कोरोना:कितने तैयार हैं हम!

लेखक – इंद्र दमन तिवारी

भारत के धर्म दर्शन औऱ लोकव्यवहार में अनुकूलन की शक्ति है, आपदाओं के समय में आश्चर्यजनक एकता एवं सामान्य जीवन में अनेकता यहाँ की प्रकृति है।

एक ऐसे समय में जब कोरोना विश्व समुदाय को भयभीत कर चुका है, रक्तबीज की भाँति नित बढ़ रहा यह अदना सा वायरस मानव सभ्यता की सबसे बड़ी चुनौती सिद्ध हो रहा है, जब विश्व के कमोबेश समस्त देशों के साथ-साथ हम भी इस महामारी से संघर्षरत हैं तब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह कहकर हम पर विश्वास जताया है कि ‘भारत के पास कोरोना से लड़ने की क्षमता है, इसके पास चेचक एवं पोलियो को समाप्त करने का अनुभव है” भारत समूचे विश्व के लिए मार्गदर्शक सिध्द हो सकता है..

लेकिन इसी विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए किन्तु भारत में फ़रवरी 2020 तक 1404 लोगों पर एक डॉक्टर उपलब्ध है, वहीं ग्रामीण इलाक़े में 10,926 लोगों पर 1 डॉक्टर उपलब्ध है..

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार नर्स एवं आबादी का अनुपात 1:483 का होना चाहिए वहीं भारत में 650 से ज़्यादा लोगों पर एक नर्स है..वहीं सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी का ख़र्च करने में हम भूटान एवं बांग्लादेश से पीछे हैं, कोविड-19 से मुकाबले में आर्थिक संपन्नता एवं बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का दावा करने वाले देश भी नहीं ठहर पा रहे हैं, अमेरिका इटली फ्रांस ब्रिटेन चीन जैसे देशों की हालत नाजुक है, विकसित मुल्क़ों की ये भयावह स्थिति हमारी चिन्ता बढ़ाने वाली है..

भले ही इन विकसित देशों के पास अत्याधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का ज़खीरा क्यों न हो किन्तु जिन देशों ने लॉक डाउन एवं सामाजिक दूरी को सफलतापूर्वक लागू करने में क़ामयाबी हासिल की वहाँ संक्रमण के मामलों का ग्राफ तेजी से गिरा है..नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक़ देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य का हाल ठीक नहीं है..

इस की पूर्ण आशा है कि कोरोना के अंत के बाद का विश्व सोच विचार, आचार व्यवहार, एवं आहार आदि की आदतों में तनिक भिन्न होगा, विज्ञान को अब अपनी सीमाओं का भान हो चुका होगा, स्वयं को ‘महाशक्ति’ उपाधि देने वाले देशों को प्रकृति की अनंत शक्ति का ज्ञान हो चुका होगा।

मानवीय इतिहास में हमने देखा है कि प्रत्येक महामारी के बाद एक नया सूरज निकलता है एवं परिणामस्वरूप मानव सभ्यता नवीन मार्ग पर बढ़ जाती है। अपने संयम, संकल्प एवं धैर्य से हम ये जंग अवश्य जीतेंगे..जीवनदृष्टि के संदर्भ में आर्थिक भूमंडलीकरण असफ़ल हो गया लगता है, अब सांस्कृतिक भूमंडलीकरण की दृष्टि में भारत को नए जीवनदर्शन की मुहिम का नेतृत्व करना चाहिए।

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