौपनी चाहिए। 3 महिने के बाद एक रिपोर्ट आयोग के पास भेजनी चाहिए। जिसमें पोस्टमार्टम रिपोर्ट, जांच रिपोर्ट, मजिस्ट्रेट रिपोर्ट शामिल होनी चाहिए।      

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