डाँस बारों में काम करने वालों की व्यथा

इनके लिए कोई राहत नही
 कौन सुने इनकी फ़रयाद

पूरी दुनिया मे फैली कोरोना महामारी से पूरे देश मे लॉक डाउन है। इस लॉक डाउन से लगभग हर वर्ग प्रभावित है। सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले जिनके सामने दो वक्त की रोटी का संकट है। हालांकि सरकार और समाजसेवी संगठनों ने कोई भूखा न रहे इसके लिए सराहनीय प्रयास किये। लेकिन मुम्बई महानगर में एक ऐसा भी असंगठित क्षेत्र है जिससे हज़ारों लोगों की रोज़ी रोटी जुड़ी है, जो बुरी तरह से प्रभावित है लेकिन यहां काम करने वालों से किसी को कोई सहानुभूति नही है, हम बात कर रहे है

मुम्बई महानगर में चलने वाले डांस और आर्केस्ट्रा बारों में काम करने वालों की।  मुम्बई महानगर की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले, मुम्बई महानगर की रात की रंगीनियों की पहचान डांस और ऑर्केस्ट्रा बारो में काम कर अपना और अपने परिवार का पेट पालने वालों को कहीं से कोई सहायता नही है। डांस बारों में अपने हुस्न के जलवे बिखेरने और अपने हाव भाव से ग्राहकों का होशोहवास लूटने वाली बारबालाओं की ज़िंदगी मुश्किल हो चुकी है। ग्राहकों के आगे पीछे उनके हर हुक्म को बजा लाने को तत्पर स्टीवर्ड और वेटरों के सामने भी बड़ा संकट है। बारो के बाहर ड्यूटी करने और हर आने जाने वालों को सलाम ठोकने वाले वाचमैनों का कोई पुरशाहाल नही है। बार बालाओं के नाज़ नखरे उठाने, फ्लोर पर बालाओं पर उड़ने वाली नोटों को समेटने के लिए तैनात छोटुओं की ज़िंदगी मे कैसा तूफान चल रहा है यह देखने वाला कोई नही है। 

एक बड़ी इंडस्ट्री जिसमे रोज़ करोड़ों के वारे न्यारे होते हैं, जहां पैसे की कोई अहमियत नही है, नोट हवा में उड़ते हुए दिखना जिस इंडस्ट्री की पहचान है। सरकार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने जिस इंडस्ट्री पर लगाम कसने के लिए अनेक गाइडलाइंस बनाये फिर भी जो इंडस्ट्री अपने रूल के मुताबिक ही आजतक चल रही थी उस इंडस्ट्री में काम करने वालों  के सामने रुपयों पैसों का ऐसा संकट, फिर भी कोई पूछने वाला नही, कोई राहत नही।एक अनुमान के अनुसार मुम्बई महानगर में लगभग 600 डांस या ऑर्केस्ट्रा बार कार्यरत हैं। गाइडलाइंस के अनुसार हर बार मे काम करने के लिए 4 बारबालाओं की इजाज़त है लेकिन आम तौर पर हर बार मे 20 से 25 बार बालाएं काम करती हैं। आर्केस्ट्रा स्टाफ, स्टीवर्ड, वेटर, मैनेजर, कैशियर, छोटू, वाचमैन, और किचन स्टाफ मिलाकर कम से कम 100 से 125  लोगों का स्टाफ हर बारों में काम करता है। इस तरह पूरे महानगर में चलने वाले बारों में काम करने वालों की एक बड़ी तादाद है। लेकिन जिस इंडस्ट्री की मुख्य गतिविधी ही पैसे उड़ाना और पैसे बटोरना है उस इंडस्ट्री का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि यहां काम करने वाला कोई स्टाफ मासिक पगार पर नही होता।

बार बालाएं जहां ग्राहकों द्वारा पैसे उड़ाने पर निर्भर है तो अन्य स्टाफ ग्राहकों द्वारा दी जाने वाली टिप पर। बार बालाओं को तो अच्छी कमाई फिर भी हो जाती है लेकिन यहां काम करने वाले अन्य स्टाफ रोज़ कुँवा खोदकर पानी पीते हैं। इस लॉक डाउन में इनकी हालत पतली है। बार बंद है, होटलों के सेठ ध्यान नही दे रहे, जिस सेक्टर में यह काम करते हैं उसका किसी से नाम भी नही ले सकते कारण….. इस सेक्टर को साफ सुथरी निगाहों से नही देखा जाता। अपनी रात रंगीन करने के लिए बड़े से बड़ा धन्ना सेठ यहां की चौखट पर भले ही  सिर नवाता है ……पर रात के अंधेरे में।  दिन के उजाले में यह सफेदपोश कभी नही चाहते कि बारों से जुड़ा कोई उनके बारे में बात भी करे।

पगार पर वह होते नही सो सेठ पर भी दबाव नही डाल सकते ऐसे में जाएं तो जाएं कहाँ??? किस्से लगाएं अपनी गुहार???? कौन सुनेगा इनकी फरियाद????डांस और ऑर्केस्ट्रा बारों की रंगीन रोशनी की चकाचौंध में काम करने वाले इस सेक्टर के हज़ारों कामगारों की ज़िंदगी के अंधेरे को भी दूर करने के लिए सरकार और समाजसेवी संस्थाओं को प्रयास करना चाहिए आखिर यह सेक्टर सरकार को हर साल करोड़ों रुपये का राजस्व देती है तो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार भी……… इसलिए इनकी फरियाद भी सुनो सरकार…………