मिट्टी का बर्तन बना जीवन यापन का स हारा

मिट्टी का बर्तन बना जीवन यापन का स हारा।

स्वतंत्र प्रभात
‌फूलपुर प्रयागराज
‌शिवम् शुक्ला की रिपोर्ट

‌फूलपुर तहसील क्षेत्र अंतर्गत चिरौड़ा गांव निवासी 70 वर्षीय इन्द्रपाल प्रजापति आज भी अपनी वृद्धावस्था में मिट्टी के बर्तन को अपने जीवन का सहारा मानते हैं। इन्द्रपाल प्रजापति ने बताया कि यह उद्योग उनके पूर्वजों का दिया हुआ उद्योग है जिसे वह लगभग 50 वर्षों से अपने दैनिक जीवन में लेकर चलते चले आ रहे हैं।

‌भारत में बदलते युग व वैज्ञानिक संसाधनों के आते ही मानो कि जैसे गृहउद्योग विलुप्त होते चले जा रहे हैं लेकिन आज भी कहीं कहीं वही पुरानी चीजों को देखने को मिलती है। क्षेत्र के बुजुर्गों व पूर्वजों से भी इस विषय पर जानकारी मिली तो उन्होंने भी बताया कि मिट्टी के बर्तन का हमारे जीवन में कुछ अलग ही महत्व है। गांव के बुजुर्ग आज भी यही चाहते हैं कि उन्हें गैस का नहीं बल्कि चूल्हे का पका हुआ खाना खाने को मिले और इसी तरह दुकानों पर चाय कुल्हड़ में पीने को मिले, दही मट्ठा भी मटकी में ही बना हुआ मिले, इस तरह से ऐसे पुराने काफी संसाधन हैं जिनकी मांग आज भी हमारे गांव क्षेत्र के बुजुर्ग करते हैं। आजकल बढ़ते वैज्ञानिक दौर में हमारे पूर्वजों के समय में उपयोग की जाने वाली वस्तुएं बहुत कम जगहों पर देखने को मिलती हैं।

आजकल देखा जाए तो गांव के कार्यक्रम में उपयोग किए जाने वाले हाथ से बने पत्तल, मिट्टी के बने पानी पीने के लिए कुल्हड़, इत्यादि चीजों का विलुप्त होना एक प्रकार से एक बिमारी का घर भी आ गया है। पानी या चाय पीने के लिए उपयोग प्लास्टिक के गिलास व खाना खाने के लिए उपयोग थर्माकोल व फाइबर के पत्तलों का उपयोग किया जाता है जो कि जलाने पर केवल और केवल प्रदूषण की बढ़ोत्तरी होती है। इसी क्रम में बाजारों में मिल रहे तमाम प्रोडक्ट के सामानों में भी भारी केमिकल की मात्रा मिलने लगी है जैसे रिफाइंड तेल, सरसो तेल, साबुन, इत्यादि खाने पीने की चीजों में भी मिलावट की मात्रा मिलती है जिसका असर मानव जीवन पर बुरा प्रभाव डाल रहा है।

यह प्रभाव इस कदर है कि मानव जीवन की घटती उम्र, कम समय में बालों का झड़ना, कम समय के बच्चों में भी कई प्रकार से यह प्रभाव देखने को मिल रहा है। आजकल गांव में बनी हुई शुद्ध ख़ान पान की वस्तुएं बहुत कम ही मिलती हैं। इस विषय पर ग्रामीणों को जागरूक होकर मिलावटी खान पान की वस्तुओं से बचना चाहिए। संभवतः गृहउद्योग से बनी हुई वस्तुओं का उपयोग करते और गृह उद्योग को बढ़ावा दें। जिससे कि गरीब मजदूर भी गृह उद्योग कर अपना जीवन यापन कर सके। गृह उद्योग में जैसे अगरबत्ती, मोमबत्ती, मिठाई के डिब्बे,  बनाना व मिट्टी के बर्तन मटकी, कुल्हड़ इत्यादि चीजों का उपयोग करना।