हिन्दी भाषा का तकनीकी स्वरूप

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स्वतंत्र प्रभात :-
किसी भी देश की पहचान उसकी भाषा और संस्कृति होती है । भारतेंदु हरीशचंद्र जी ने कहा है :

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल । 

बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल ।।

इन्दिरा गाँधी जी ने बेहद खूबसूरत बात कही थी, “प्रत्येक देश को किसी सार्थक भाषा की आवश्यकता होती है और वह भारत में केवल हिंदी ही हो सकती है ।” महात्मा गाँधी जी भी जनता की बात जनता की भाषा में करने के पक्षधर थे।
अच्छी बात तो यह है कि हिंदी साहित्य तेजी से तकनीक से जुड़ रहा है । तेजी से बढ़ती ई पत्रिकाएं, वेब पत्रिकाएं हिंदी साहित्य की छवि को दिन प्रतिदिन निखार रहीं हैं । हिंदी वेबसाइटें तेजी से बढ़ रही हैं। आज 50,000 से भी अधिक हिंदी ब्लॉग आपको मिल जाएंगे ।
माइक्रोसॉफ्ट ने ‘ऑफिस हिन्दी‘ के द्वारा भारतीयों के लिए कंप्यूटर का प्रयोग बेहद सरल कर दिया है । लघुकथा डॉट कॉम, पाखी, हंस, गर्भनाल, ज्ञानोदय, लमही, वागर्थ, प्रवासी टुडे, भारत दर्शनआदि इंटरनेट पर उपलब्ध प्रमुख हिंदी पत्रिकाएं हैं । कविता कोश और गद्य कोष ने हिंदी साहित्य को मुक्त आकाश में पंख फैलाने के अवसर प्रदान किए हैं।
यह भी उल्लेखनीय है कि पहले विश्व बैंक से जुड़े आँकड़े अनुवाद के बाद ही प्रकाशित हो पाते थे जबकि अब विश्व बैंक से जुड़ी वित्तीय जानकारियाँ हिंदी में उपलब्ध कराई जा रही हैं । बीबीसी, डिस्कवरी आदि चैनलों ने हिंदी में अपने प्रसारण आरंभ कर उल्लेखनीय कार्य किया है । आज विज्ञान- प्रौद्योगिकी जैसे तमाम विषयों पर पुस्तकें सहज रुप से हिंदी में उपलब्ध हैं ।
14 सितंबर 2011 को सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट ट्विटर ने हिंदी में लिखने का उपहार दिया था । हिंदी में ट्वीट करना अत्यंत लोकप्रिय हो रहा है । एक रिपोर्ट में कहा गया है कि – हर 15 संदेशों में से 11 संदेश हिंदी में होते हैं । विदेशों में 25 से अधिक पत्र- पत्रिकाएं लगभग नियमित रूप से हिंदी में प्रकाशित हो रही हैं।
यू ए ई के “हम एफ एम” सहित अनेक देश हिन्दी कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं जिनमें बीबीसी, जापान के एन एच के वर्ल्ड, जर्मनी के डॉयचे वेले की हिंदी सेवा विशेष रुप से उल्लेखनीय है ।
हिंदी की संघर्ष यात्रा अनवरत जारी है और हिन्दी विभिन्न रूपों में सज- सँवर कर सामने आ रही है। हिंदी को भारत की बिन्दी बनाने का हमारा सम्मिलित प्रयास होना चाहिए और यह हमारा दायित्व भी है । इन्ही शुभकामनाओं के साथ –
हिंदी हमारी जान हिंदी हमारी शान 
हिंदी से ही संभव है हमारी पहचान”

अंजू खरबंदा ,लेखिका ( दिल्ली )

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