कबीर उवाच: नरकेउ मा ठेली कै ठेला…..

कबीर उवाच: नरकेउ मा ठेली कै ठेला.....

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

कर्मों के अनुसार गति मिलती है स्थान विशेष के कारण नहीं। मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति काशी में देह त्यागता है तो उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इसीलिए हिन्दू धर्म में मृत शरीरों का दाह-संस्कार गंगा के किनारे बने घाटों पर किया जाता है। यहाँ दूर-दराज से लोग अपने प्रियजनों का शव लेकर आते हैं और उनका दाह-संस्कार करते हैं। ऐसा करने से उन्हें इस बात की सन्तुष्टि मिलती है कि मृतक की आत्मा का भटकाव समाप्त हो जायेगा और उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी।
14वीं शताब्दी में एक महान सूफी सन्त की पैदाइश हुई थी।
बकौल उसके उसका जन्म काशी में हुआ था और वह स्वामी रामानन्द का शिष्य था। जी हाँ हम बात कर रहे हैं भक्तिकालीन निर्गुण धारा के रहस्वादी कवि सन्त कबीर की। वही सन्त कबीर जिन्हें भगत कबीर या फिर कबीर दास भी कहा जाता है। इनकी पैदाइश को लेकर कुछ भी स्पष्ट नही है। हमें पढ़ाया गया है कि ये काशी के पास लहरतारा नामक स्थान पर एक तालाब के किनारे नवजात शिशु के रूप में नीरू व नीमा नामक जुलाहे दम्पत्ति को मिले थे। इसी दम्पत्ति ने इस बच्चे का पालन पोषण किया और नाम रखा कबीर।
कबीर जीविका के लिए जुलाहे का काम करते थे। सयाने होने पर इनकी शादी लोई नामक युवती से हुई, जिसके संसर्ग से कमाल और कमाली नाम के पुत्र और पुत्री का जन्म हुआ। जैसे-जैसे समय बीतता गया, इस सूफी सन्त के सामने परिवार के संचालन व भरण-पोषण का संकट उत्पन्न होने लगा। घर में हमेशा चिक-चिक होने लगी। उनकी पत्नी व पुत्र उन्हें प्रताड़ित करने लगे। तरह-तरह के ताने-उलाहने सुनते हुए भगत कबीर की निर्गुण काव्यधारा बहती रही। निरपेक्ष भाव से लोगों में सामाजिक चेतना जगाने वाले कबीरदास को हिन्दू-मुसलमान दोनों फिरकों से उपेक्षा ही मिलती रही।
समय बीतता गया और कबीरदास अपनी उम्र के उस पड़ाव पर पहुँचे जहाँ उन्हें घर में पत्नी और पुत्र द्वारा असहनीय प्रताड़ना दी जाने लगी। अन्ततः थक-हार कर इस सूफी सन्त ने काशी छोड़ दिया और मगहर पहुँचकर धुनी रमा ली। काशी से मगहर पहुँचने और इस स्थान पर प्राण त्यागने के बारे में जानकारों का कहना है कि कबीर दास इस बात को सिद्ध करना चाहते थे कि- गति कर्म के अनुसार मिलती है स्थान विशेष के कारण नहीं।
परन्तु हमारा अपना मानना है कि इस संसार में मानव रूपी प्राणी जिस रिश्ते में है वह स्वार्थ के चलते ही एक दूसरे को तरजीह व तवज्जो देता है। जब तक स्वार्थ सिद्धि हो रही है तभी तक अच्छा पिता, अच्छा पति व अच्छा पुत्र, भाई के रूप में लोगों के बीच में यथोचित लाइक्स एण्ड कमेन्ट्स पाता है। इतना कहकर सुलेमान ने अपने संक्षिप्त व्याख्यान पर विराम लगाया और पूछा भाई कलमघसीट कैसे हो? किस तरह कट रही है….आदि….आदि….आदि। इसके साथ ही सुलेमान ने बोतल के पानी को मुँह से लगाया और पूरा बोतल खाली कर दिया। पूछना पड़ा क्यों भाई जान आज इतने लम्बे अन्तराल बाद कैसे हमारी याद आ गई।
खैरियत तो…..? इतना सुनते ही सुलेमान ने कहा कि- अमाँ मियाँ कोरोना काल, लाक डाउन, अनलाक, कोविड-19 प्रोटोकाल, सरकारी गाइड लाइन्स के अलावा कड़ाके की ठण्ड से जब थोड़ी निजात मिली तो तुम तक चला आया। अपना बताओ। आज कल लेखन कार्य बन्द कर दिये हो। कुछ लिखो। मैंने कहा कि डियर आज तुम्हें सूफी सन्त कबीर दास क्यों याद आ रहे हैं? इस प्रश्न पर सुलेमान गम्भीर हो गया, और सोच की मुद्रा बनाकर वर्षो पुराने जीर्ण स्टूल पर बैठा हुआ बोला। अमां यार कैसा जमाना आ गया।
50 साल पहले जो लिखा-पढ़ा जाता था, तत्समय वह काल्पनिक भले रहा हो, परन्तु हमारा उस समय का लेखन वर्तमान में चरितार्थ हो रहा है। मतलब यह कि- स्वारथ लागि करैं सब प्रीति, सुर-नर-मुनि सबकी याही रीति…….। बाप बड़ा न मइया, सबसे बड़ा रूपइया। काश जवानी में ही हमने निःस्वार्थ भाव से समाज सुधारने का काम न किया होता। और धन संचय पर फोकस रहता तो शायद आज यह नौबत न आती कि पेट पर दोनों हाथ रखकर सोना पड़ता। रोटी की मोहताजी रहती। बीबी और बेटों के ताने सुनने को मिलते……। उसे रोकते हुए मैंने कहा कि भाई जान कबीर और आपके इस कथन का क्या सम्बन्ध…..? सुलेमान नाराज होकर बोलता है कि पहले सुन लिया करो तब टोका करो। मैं चुप हो जाता हूँ….वह शुरू हो जाता है।
डियर कलमघसीट यदि भगत कबीर की माली हालत ठीक रहती तो उनकी पत्नी और पुत्र उनसे खुश रहते। आये दिन प्रताड़ित न करते। जानते हो मेरी रिसर्च के अनुसार कबीर दास का बेटा सब्जी के नाम पर उन्हें कुकुरमुत्ता (मशरूम) खिलाता था और चूल्हे पर रोटियाँ बना रही उनकी बीबी लोई रोटी मांगने पर लुआठा दिखाती थी और कभी-कभी तो उनके पृष्ठ भाग पर उसी से प्रहार भी करती थी। यदि इस तरह की घरेलू प्रताड़ना न पाते तो कबीर ‘कबीर’ न होते। ऐसा न होता तो वे काशी क्यों छोड़ते, मगहर न जाते और जब काशी में मरते तो मान्यता के अनुसार मोक्ष भी पाते।
कहते हैं कि हर सफल व्यक्ति की सफलता के पीछे किसी स्त्री हाथ होता है। कबीर दास वैश्विक स्तरीय समाज सुधारक व सूफी सन्त की श्रेणी में अपनी पत्नी लोई की प्रताड़ना की वजह से ही आये।
पुत्र कमाल ने इसमें सोने पर सुहागा जैसा काम किया। एक मिनट…..एक मिनट……आज कबीरदास उनकी पत्नी और पुत्र क्यों याद आ रहे हैं? सुलेमान कहता है कि क्यों न याद आवें। अरे भइया हमने भी 50 साल समाज सुधारने का ही काम किया है और ठीक उसी तरह हमारी स्थिति हो गई है, जैसी कबीर की हुई थी। ऐसे में कबीर और उनके परिवार को न याद करूं, और उनकी प्रताड़ना को न याद करूँ, काशी टू मगहर माइग्रेसन न याद करूं तो क्या करूं? जवन गति उनकी वही गति हमरी…….।
मैंने कहा सुलेमान भाई छोड़ो…..जब तक सांस है तब तक आस है। बीती ताहि बिसारिये, आगे की सुधि लेइ। खाक बिसारूं……अमां मियां पास्ट जो बीता, वर्तमान जो चल रहा है और भविष्य यानि फ्यूचर जो आने वाला है। सब कुछ डार्क ही डार्क दिखाई पड़ रहा है। तुमको क्या वही पुराना तखत, कथरी, लोई और फटी रजाई। पैर सिकोड़े ठण्डी काट रहे हो। इतना सुनते ही मुझे क्रोध आ गया। मैंने सुलेमान से कहा मियां अब ज्यादा मत बोलो। मेरे ही घर आकर मेरी तौहीन कर रहे हो। शायद तुम भूल रहे हो कि मेरी इस कथरी के कितने गुण हैं। यह हमारे लिये कितनी मुफीद है। नहीं समझे? समझो…….‘‘कथरी तोहार गुन ऊ जानै जे करै गुजारा कथरी मां….।’’
सुलेमान बोला अमां कलमघसीट काहें बुरा मान गये। मैंने ऐसे ही कहा था, तुम तो मेरे अजीज हो। और सही बात तो यह है कि तुम्हारी और हमारी हालत एक जैसी ही है। लेकिन हम यह सब छोड़कर कहाँ भाग कर जाये, क्योंकि हमें कहीं मगहर जैसा कोई स्थान नहीं दिख रहा। कलमघसीट तुम्हारी भाभी जान और उनके लाडले जब भी बाहर से घर में प्रवेश करते हैं तब एक ही रट लगाते हैं कि महंगाई आसमान छू रही है। रोजमर्रा वस्तुओं के दाम बढ़ते ही जा रहे हैं। उनकी यह बात सुनकर मुझे ऐसा लगता है कि ये लोग बाजार में मेरे लिए ही खाने-पीने का सामान खरीदने जाते हैं। और फिर आकर मुझे ही महंगाई के बारे में सुनाते हैं। मैं चुप-चाप माँ-बेटे की महंगाई विरोधी बुलन्द की जाने वाली आवाजों को अनसुनी करता हूँ। सोचता हूँ कुछ बोल दूंगा तो कुकुरमुत्ते की सब्जी और सूखी रोटी भी नहीं पाऊँगा।
मैंने सुलेमान की बातों का कत्तई बुरा नहीं माना। बुरा मानता भी क्यों…. सुलेमान मेरा लंगोटिया यार जो है। मेरे यहाँ भी हालात उसी के घर-परिवार जैसे ही हैं। मेरी भी हालत सुलेमान जैसी हो गई है। घर का बूढ़ा कुक्कुर बना बाहर के कमरे में लेटा, पिछले दरवाजे से आते-जाते लोगों की आहटें सुनता रहता हूँ। आदतन ग्राण्ड किड्स का नाम उच्चारण करते हुए पूछता रहता हूँ कि कौन आया, कौन था, क्यों आया…….। कहा जाता है कि- ओल्ड मैन कीप साइलेन्ट……मैं चुप्पी साधकर तखत पर लेटे-लेटे सोचने का क्रम जारी रखता हूँ।

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