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                <title>संपादकीय - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>भारत में मजदूरों की दशा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>डा अशोक कुमार चौबे </strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>सेवानिवृत्त प्रोफेसर क़ृषि पसार शिक्षा </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व  भर मे हर वर्ष एक म ई मजदूर दिवस  के रूप में मनाया जाता है।नारा आसमान में गूंजता है दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ।परन्तु नारो से विश्व के मजदूरों की दशा में बहुत कोई बदलाव नहीं आया है। आज भी मजदूर मजबूर हैं।  काम के स्थल पर बहुत सी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं फिर भी वह मजदूर किसी के लिए धन अपने पसीने से बढा रहा है। परन्तु उसका परिवर आज भी  झूग्गी में ही पाल रहा है।गन्दे पानी पी रहा है बिना बिजली के साथ जीवन जी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177754/condition-of-workers-in-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas20.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>डा अशोक कुमार चौबे </strong></div>
<div style="text-align:justify;"><strong>सेवानिवृत्त प्रोफेसर क़ृषि पसार शिक्षा </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व  भर मे हर वर्ष एक म ई मजदूर दिवस  के रूप में मनाया जाता है।नारा आसमान में गूंजता है दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ।परन्तु नारो से विश्व के मजदूरों की दशा में बहुत कोई बदलाव नहीं आया है। आज भी मजदूर मजबूर हैं।  काम के स्थल पर बहुत सी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं फिर भी वह मजदूर किसी के लिए धन अपने पसीने से बढा रहा है। परन्तु उसका परिवर आज भी  झूग्गी में ही पाल रहा है।गन्दे पानी पी रहा है बिना बिजली के साथ जीवन जी रहा है ।जिसको बड़े शहरों में मजदूरों की बस्ती मलिन बस्ती के नाम से जाना जाता है। उन्हीं बस्तियों में रह रहा है क ई मजदूरों का परिवार सड़को के किनारे पटरियों पर तो कुछ नाले के किनारे बैठे है । सरकार गाहे बेगाहे उनके पालीथीन के घर  को उठा ले जाती है।अतिक्रमण हटाने के नाम पर ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भारतके हर शहर के उघोग  में काम करनेवाले संगठित और असंगठित मजदूरों की कहानी है।मजदूरों को समय से मजदूरी नहीं ।तो काम का समय बारह घन्टें होते हैं।  मजदूरी दस हजार तक सीमित है। न उनके लड़कों को स्कुल नहीं मुफ्त चिकित्सा है फिर भी हम ढोल पीटते है मजदूर देश के विकास में रीढ़ की हड्डी के समान है।  और हर रोज उघोग पति इसी रीढ़ की हड्डी को तोड़ता रहता है । और अपनी आय बढ़ाता रहता  है।मजदूरों को कम मजदूरी देने की होड़ लग गई  है ।विश्व के हर‌ देश के उघोग पति हर समय सस्ते मजदुर खोजते रहते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व के विकसित और अविकसित देशों में भारतके मजदूर सबसे सस्ते में काम कर रहे हैं।  वह जिस भी देश में है बस एक मजबूर मजदूर हैं।  रहने की वहां भी सुविधा बहुत अच्छी नहीं है ।यह कहनें के लिए कि लड़का विदेश में हैं काम कर रहा यही तस्ली जैसे बिहार यूपी बंगाल के मजदूर दिल्ली हरियाणा पंजाब गुजरात  में  रहते हैं। कामोवेश यही स्थिति भारतीय मजदूरो की विश्व के हर देश में है।विश्व में आज भी मजदूर एक तरह से गुलामी में ही जी रहा है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मजदूरों ने सबसे पहले 1886 मे शिकागो में अपने काम के समय को आठ घन्टे निर्धारित करने को तथा बेहतर सुविधा के लिए आन्दोलन किया जो सफल रहा ।आज हालात फिर1886की तरह मजदूरों की हो गई वह संगठित क्षेत्रों के हो या असंगठित क्षेत्र दोनों जगह मजदूर मजबुर बन गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज पूंजी की दुनिया ने पूरे विश्व को बाजार में बदल दिया है।  जहां हर चीज बिकने को तैयार हैं इसकी कीमत पूजी के मालिक ही तय करते हैं।भारत के किसान खेतों में फसल तैयार करते हैं ।परन्तु बाजार में किस दाम पर बिकेगा वह महाजन ही तय करता है। आज मजदूर खेत की फसल की तरह बिक रहे हैं।शहरों में गांवों में मजदूरों के लिए हर सरकारी घोषणा दिखावा बन कर रह गया है।  गांवों में मनरेगा में क ई क ई महीने सरकार मजदुरी नहीं दे रही है।  दूसरी तरफ मनरेगा में काम कम कर दिया शहरों में मनरेगा नहीं चल रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्ष1886शिकागो में जो मजदूरों को सफलता मिली आज 137साल बाद अपने पुराने मुकाम पर पहुंच ग ई है।अभी कुछ दिनों पहले पूरे देश ने नोएडा के मजदूरों का आन्दोलन‌ देखा है ।मजदूर अपने वेतन को बढाने और काम के घन्टें आठ घन्टें करने तथा कार्यस्थल पर बेहतर सुविधा की मांग थी।पर कुछ थोड़ा सरकार के हस्तक्षेप के बाद मिला परन्तु बीस हजार महीने का वेतन तो नहीं मिला।यह संगठित क्षेत्रों के मजदूरों का हाल है इस से बद्तर हाल असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में पुरुष मजदूरों के साथ संगठित और असंगठित दोनों जगहों पर महिला कार्यबल भी है । परन्तु मजदूरी में भेद भाव आज भी हो रहा है । कहीं कहीं महिलाएं भी बारह घन्टें काम करती है । यह नहीं की उघोगो में पुरूषों का शोषण हो रहा आज विश्व भर में महिला मजदूरों का भी शोषण हो रहा है।बस नारों में ही महिलाओं का सम्मान है विज्ञापनो में ही नारीशक्ति वन्दन है।  जमीनी हकीकत कुछ और है ।मजदूर आन्दोलन में जब महिलाएं शामिल होती है तो उन पर भी पुलिस लाठी चलाती बाल पकड़ कर महिला पुलिस घसीटती हुई ले जाती  है। तब कहीं नहीं किसी मजदूर नेता संगठन का या राजनीतिक नेताओं की आवाज उठता है कि महिलाओं को क्यों लाठी से पुलिस वाले ने पीटा क्यों बाल पकड़ कर घसिटा हर आन्दोलन की यही कहानी होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि भारत को 2047मे विकसित बनाना है फिर सत्तर फीसदी  महिलाओ को महिलाकार्य बल में प्रमुख स्तरो पर भागीदारी सुनिश्चित करना होंगा।भारत का मजदूर बहुत सी कठिनाई से दोक्षचार होता है फिर भी उघोगो पतियों को धन कमा कर देता है। विश्व के किसी देश में यह नियम नही बना है कि उघोगो के लाभ में से कितना प्रतिशत मजदूरों के बेहतर सुविधा पर खर्च होगा । परन्तु सरकारो ने यह एक नया नियम बना लिया कि उघोगपति लाभ का दो प्रतिशत सामाजिक जिम्मेदारी  के तहत और अपने आस पास के गांवों के विकास पर खर्च करेंगे।परन्तु यह नियम नही बना की हर उघोगपति मजदूर के बच्चों की अच्छी शिक्षा चिकित्सा के लिए जिले के स्कुलो और हास्पिटल के लिए अपने लाभ में से दो प्रतिशत हर वर्ष खर्च करेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और साथ में उसी दो प्रतिशत के लाभ से मजदूरों को सुविधायुक्त मकान  बनाकर दे सकता है लेकिन ऐसी सुविधा मजदूरों को बहुत कम उघोगो में उपलब्ध है।जिन उघोगो में यह सुविधा थी धीरे धीरे बन्द होते गये मिल  मजदूरों के अनर्गल आन्दोलन से और मजदूर नेताओं की मिल मालिकों से मिली भगत से आज भी भारत में बहुत सी मिले बंगाल मुम्बई तमिलनाडू यूपी में सरकारी और निजी उघोओ की बन्द है । इन उघोगो को चलाने  में अब सरकार कभी रूचि नहीं लेती है नहीं इनका आधुनिक करण किया इन मिलों में काम करने वाले मजदूर आज भी अपने बकाया के लिए कोर्ट में मुकदमे लड रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">1920मे मजदूरों ने बड़ी सख्या में आन्दोलन में भाग लिया था जीत गये तब आन्दोलन को भारत की स्वतंत्रता से जोड़ कर देखा गयाथा । नोएडा या अन्य शहरों में वेतन को लेकर मजदूर समय समय पर सड़क पर आते  रहते हैं।वह 1886या1920के आन्दोलन की तरह नहीं हो लड पा रहे हैं । तब मजदूरों का संगठन एक साथ आवाज एक थी आज संगठन बहुत है आवाज बहुत है पर सबक्षबटे हुए हैं तभी काटे जा रहै है।यह नारा सच है सकोगे तो कटोगे।आज वास्तव में मजदूर संगठन सत्ता का विपक्ष है तो सत्ता का संगठन आन्दोलन में नहीं है।नोएडा का आन्दोलन मात्र चार दिन चला और लाठी मुकदमे के डर से समझौता होगया हजार पांच सौ की वेतन वृद्धि से सब समस्या का हल  निकल गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार न जाने क्यों निजी क्षेत्रों के श्रमिको के लिए न्यूनतम वेतन शहरों और महानगरों के स्तर को देख कर निर्धारित नहीं कर पा रही है । नहीं कभी सुनिश्चित कर पा रही है । क्या सरकार के न्यूनतम वेतन नियम को निजी उघोग मानरहे हैं।  या मजदूरो का शोषण हो रहा है।आज बेरोजगारी के कारण भी युवा  आठ से दस  हजार पर मजदूरी करने को मजबूर हैं ।शहरों में गीगा वर्कर्स जोमैटो स्वीटी  ईकार्ट आदि आन लाईन सेवा प्रदाता कम्पनियो में अपने मोटर साईकिल से मजदूरी कर रहे है।तो कितना वेतन और सुरक्षा है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन युवाओं का अगर सड़क दूर्घटना में मृत्यु हो जाये सेवा या डिलीवर के समय तो क्या तीस चालीस लाख का जीवन बीमा कम्पनियों ने कराया है शायद जबाब नहीं।अगर विकलांग हो गये तो क्या कम्पनी सहायताराशि कितना देगी कुछ भी आज स्पष्ट नहीं है ।हर तरह मजदूर का शोषण  विकास की  न ई पहचान बन गया है।  मजदूरो के शोषण से उघोगो का विकास यही विकसित भारत का नारा बन रहा है।  आज सरकार भी शोषण के लिए एक नया नौकरी का तरीका अनुबन्धन और आउट सोर्स की नौकरी यह भी सरकारी शोषण है । पर मौन सरकार और अदालतें है । मजदूरों के शोषण पर ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पहली म ई मजदूर दिवस म ई दिवस विश्वभर में मनाया जायेगा नारा भी होगा मजदूरों एक हो जाओ शोषण के विरोध में संघर्ष करो पर शोषण सरकार से शुरू होकर नीजीक्षेत्रो तक नदी की धारा की तरह बहता है।  जो रूकता नहीं है । न रूक पायेगा।सर्रकार भी अब स्थाई नौकरी सामाजिक सुरक्षा पेंशन नहीं देना चाहती है । बस अपने सांसदों विधायोंको पंचायत के स्तर पर नेताओं को हर तरह की सुविधा  देकर देश के युवाओं को मजदूर बनाकर रखना चाह रही  है और रख भी रही है । उदाहरण सरकारी मजदूर बंगाल में वोटर नहीं है। परन्तु वह सब चुनाव में ड्यूटी में लगे हैं यही सरकारी मजदूर की मजबूरी है।मजदूरों का पेंशन चिकित्सा मकान सब बन्द  है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परन्तु सांसद विधायको को हर तरह की सुविधा मुफ्त पेंशन चिकित्सा मकान बिजली पानी यात्रा। इस वर्ष देश के मजदूरों सरकार से एक सवाल  पूछे ।हम मजदूर देश के विकास में श्रम देकर सहभागी है। परन्तु सांसद विधायक कौन सा श्रम दे रहे हैं।  देश के विकास के लिए यह नये राजा देश के विकास में बाधक है ।इनकी हर सुविधाओं को बन्द करने की मांग पहली म ई मजदूर दिवस पर हो।मजदूरों एक हो जाओ हक अपना मांगों म ई दिवस पर जब तक न मिले तब तक हर तरह से संघर्ष करो लड़ो हक के लिए मजदूर मजबूर मत बनो। मजदूर  देश व समाज  का भाग्य विधाता बनो।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 23:21:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कछुए की तरह रेंग रहा है राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का सपना</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक: राजीव शुक्ला</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय शिक्षा नीति (</span>NEP) 2020<span lang="hi" xml:lang="hi">  को लागू हुए छह वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान </span>5+3+3+4<span lang="hi" xml:lang="hi">  की नई संरचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहु-विषयी शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यावसायिक प्रशिक्षण और निरंतर मूल्यांकन जैसे सुधारों की दिशा में कुछ प्रगति हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आधारभूत चुनौतियाँ—शिक्षक कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनियादी ढांचे की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक प्रशिक्षण की अपर्याप्तता और धनराशि की कमी—अभी भी शिक्षा व्यवस्था को जकड़े हुए हैं। विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीति का वास्तविक रूपांतरण अभी भी दूर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और सरकारी स्कूलों में।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">NEP 2020<span lang="hi" xml:lang="hi">  का मूल उद्देश्य रट्टा-आधारित शिक्षा को समाप्त कर</span>,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177673/the-dream-of-national-education-policy-2020-is-crawling-like"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/whatsapp-image-2026-04-29-at-10.07.24.jpeg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक: राजीव शुक्ला</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय शिक्षा नीति (</span>NEP) 2020<span lang="hi" xml:lang="hi"> को लागू हुए छह वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान </span>5+3+3+4<span lang="hi" xml:lang="hi"> की नई संरचना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहु-विषयी शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यावसायिक प्रशिक्षण और निरंतर मूल्यांकन जैसे सुधारों की दिशा में कुछ प्रगति हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आधारभूत चुनौतियाँ—शिक्षक कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनियादी ढांचे की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक प्रशिक्षण की अपर्याप्तता और धनराशि की कमी—अभी भी शिक्षा व्यवस्था को जकड़े हुए हैं। विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीति का वास्तविक रूपांतरण अभी भी दूर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और सरकारी स्कूलों में।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">NEP 2020<span lang="hi" xml:lang="hi"> का मूल उद्देश्य रट्टा-आधारित शिक्षा को समाप्त कर कौशल-उन्मुख</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लचीली और समावेशी शिक्षा प्रणाली विकसित करना था। नीति में सार्वजनिक शिक्षा पर जीडीपी का </span>6<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत व्यय करने का लक्ष्य रखा गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक यह आंकड़ा अभी भी लगभग </span>2.9-3<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत के आसपास ही है। इससे बुनियादी ढांचा विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक क्षमता निर्माण और डिजिटल विस्तार प्रभावित हो रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देशभर में शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई है। संसद में प्रस्तुत आंकड़ों और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्राथमिक स्तर पर लाखों पद खाली हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर रिक्तियां और बढ़ रही हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में यह समस्या और गंभीर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां शिक्षक-छात्र अनुपात प्रभावित हो रहा है। कई शिक्षक अनुबंधित या अपर्याप्त प्रशिक्षित हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे </span>NEP <span lang="hi" xml:lang="hi">की नई शिक्षण पद्धतियों—अनुभव-आधारित सीखना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समस्या-समाधान का क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण हो गया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बुनियादी ढांचे की स्थिति भी चिंताजनक है। ग्रामीण स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयोगशालाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुस्तकालय और स्थिर इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमी डिजिटल डिवाइड को बढ़ा रही है। </span>NEP <span lang="hi" xml:lang="hi">में बहु-भाषी शिक्षा और मातृभाषा में शिक्षण पर जोर दिया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पाठ्यपुस्तकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशिक्षित शिक्षकों और क्षेत्रीय विविधता को ध्यान में रखते हुए मानकीकरण की चुनौती बनी हुई है। कई राज्यों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर दक्षिण भारत में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीन-भाषा फॉर्मूला और कुछ प्रावधानों पर विरोध या आंशिक स्वीकार्यता देखी जा रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च शिक्षा में भी चुनौतियाँ समान हैं। लचीले प्रवेश-निकास विकल्प </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रेडिट बैंक और बहु-विषयी पाठ्यक्रमों को लागू करने में संसाधनों और शिक्षक प्रशिक्षण की कमी बाधक बन रही है। डिजिटल कनेक्टिविटी और उपकरणों की उपलब्धता ग्रामीण तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक नहीं पहुंच पा रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ी संख्या में बच्चे प्रभावित होते हैं</span>, NEP 2020<span lang="hi" xml:lang="hi"> को चरणबद्ध तरीके से लागू कर रहा है। </span>2026-27<span lang="hi" xml:lang="hi"> के बजट में शिक्षा क्षेत्र को महत्वपूर्ण बढ़ोतरी दी गई है—बुनियादी शिक्षा के लिए </span>77,622<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ रुपये</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माध्यमिक शिक्षा के लिए </span>22,167<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ रुपये (</span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत वृद्धि) और उच्च शिक्षा के लिए </span>6,591<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ रुपये प्रस्तावित हैं। व्यावसायिक शिक्षा पर फोकस बढ़ाते हुए </span>UP <span lang="hi" xml:lang="hi">बोर्ड ने </span>2026-27<span lang="hi" xml:lang="hi"> सत्र से कक्षा </span>9<span lang="hi" xml:lang="hi"> और </span>11<span lang="hi" xml:lang="hi"> में व्यावसायिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया है। यह कदम </span>NEP <span lang="hi" xml:lang="hi">के स्किल डेवलपमेंट लक्ष्य से मेल खाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाल ही में लखनऊ में आयोजित एजुकेशन कॉन्क्लेव </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> में </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">योगी मॉडल</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा। फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेरसी (</span>FLN), <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन</span>, AI <span lang="hi" xml:lang="hi">और एडटेक के उपयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निरंतर मूल्यांकन और शिक्षक सशक्तिकरण पर जोर दिया गया। राज्य सरकार स्मार्ट स्कूलों का विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री मॉडल कंपोजिट स्कूल और अभ्युदय कोचिंग जैसी पहलों पर काम कर रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी</span>, UP <span lang="hi" xml:lang="hi">में भी शिक्षक रिक्तियां (लगभग </span>1.93<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख से अधिक)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल मर्जर की प्रक्रिया और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी चर्चा में रहती है। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में नामांकन अभी कम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दर्शाता है कि जागरूकता और बुनियादी ढांचे पर और काम की जरूरत है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">NEP <span lang="hi" xml:lang="hi">के छठे वर्ष में हम एक मोड़ पर खड़े हैं। जहां नीति की दिशा सही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं क्रियान्वयन की गति और गुणवत्ता बढ़ाना अनिवार्य है। यदि इन चुनौतियों का समाधान नहीं किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो लाखों युवाओं का भविष्य प्रभावित होगा। सरकारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षाविदों और समाज को मिलकर इस </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा क्रांति</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">को वास्तविकता बनाने की जरूरत है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा राष्ट्र का भविष्य है। नई शिक्षा नीति </span>2020 <span lang="hi" xml:lang="hi">को मात्र नीति-पत्र नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जन-आंदोलन बनाना होगा। बजट बढ़ोतरी और राज्य-स्तरीय पहलें सराहनीय हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव तभी दिखेगा जब हर स्कूल में योग्य शिक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उचित बुनियादी ढांचा और छात्र-केंद्रित वातावरण उपलब्ध होगा। समय अब प्रतीक्षा का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्वरित और प्रभावी कार्रवाई का है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 17:22:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत में बढ़ती सड़क दुर्घटनाएँ </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश के धार जिले में हाल ही में हुआ भीषण सड़क हादसा एक बार फिर देश को झकझोर गया। मजदूरों से भरा एक पिकअप वाहन, जिसमें क्षमता से कहीं अधिक लोग सवार थे, टायर फटने के बाद अनियंत्रित होकर पलट गया और दूसरी दिशा में जाकर एक अन्य वाहन से टकरा गया। इस दर्दनाक घटना में कई लोगों की जान चली गई, जिनमें मासूम बच्चे भी शामिल थे। यह कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि भारत में हर साल होने वाली हजारों सड़क दुर्घटनाओं की लंबी और चिंताजनक श्रृंखला का एक हिस्सा है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारत दुनिया के उन देशों में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177671/increasing-road-accidents-in-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/4nq5nhkbfmcilqk31cddfdp18pky2hzib9cukjj3.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश के धार जिले में हाल ही में हुआ भीषण सड़क हादसा एक बार फिर देश को झकझोर गया। मजदूरों से भरा एक पिकअप वाहन, जिसमें क्षमता से कहीं अधिक लोग सवार थे, टायर फटने के बाद अनियंत्रित होकर पलट गया और दूसरी दिशा में जाकर एक अन्य वाहन से टकरा गया। इस दर्दनाक घटना में कई लोगों की जान चली गई, जिनमें मासूम बच्चे भी शामिल थे। यह कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि भारत में हर साल होने वाली हजारों सड़क दुर्घटनाओं की लंबी और चिंताजनक श्रृंखला का एक हिस्सा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां सड़क दुर्घटनाओं की संख्या बेहद अधिक है। हर साल लाखों लोग दुर्घटनाओं में घायल होते हैं और हजारों लोगों की जान चली जाती है। इन हादसों के पीछे कई कारण हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है तेज रफ्तार, यातायात नियमों की अनदेखी, वाहन चालकों की लापरवाही और सड़कों की खराब स्थिति। इसके अलावा ओवरलोडिंग और ओवरटेकिंग जैसी गलत आदतें भी दुर्घटनाओं को बढ़ावा देती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तेज रफ्तार आज के समय में सड़क दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण बन चुकी है। लोग समय बचाने या जल्द गंतव्य तक पहुंचने की होड़ में अपनी और दूसरों की जान जोखिम में डाल देते हैं। वाहन चलाते समय गति सीमा का पालन न करना एक आम समस्या बन गई है। खासकर हाईवे पर लोग 80-100 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे भी अधिक गति से वाहन चलाते हैं, जिससे जरा सी चूक भी बड़ी दुर्घटना का रूप ले लेती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके साथ ही ओवरलोडिंग भी एक गंभीर समस्या है। धार की घटना में भी देखा गया कि पिकअप वाहन में क्षमता से अधिक मजदूर सवार थे। इस तरह की लापरवाही अक्सर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में देखने को मिलती है, जहां लोग सस्ते और आसान परिवहन के लिए जोखिम उठाते हैं। लेकिन जब हादसा होता है, तो इसका परिणाम बेहद भयावह होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में सड़कों की स्थिति भी कई जगहों पर दुर्घटनाओं का कारण बनती है। गड्ढों से भरी सड़कें, अधूरी निर्माण प्रक्रिया, खराब संकेत व्यवस्था और अंधे मोड़ जैसी समस्याएं अक्सर दुर्घटनाओं को न्योता देती हैं। कई बार सड़क निर्माण में गुणवत्ता की कमी भी सामने आती है, जिससे सड़क जल्दी खराब हो जाती है और दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ड्राइवर की लापरवाही और थकान भी एक बड़ा कारण है। कई ड्राइवर लंबे समय तक लगातार वाहन चलाते हैं, जिससे उनकी एकाग्रता कम हो जाती है। नींद के झोंके में वाहन चलाना बेहद खतरनाक होता है। कई बड़े हादसों में यह पाया गया है कि ड्राइवर की थोड़ी सी झपकी ने कई जिंदगियां छीन लीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अगर पिछले एक साल की बड़ी सड़क दुर्घटनाओं पर नजर डालें, तो तस्वीर और भी चिंताजनक हो जाती है। देश के विभिन्न राज्यों में हुए हादसों में सैकड़ों परिवार उजड़ गए। कहीं बस खाई में गिर गई, तो कहीं ट्रक और कार की टक्कर में पूरा परिवार खत्म हो गया। कई मामलों में शादी या धार्मिक कार्यक्रम से लौट रहे लोग दुर्घटना का शिकार हो गए। इन घटनाओं में एक समानता देखने को मिलती है—ज्यादातर हादसे मानवीय गलती या लापरवाही के कारण हुए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उत्तर भारत में कई ऐसे हादसे हुए जहां बसें नदी या खाई में गिर गईं। दक्षिण भारत में तेज रफ्तार कारों की टक्कर से कई लोगों की मौत हुई। पश्चिम भारत में हाईवे पर ट्रकों की भिड़ंत ने बड़े नुकसान पहुंचाए। इन सभी घटनाओं ने यह साबित किया कि सड़क सुरक्षा के मामले में अभी भी बहुत काम किया जाना बाकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार ने सड़क सुरक्षा के लिए कई नियम बनाए हैं, जैसे हेलमेट पहनना, सीट बेल्ट लगाना, शराब पीकर वाहन न चलाना और गति सीमा का पालन करना। इसके अलावा ट्रैफिक पुलिस द्वारा चालान और सख्ती भी की जाती है। लेकिन इन नियमों का पालन तभी संभव है जब आम लोग जागरूक हों और अपनी जिम्मेदारी समझें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दुर्घटनाओं के बाद सरकार द्वारा मुआवजा दिया जाता है, जैसे मृतकों के परिवार को आर्थिक सहायता और घायलों के इलाज का खर्च। लेकिन यह सहायता उस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकती जो एक परिवार अपने किसी सदस्य को खोने के बाद झेलता है। कई बार परिवार का एकमात्र कमाने वाला व्यक्ति ही दुर्घटना का शिकार हो जाता है, जिससे पूरे परिवार का भविष्य संकट में पड़ जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए केवल सरकार ही नहीं, बल्कि समाज और हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। हमें वाहन चलाते समय पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। ट्रैफिक नियमों का पालन करना चाहिए और दूसरों की सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए। वाहन की नियमित जांच और रखरखाव भी जरूरी है, ताकि तकनीकी खराबी के कारण दुर्घटना न हो।स्कूल और कॉलेज स्तर पर भी सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने की जरूरत है। युवाओं को यह समझाना जरूरी है कि तेज रफ्तार और स्टंट करना कोई बहादुरी नहीं, बल्कि यह जानलेवा हो सकता है। मीडिया और सोशल मीडिया भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह समझना होगा कि सड़क पर हर व्यक्ति की जान की कीमत बराबर है। एक छोटी सी गलती कई जिंदगियों को खत्म कर सकती है। इसलिए जब भी हम सड़क पर निकलें, तो जिम्मेदारी और सावधानी के साथ वाहन चलाएं। धार जैसी घटनाएं हमें चेतावनी देती हैं कि अगर हमने अभी भी नहीं संभले, तो ऐसे हादसे आगे भी होते रहेंगे। जरूरत है सख्त नियमों के साथ-साथ मजबूत इरादों की, ताकि हम एक सुरक्षित और जिम्मेदार यातायात व्यवस्था बना सकें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 17:20:09 +0530</pubDate>
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                <title>आज़ाद भारत का सर्वाधिक मतदान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के चौथे सबसे बड़े राज्य पश्चिम बंगाल में दूसरे और अंतिम चरण का मतदान सम्पन्न होने के साथ ही पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों पर अब सबकी निगाहें चार मई को होने वाली मतगणना पर टिक गई हैं। बिहार से शुरू हुए मतदाता सूची के शुद्धिकरण (पुनरीक्षण) के बाद वहां हुई बंपर वोटिंग ने मतदान प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि का संकेत दिया था। इसी क्रम में चुनाव आयोग ने विपक्ष के विरोध के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर देश के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची का पुनरीक्षण कराया।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177669/highest-voter-turnout-of-independent-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(2)8.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के चौथे सबसे बड़े राज्य पश्चिम बंगाल में दूसरे और अंतिम चरण का मतदान सम्पन्न होने के साथ ही पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों पर अब सबकी निगाहें चार मई को होने वाली मतगणना पर टिक गई हैं। बिहार से शुरू हुए मतदाता सूची के शुद्धिकरण (पुनरीक्षण) के बाद वहां हुई बंपर वोटिंग ने मतदान प्रतिशत में उल्लेखनीय वृद्धि का संकेत दिया था। इसी क्रम में चुनाव आयोग ने विपक्ष के विरोध के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर देश के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची का पुनरीक्षण कराया।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम बंगाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">असम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तमिलनाडु और पुडुचेरी में चुनाव से पहले मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया गया। इस प्रक्रिया में हजारों-लाखों मतदाता आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत न कर पाने के कारण सूची से बाहर हुए। इसके बावजूद इन पांचों राज्यों में रिकॉर्ड मतदान हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो लोकतांत्रिक चेतना और नागरिक सहभागिता का मजबूत संकेत है। यह स्थिति राजनीतिक दलों की धड़कनें बढ़ाने वाली है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम बंगाल में इस बार लगभग </span>92 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत मतदान दर्ज होना अपने आप में ऐतिहासिक है। यह न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस जनादेश का सेहरा किसके सिर बंधता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्रता के बाद से पश्चिम बंगाल में कभी भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं बनी। यहां कांग्रेस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वामपंथी दलों और पिछले डेढ़ दशक से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व रहा है। इस बार का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके परिणाम राज्य ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय कर सकते हैं।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि भाजपा इस चुनाव में सफलता प्राप्त करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह उसके लिए ऐतिहासिक उपलब्धि होगी और विपक्षी दलों के लिए बड़ा झटका। वहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि ममता बनर्जी लगातार चौथी बार सत्ता में लौटती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की सबसे मजबूत नेता के रूप में उभर सकती हैं। यह भी विचारणीय है कि बढ़ता मतदान प्रतिशत कहीं न कहीं मतदाताओं के बढ़ते विश्वास और लोकतंत्र में उनकी आस्था को दर्शाता है। चाहे इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक छवि और नेतृत्व का प्रभाव हो या स्थानीय मुद्दों की भूमिका एक बात स्पष्ट है कि देश का मतदाता अब पहले से अधिक जागरूक और सक्रिय हो चुका है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">                                                                                                                                  <strong><span lang="hi" xml:lang="hi">                                   अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 17:16:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पांच राज्यों के चुनाव परिणाम को लेकर देशभर में बढ़ती उत्सुकता और राजनीतिक भविष्य की दिशा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश के पांच महत्वपूर्ण राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के बाद अब पूरे देश की नजर आने वाले परिणामों पर टिकी हुई है। मतदान समाप्त होने के साथ ही विभिन्न एजेंसियों द्वारा जारी किए गए एग्जिट पोल ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया है ।हर गली हर शहर और हर राजनीतिक मंच पर यही चर्चा है कि आखिर किसकी सरकार बनेगी और कौन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा ।हालांकि यह भी सच है कि एग्जिट पोल केवल अनुमान होते हैं और कई बार ये वास्तविक परिणामों से काफी अलग साबित हुए हैं। इसलिए अंतिम फैसला तो मतगणना</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177667/there-is-increasing-curiosity-across-the-country-regarding-the-election"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20250331-wa0163.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश के पांच महत्वपूर्ण राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के बाद अब पूरे देश की नजर आने वाले परिणामों पर टिकी हुई है। मतदान समाप्त होने के साथ ही विभिन्न एजेंसियों द्वारा जारी किए गए एग्जिट पोल ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया है ।हर गली हर शहर और हर राजनीतिक मंच पर यही चर्चा है कि आखिर किसकी सरकार बनेगी और कौन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा ।हालांकि यह भी सच है कि एग्जिट पोल केवल अनुमान होते हैं और कई बार ये वास्तविक परिणामों से काफी अलग साबित हुए हैं। इसलिए अंतिम फैसला तो मतगणना के दिन ही होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन चुनावों में असम केरल पश्चिम बंगाल तमिलनाडु और पुदुचेरी जैसे राज्यों की राजनीति दांव पर लगी हुई है ।हर राज्य का राजनीतिक परिदृश्य अलग है और वहां की जनता के मुद्दे भी भिन्न हैं। ऐसे में इन चुनावों के परिणाम केवल सरकारों का गठन ही तय नहीं करेंगे बल्कि यह देश की व्यापक राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित करेंगे। असम में एग्जिट पोल के अनुसार सत्तारूढ़ दल को बढ़त मिलती दिख रही है और लगातार तीसरी बार सरकार बनने की संभावना जताई जा रही है यदि ऐसा होता है तो यह राज्य की राजनीति में स्थिरता का संकेत होगा वहीं विपक्ष के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी कि वह अपनी रणनीति को पुनः परिभाषित करे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केरल में स्थिति कुछ अलग नजर आती है यहां एग्जिट पोल में सत्ता परिवर्तन की संभावना जताई जा रही है यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो यह राज्य की पारंपरिक राजनीतिक प्रवृत्ति के अनुरूप होगा जहां जनता समय समय पर सरकार बदलती रही है। इससे यह संकेत मिलता है कि मतदाता अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं और वे प्रदर्शन के आधार पर निर्णय लेते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार सबसे अधिक चर्चा में रहा है। यहां मुकाबला बेहद कड़ा बताया जा रहा है ।एग्जिट पोल के अनुसार दोनों प्रमुख दलों के बीच कांटे की टक्कर है कुछ अनुमानों में एक पक्ष को बढ़त दिखाई गई है तो कुछ में दूसरे को यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण काफी गहरा है और मतदाताओं ने सोच समझकर मतदान किया है। तमिलनाडु में एग्जिट पोल के अनुसार वर्तमान सरकार की वापसी की संभावना जताई गई है यदि ऐसा होता है तो यह वहां की जनता द्वारा स्थिरता और निरंतरता को प्राथमिकता देने का संकेत होगा। साथ ही यह भी दर्शाता है कि राज्य में क्षेत्रीय दलों की पकड़ अभी भी मजबूत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुदुचेरी में भी राजनीतिक समीकरण दिलचस्प बने हुए हैं। यहां एग्जिट पोल में मौजूदा गठबंधन को बढ़त मिलती दिख रही है हालांकि छोटे राज्यों में अक्सर परिणाम अप्रत्याशित भी हो सकते हैं इसलिए यहां भी अंतिम नतीजों का इंतजार करना जरूरी है। एग्जिट पोल को लेकर एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इनका इतिहास पूरी तरह विश्वसनीय नहीं रहा है कई बार ये वास्तविक परिणामों के काफी करीब रहे हैं लेकिन कई बार पूरी तरह गलत भी साबित हुए हैं। उदाहरण के तौर पर पहले भी कई चुनावों में एग्जिट पोल ने एक पक्ष की जीत का दावा किया लेकिन परिणाम ठीक इसके उलट आए ,इससे यह स्पष्ट होता है कि मतदाताओं का अंतिम निर्णय अक्सर अनुमान से परे होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देशभर में इन चुनावों को लेकर उत्साह का माहौल है ।चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक हर जगह लोग अपने अपने अनुमान लगा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक विभिन्न आंकड़ों और रुझानों के आधार पर भविष्यवाणी कर रहे हैं। वहीं आम जनता भी इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में गहरी रुचि दिखा रही है। इन चुनावों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इसमें महिलाओं और युवाओं की भागीदारी काफी अधिक रही है। कई स्थानों पर महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक दर्ज की गई है यह लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि समाज के सभी वर्ग अपनी भूमिका निभा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा इन चुनावों में स्थानीय मुद्दों के साथ साथ राष्ट्रीय मुद्दों का भी प्रभाव देखा गया है ।विकास ,रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था जैसे विषय मतदाताओं के निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते नजर आए हैं। राजनीतिक दलों ने भी अपने अपने घोषणापत्र में इन मुद्दों को प्रमुखता दी है। चुनाव परिणाम केवल सरकार गठन तक सीमित नहीं होते बल्कि यह आने वाले समय की नीतियों और योजनाओं को भी प्रभावित करते हैं ,इसलिए इन परिणामों का महत्व और भी बढ़ जाता है ।यह तय करेंगे कि किस दिशा में विकास की नीतियां आगे बढ़ेंगी और जनता की अपेक्षाओं को किस प्रकार पूरा किया जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि यह भी जरूरी है कि हम एग्जिट पोल को अंतिम सत्य न मानें यह केवल एक संकेत हैं न कि निष्कर्ष वास्तविक परिणाम ही यह तय करेंगे कि जनता ने किसे अपना समर्थन दिया है ।इसलिए धैर्य बनाए रखना और आधिकारिक नतीजों का इंतजार करना ही उचित होगा।</div>
<div style="text-align:justify;">अंत में यह कहा जा सकता है कि पांच राज्यों के ये चुनाव देश के लोकतांत्रिक ढांचे की मजबूती को दर्शाते हैं। मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र केवल एक व्यवस्था नहीं बल्कि एक जीवंत परंपरा है।</div>
<div style="text-align:justify;">अब सभी की नजरें मतगणना के दिन पर टिकी हुई हैं जब यह स्पष्ट हो जाएगा कि किसकी सरकार बनेगी और कौन मुख्यमंत्री बनेगा तब तक अटकलों और चर्चाओं का दौर जारी रहेगा लेकिन अंतिम निर्णय जनता के मतों के आधार पर ही होगा और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।</div>
<div style="text-align:justify;">          *कान्तिलाल मांडोत*</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 17:12:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>बाल श्रम की व्यथा और कठोर श्रम करते हाथ मूल सुविधाओं से वंचित</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 1 मई को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस केवल श्रमिकों के सम्मान का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य अदृश्य हाथों की पीड़ा को भी सामने लाता है जो आज भी अपने अधिकारों से वंचित हैं। भारत जैसे विकासशील देश में यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहाँ श्रम के साथ-साथ बाल श्रम की समस्या भी एक गहरी सामाजिक विडंबना के रूप में उपस्थित है।</p>
<p style="text-align:justify;">संविधान और कानूनों के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों से खतरनाक उद्योगों, कारखानों, होटलों, ढाबों या अन्य वाणिज्यिक गतिविधियों में कार्य कराना अपराध</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177665/the-pain-of-child-labor-and-hard-labor-deprived-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/international-labour-day_-_loom_solar_600x.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 1 मई को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस केवल श्रमिकों के सम्मान का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य अदृश्य हाथों की पीड़ा को भी सामने लाता है जो आज भी अपने अधिकारों से वंचित हैं। भारत जैसे विकासशील देश में यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहाँ श्रम के साथ-साथ बाल श्रम की समस्या भी एक गहरी सामाजिक विडंबना के रूप में उपस्थित है।</p>
<p style="text-align:justify;">संविधान और कानूनों के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों से खतरनाक उद्योगों, कारखानों, होटलों, ढाबों या अन्य वाणिज्यिक गतिविधियों में कार्य कराना अपराध है। इसके बावजूद वास्तविकता यह है कि देश के छोटे-बड़े शहरों, कस्बों और गांवों में लाखों बच्चे आज भी श्रम के बोझ तले दबे हुए हैं। वे कभी चाय की दुकानों पर काम करते दिखते हैं, कभी पटाखा उद्योगों में, तो कभी कचरा बीनते या भीख मांगते हुए। यह केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि उनके बचपन, शिक्षा और भविष्य का भी हनन है।<br />बाल श्रम की जड़ें गहरी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;"> गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी, अशिक्षा और सामाजिक जागरूकता का अभाव इसके प्रमुख कारण हैं। कई परिवारों में आर्थिक मजबूरी इतनी तीव्र होती है कि वे स्वयं अपने बच्चों को श्रम के दलदल में धकेल देते हैं। इसके अतिरिक्त अभिभावकों की असामयिक मृत्यु, बीमारी या परिवार में अधिक सदस्यों का होना भी बच्चों को समय से पहले जिम्मेदारियों के बोझ तले ला देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">बाल श्रमिकों का शोषण बहुआयामी होता है शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक। उन्हें वयस्क श्रमिकों की तुलना में बहुत कम पारिश्रमिक दिया जाता है, जिससे नियोजकों के लिए वे सस्ते और सुविधाजनक श्रम का स्रोत बन जाते हैं। यही कारण है कि बाल श्रम की प्रवृत्ति समाप्त होने के बजाय कई स्थानों पर बढ़ती दिखाई देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस समस्या के समाधान के लिए भारत सरकार ने कई महत्वपूर्ण कानून और योजनाएँ लागू की हैं, जैसे बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, तथा राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना। इसके साथ ही भारत सरकार द्वारा पोषण, शिक्षा और बाल संरक्षण से जुड़ी अनेक योजनाएँ संचालित की जा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और यूनिसेफ जैसे संगठन बाल श्रम उन्मूलन के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन के कन्वेंशन 138 और 182 विशेष रूप से बाल श्रम के उन्मूलन और खतरनाक कार्यों से बच्चों को मुक्त कराने पर केंद्रित हैं। फिर भी, समस्या का समाधान केवल कानून बनाने से नहीं होगा, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से ही संभव है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुर्भाग्यवश, कई बार इन कानूनों का पालन कराने वाली एजेंसियाँ भ्रष्टाचार, लापरवाही और लालफीताशाही की शिकार हो जाती हैं। परिणामस्वरूप, नियोजक आसानी से बच निकलते हैं और बच्चे शोषण की आग में झोंक दिए जाते हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि बाल श्रम केवल एक कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि एक सामाजिक और नैतिक प्रश्न भी है। जब तक समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता नहीं बढ़ेगी, जब तक हम बच्चों को श्रम नहीं बल्कि शिक्षा और संस्कार का अधिकार देने के लिए प्रतिबद्ध नहीं होंगे, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">मजदूर वर्ग की व्यापक स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिक आज भी न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षित कार्यस्थल जैसे मूल अधिकारों से वंचित हैं। प्रवासी मजदूरों की स्थिति, विशेषकर महामारी के समय, ने इस सच्चाई को उजागर कर दिया कि श्रमिक वर्ग हमारे विकास का आधार होने के बावजूद सबसे अधिक उपेक्षित है। आज आवश्यकता इस बात की है कि बाल श्रम और श्रमिक शोषण के विरुद्ध एक समन्वित और सख्त नीति अपनाई जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके लिए कानूनों का कठोर और पारदर्शी क्रियान्वयन,शिक्षा और पोषण योजनाओं का प्रभावी विस्तार, गरीब परिवारों के लिए आर्थिक सुरक्षा, और समाज में जागरूकता का प्रसार अत्यंत आवश्यक है। यदि हम सचमुच एक सशक्त और विकसित राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें अपने बच्चों को श्रम की बेड़ियों से मुक्त कर शिक्षा और अवसरों की मुख्यधारा में लाना होगा। अन्यथा, आज का यह बाल श्रमिक कल का कमजोर नागरिक बनेगा, और एक सुदृढ़ राष्ट्र का सपना अधूरा ही रह जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 17:08:14 +0530</pubDate>
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                <title>कंकाल से उपजते व्यवस्था पर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ओडिशा के क्योंझर जिले से आई कंकाल ढोने की खबर ने देश की सामूहिक चेतना को इस कदर झकझोर दिया कि उसने आधुनिक भारत के विकास और डिजिटल साक्षरता के दावों पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। यह घटना केवल एक व्यक्ति के निजी दुख या उसकी अज्ञानता की कहानी नहीं है बल्कि यह उस अमानवीय स्थिति का जीवंत चित्रण है जहाँ एक निर्धन और असहाय नागरिक को अपनी मृत बहन के कंकाल को लेकर बैंक की दहलीज तक जाना पड़ा। 19402 रुपये की एक ऐसी राशि जो किसी संपन्न व्यक्ति के लिए बहुत मामूली हो सकती</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177663/questions-on-the-system-arising-from-the-skeleton"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(1)14.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ओडिशा के क्योंझर जिले से आई कंकाल ढोने की खबर ने देश की सामूहिक चेतना को इस कदर झकझोर दिया कि उसने आधुनिक भारत के विकास और डिजिटल साक्षरता के दावों पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। यह घटना केवल एक व्यक्ति के निजी दुख या उसकी अज्ञानता की कहानी नहीं है बल्कि यह उस अमानवीय स्थिति का जीवंत चित्रण है जहाँ एक निर्धन और असहाय नागरिक को अपनी मृत बहन के कंकाल को लेकर बैंक की दहलीज तक जाना पड़ा। 19402 रुपये की एक ऐसी राशि जो किसी संपन्न व्यक्ति के लिए बहुत मामूली हो सकती है पर एक गरीब के लिए वह उसके जीवन भर की संचित पूंजी थी। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस छोटी सी राशि को प्राप्त करने के लिए एक भाई का यह भयावह कदम समाज की संवेदनहीनता और हमारे प्रशासनिक ढांचे की चरम विफलता का एक ऐसा प्रमाण है जिसे इतिहास कभी भुला नहीं पाएगा। यह घटना स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि जब सरकारी नियम और कानून मानवीय संवेदनाओं से ऊपर हो जाते हैं तो व्यवस्था किस प्रकार एक नागरिक को अपमानित और लाचार बना देती है। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">बहन की मृत्यु के लगभग 2 महीने बीत जाने के बाद भी जब वह व्यक्ति अपनी छोटी सी जमा राशि को प्राप्त करने के लिए दर-दर भटकता रहा तो उसकी गहरी हताशा ने उसे इस मार्ग को चुनने पर विवश कर दिया। वह व्यक्ति लगभग 3 किलोमीटर की लंबी दूरी तय करते हुए उस कंकाल को कंधे पर लादकर बैंक तक पहुंचा ताकि वह वहां बैठे अधिकारियों को यह अंतिम और अकाट्य प्रमाण दे सके कि उसकी बहन अब वास्तव में इस दुनिया में नहीं है। इस दृश्य ने न केवल वहां उपस्थित लोगों को स्तब्ध कर दिया बल्कि इसने पूरे देश के प्रशासनिक और बैंकिंग तंत्र की खामियों को भी सार्वजनिक रूप से नग्न कर दिया।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस घटना की पृष्ठभूमि में यदि हम गहराई से उतरें तो यह स्पष्ट होता है कि भारत में एक मृत्यु प्रमाण पत्र केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं है बल्कि यह एक ऐसा कानूनी दस्तावेज है जिसके बिना व्यक्ति का अस्तित्व समाप्त होने के बाद भी उसकी संपत्तियां और अधिकार एक कानूनी जाल में फंसे रहते हैं। भारत के नियमों के अनुसार किसी भी व्यक्ति की मृत्यु का पंजीकरण 21 दिनों के भीतर कराना अनिवार्य होता है। यह अवधि बीत जाने के बाद प्रक्रिया और भी जटिल हो जाती है जिसमें शपथ पत्र और विभिन्न स्तरों पर सत्यापन की आवश्यकता होती है। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">क्योंझर के उस आदिवासी व्यक्ति के पास न तो शिक्षा थी और न ही उसे इन जटिल कानूनी प्रक्रियाओं का कोई ज्ञान था। उसके लिए उसकी बहन की मृत्यु एक अपूरणीय क्षति थी लेकिन व्यवस्था के लिए वह केवल एक आंकड़ा भर थी जिसके लिए दस्तावेजों की पूर्ति अनिवार्य थी। जब वह व्यक्ति पहली बार बैंक गया होगा तो शायद उसे नियमों का हवाला देकर लौटा दिया गया होगा। उसके पास मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं था और न ही वह कानूनी उत्तराधिकारी होने का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत कर पा रहा था। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यहाँ बैंकिंग प्रणाली की सुरक्षा और पारदर्शिता के तर्क तो सही हो सकते हैं लेकिन जिस संवेदनशीलता के साथ ऐसे मामलों का निपटारा किया जाना चाहिए था उसका वहां पूर्ण अभाव दिखा। बैंक अधिकारियों का यह कहना कि उन्होंने केवल कानूनी दस्तावेजों की मांग की थी और कभी भी मृत शरीर की उपस्थिति नहीं मांगी थी तकनीकी रूप से सही हो सकता है लेकिन एक अशिक्षित व्यक्ति की दृष्टि से यह उसकी असफलता और निराशा का अंत था।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह त्रासदी तीन मुख्य स्तरों पर हुई विफलता का परिणाम है। पहला स्तर प्रशासनिक है जहाँ स्थानीय प्रशासन और पंचायत स्तर पर उस व्यक्ति को कोई सहयोग प्राप्त नहीं हुआ। यदि स्थानीय प्रशासन ने समय पर मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने में उसकी सहायता की होती या उसे सही दिशा दिखाई होती तो शायद उसे इस अपमानजनक स्थिति से नहीं गुजरना पड़ता। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दूसरा स्तर जागरूकता की कमी है जो हमारे देश के सुदूर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। सरकारें भले ही डिजिटल इंडिया का नारा देती हों लेकिन धरातल पर आज भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसे यह नहीं पता कि एक सामान्य प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया क्या है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण स्तर संस्थागत संवेदनशीलता का है। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">बैंक जैसे वित्तीय संस्थानों में नियम अत्यंत कठोर होते हैं क्योंकि वहां धन की सुरक्षा का प्रश्न होता है। लेकिन क्या नियमों की इस कठोरता में मानवीय विवेक के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए? जब एक व्यक्ति बार-बार आकर अपनी विवशता बता रहा था तो क्या बैंक प्रबंधक या स्थानीय अधिकारी किसी वैकल्पिक सत्यापन की प्रक्रिया को नहीं अपना सकते थे?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस पूरी घटना का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि जिस प्रशासनिक तंत्र ने उस व्यक्ति को महीनों तक चक्कर कटवाए उसी तंत्र ने इस घटना के तूल पकड़ते ही मात्र कुछ घंटों के भीतर सारे दस्तावेज तैयार कर दिए। जैसे ही यह मामला समाचारों की सुर्खियों में आया और उच्च अधिकारियों तक पहुंचा तो उसी दिन मृत्यु प्रमाण पत्र और कानूनी उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यहाँ तक कि बैंक ने भी तुरंत 19402 रुपये की राशि संबंधित वारिसों को हस्तांतरित कर दी। यह गतिशीलता इस बात का प्रमाण है कि हमारी व्यवस्था अक्षम नहीं है बल्कि वह उदासीन है। जब तक कोई मामला राष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का कारण नहीं बनता तब तक फाइलों के पहिए नहीं घूमते। यदि यही सक्रियता दो महीने पहले दिखाई गई होती तो उस व्यक्ति को अपनी बहन के अवशेषों के साथ 3 किलोमीटर तक पैदल चलकर समाज को अपनी विवशता का यह भयावह प्रदर्शन नहीं करना पड़ता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस मामले में कानूनी उत्तराधिकार का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कानून के अनुसार उत्तराधिकार की श्रेणियां निर्धारित होती हैं और अक्सर भाई या अन्य रिश्तेदारों को प्रथम श्रेणी का वारिस नहीं माना जाता जब तक कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियां न हों। यह कानूनी बारीकियां एक आम आदमी की समझ से परे होती हैं। वह व्यक्ति केवल इतना जानता था कि उसकी बहन का पैसा बैंक में है और उसे उसकी आवश्यकता है। समाज में मौजूद आर्थिक असमानता यहाँ एक और बड़ा कारक बनकर उभरती है। एक निर्धन व्यक्ति के लिए कानूनी प्रक्रिया की लागत और समय दोनों ही उसकी क्षमता से बाहर होते हैं। वह वकील नहीं कर सकता और न ही वह कचहरी के चक्कर काटने के लिए अपनी मजदूरी छोड़ सकता है। ऐसे में उसके पास केवल निराशा ही शेष रह जाती है।</div><div style="text-align:justify;">यह घटना हमें यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि क्या हमारी बैंकिंग और सरकारी प्रणालियाँ केवल साक्षर और शहरी जनसंख्या को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं? ग्रामीण भारत की वास्तविकताएं शहरों से बिल्कुल अलग हैं। वहाँ पहचान के संकट से लेकर भाषा और प्रक्रियागत बाधाएं कदम-कदम पर खड़ी होती हैं। इस घटना के बाद राजनीतिक गलियारों में भी चर्चाएं हुईं और जांच के आदेश भी दिए गए लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई बुनियादी बदलाव किए जाएंगे? केवल जांच करना या किसी कर्मचारी को निलंबित कर देना इस समस्या का स्थाई समाधान नहीं है। समाधान तब होगा जब हमारी व्यवस्था प्रत्येक नागरिक को एक संख्या के बजाय एक इंसान के रूप में देखना शुरू करेगी।</div><div style="text-align:justify;">अंत में यह कहना उचित होगा कि क्योंझर की यह घटना एक व्यक्ति की अज्ञानता से कहीं अधिक एक पूरे तंत्र की सामूहिक हार है। यह हमें यह सबक देती है कि नियम समाज की सुविधा के लिए होने चाहिए न कि समाज को प्रताड़ित करने के लिए। 19402 रुपये की उस राशि ने उस दिन केवल एक खाते का निपटारा नहीं किया बल्कि उसने हमारे आधुनिक समाज के चेहरे पर एक ऐसा दाग लगा दिया जो लंबे समय तक हमें हमारी जिम्मेदारियों की याद दिलाता रहेगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> विकास का अर्थ केवल ऊंची इमारतें या तेज इंटरनेट नहीं है बल्कि विकास का असली अर्थ तब है जब समाज का सबसे अंतिम व्यक्ति भी सम्मान के साथ अपना अधिकार प्राप्त कर सके और उसे अपनी सच्चाई साबित करने के लिए किसी कंकाल का सहारा न लेना पड़े। जब तक संवेदनशीलता को प्रशासन का अनिवार्य अंग नहीं बनाया जाएगा तब तक ऐसी हृदयविदारक घटनाएं व्यवस्था की पोल खोलती रहेंगी और हम केवल मूकदर्शक बनकर रह जाएंगे। हमें एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है जहाँ नियम मानवीय गरिमा के साथ सामंजस्य बिठा सकें ताकि कोई भी व्यक्ति स्वयं को इतना अकेला और लाचार महसूस न करे कि उसे अपनी मर्यादा और मृत अपनों के सम्मान को दांव पर लगाना पड़े।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 17:03:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>दीर्घकालिक लापरवाही से बढ़ रही शहरों की प्यास</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">राजीव शुक्ला</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भीषण गर्मी की लहरें अभी से रिकॉर्ड तोड़ रही हैं और देश के बड़े-बड़े शहरों में बिजली की मांग चरम पर पहुंच गई है। इसी के साथ जल संकट एक बार फिर सिर उठा रहा है। दिल्ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेंगलुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेन्नई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हैदराबाद और मुंबई जैसे महानगरों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। कई इलाकों में टैंकरों की लंबी कतारें लग रही हैं तथा पानी की आपूर्ति अनियमित हो गई है। दक्षिण भारत के अनेक जलाशयों में अप्रैल महीने में ही कुल भंडारण क्षमता का लगभग </span>47<span lang="hi" xml:lang="hi">  से </span>50<span lang="hi" xml:lang="hi">  प्रतिशत से भी कम पानी बचा</span>2026</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177587/the-thirst-of-cities-is-increasing-due-to-long-term"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/whatsapp-image-2026-04-28-at-11.16.04.jpeg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">राजीव शुक्ला</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भीषण गर्मी की लहरें अभी से रिकॉर्ड तोड़ रही हैं और देश के बड़े-बड़े शहरों में बिजली की मांग चरम पर पहुंच गई है। इसी के साथ जल संकट एक बार फिर सिर उठा रहा है। दिल्ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेंगलुरु</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चेन्नई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हैदराबाद और मुंबई जैसे महानगरों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। कई इलाकों में टैंकरों की लंबी कतारें लग रही हैं तथा पानी की आपूर्ति अनियमित हो गई है। दक्षिण भारत के अनेक जलाशयों में अप्रैल महीने में ही कुल भंडारण क्षमता का लगभग </span>47<span lang="hi" xml:lang="hi"> से </span>50<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत से भी कम पानी बचा है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि तत्काल प्रभावी और दीर्घकालिक कदम नहीं उठाए गए तो वर्ष </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> का ग्रीष्म कई शहरों के लिए ‘डे जीरो’ जैसी भयावह स्थिति पैदा कर सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत विश्व के सबसे जल-तनावग्रस्त देशों में शामिल है। नीति आयोग और विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार देश की प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता लगातार घट रही है। शहरीकरण की तेज रफ्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनसंख्या वृद्धि तथा कृषि क्षेत्र में भूजल का अत्यधिक दोहन मुख्य कारण हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड के हालिया आकलन के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर भूजल निकासी लगभग </span>60<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि कई राज्यों में यह </span>100<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत से भी अधिक पहुंच चुका है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस वर्ष की प्रारंभिक गर्मी ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। दिल्ली जैसे शहरों में भूजल अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्रों में बोरवेल अब </span>300<span lang="hi" xml:lang="hi"> फीट से भी अधिक गहराई तक जाने को मजबूर हैं। बेंगलुरु में हजारों बोरवेल सूख चुके हैं तथा कई क्षेत्र उच्च जल-तनाव वाले चिह्नित किए गए हैं। चेन्नई और हैदराबाद भी निरंतर संकट से जूझ रहे हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">कारण और प्रभाव </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस संकट के पीछे कई गंभीर कारण हैं। अनियोजित शहरी विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षा जल संचयन की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तालाबों और झीलों का अतिक्रमण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपशिष्ट जल का नाकाफी उपचार तथा भूजल का अंधाधुंध दोहन प्रमुख हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून की अनिश्चितता भी समस्या को बढ़ा रही है। शहरी क्षेत्रों में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट जल का मात्र </span>28<span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रतिशत ही उपचारित हो पाता है। शेष अनुपचारित जल नदियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झीलों और भूजल को प्रदूषित कर रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">पेय पदार्थ कंपनियों का जल दोहन:</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संकट को और गंभीर बनाने में कोका कोला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पेप्सी तथा अन्य शीतल पेय और बोतलबंद पानी बनाने वाली बड़ी कंपनियों की भूमिका भी उल्लेखनीय है। इन कंपनियों के बॉटलिंग प्लांट भूजल का भारी मात्रा में उपयोग करते हैं। एक सामान्य शीतल पेय की बोतल बनाने में उत्पादन प्रक्रिया सहित सैकड़ों लीटर पानी खर्च होता है। कई क्षेत्रों में इन प्लांटों को भूजल के अत्यधिक दोहन के लिए दोषी ठहराया जाता रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केरल के प्लाचीमाडा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजस्थान के काला डेरा और उत्तर प्रदेश के मेहदीगंज जैसे स्थानों पर स्थानीय किसानों और निवासियों ने आरोप लगाए हैं कि इन कंपनियों के प्लांटों के कारण भूजल स्तर तेजी से गिरा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कृषि प्रभावित हुई और गांवों में पीने के पानी की कमी बढ़ी। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने भी उत्तर प्रदेश में इन कंपनियों के कुछ प्लांटों पर भूजल दोहन के लिए करोड़ों रुपये का जुर्माना लगाया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ये कंपनियां लाखों लीटर भूजल प्रतिदिन निकालती हैं जबकि आसपास के गांव टैंकर पानी पर निर्भर रहते हैं। यद्यपि कंपनियां जल संरक्षण और रिचार्ज परियोजनाओं का दावा करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कई स्वतंत्र अध्ययनों और स्थानीय शिकायतों में इन प्रयासों को अपर्याप्त बताया जाता है। जब आम नागरिक पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब बड़े पैमाने पर शीतल पेय और बोतलबंद पानी का उत्पादन जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्य नागरिकों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ रहा है। निम्न आय वर्ग के परिवार और झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग महंगे तथा अक्सर दूषित टैंकर पानी पर निर्भर हो गए हैं। जलजनित बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं। साथ ही अर्थव्यवस्था पर भी भारी बोझ पड़ रहा है। उद्योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटे कारोबार और कृषि कार्य सभी प्रभावित हो रहे हैं। गर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली संकट और जल संकट अब एक-दूसरे से जुड़कर एक विकट चक्र बना रहे हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">नीतिगत चुनौतियां</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारें हर वर्ष ग्रीष्म ऋतु से पहले कार्य योजना जारी करती हैं – टैंकरों की व्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जल आपूर्ति बढ़ाने के प्रयास और जागरूकता अभियान। ये कदम सराहनीय हैं किंतु ये केवल लक्षणों का उपचार हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मूल समस्या का समाधान नहीं। अपशिष्ट जल उपचार की क्षमता अभी भी बहुत कम है। वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाने और पुराने जलाशयों के पुनरुद्धार पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। शहरी स्थानीय निकायों की क्षमता सीमित है। भूजल दोहन पर सख्त नियंत्रण लागू करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पेय पदार्थ उद्योग पर भी सख्त नियमन की जरूरत है। उच्च जल-तनाव वाले क्षेत्रों में नए प्लांट स्थापित करने पर रोक तथा मौजूदा प्लांटों के जल उपयोग की स्वतंत्र निगरानी अनिवार्य होनी चाहिए। कृषि क्षेत्र में कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने की नीति भी अभी अपर्याप्त है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या किया जाना चाहिए</span>?</strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह संकट हमें याद दिलाता है कि सतत विकास जल सुरक्षा के बिना संभव नहीं है। तत्काल और दीर्घकालिक दोनों स्तरों पर कार्रवाई की आवश्यकता है:</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">- <span lang="hi" xml:lang="hi">हर इमारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कॉलोनी और औद्योगिक इकाई में वर्षा जल संचयन प्रणाली को अनिवार्य बनाना तथा इसके पालन के लिए पुरस्कार और दंड की स्पष्ट व्यवस्था करना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">- <span lang="hi" xml:lang="hi">अपशिष्ट जल के उपचार और पुनः उपयोग को बढ़ावा देना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषकर उद्योग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्माण और बागवानी जैसे गैर-पीने वाले कार्यों के लिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">- <span lang="hi" xml:lang="hi">भूजल दोहन पर सख्त निगरानी तथा रिचार्ज प्रणाली लागू करना। उच्च जल-तनाव वाले क्षेत्रों में पेय पदार्थ कंपनियों के भूजल उपयोग पर सख्त प्रतिबंध लगाना और उनके जल उपयोग की वार्षिक स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य करना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">- <span lang="hi" xml:lang="hi">शहरी नियोजन में झीलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तालाबों और हरित क्षेत्रों का संरक्षण सुनिश्चित करना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">- <span lang="hi" xml:lang="hi">जल बचत को जन-जागरूकता के माध्यम से संस्कृति का हिस्सा बनाना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर एक मजबूत राष्ट्रीय जल सुरक्षा मिशन तैयार करना चाहिए जिसमें बुनियादी ढांचे का विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थानीय स्तर के समाधान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डेटा आधारित निगरानी और जलवायु अनुकूलन सभी शामिल हों। पेय उद्योग को भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए जल-न्यूट्रल उत्पादन की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">निष्कर्ष: </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">भीषण गर्मी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली संकट और जल संकट अब एक साथ आ रहे हैं। ये अलग-अलग मुद्दे नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन और अनियोजित विकास की एक ही कहानी के विभिन्न पहलू हैं। जब बड़े उद्योग लाखों लीटर पानी का उपयोग कर रहे हों तो आम जनता की प्यास बुझाना और भी कठिन हो जाता है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि हम आज दूरदर्शी कदम नहीं उठाए तो कल का शहरी भारत विकास की राह पर ठिठक सकता है। हर बूंद कीमती है। पानी की बर्बादी रोकना हर नागरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग और सरकार की जिम्मेदारी है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">समय अभी है। सतत और दूरदर्शी नीतियों के साथ-साथ सामूहिक प्रयास से ही हम इस बढ़ते संकट को नियंत्रित कर सकते हैं और एक जल-समृद्ध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सतत तथा मजबूत भारत का निर्माण कर सकते हैं।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 17:39:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र पर हमला और चुनावी प्रक्रिया की साख पर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में चल रहे चुनावी परिदृश्य ने एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। जिस प्रक्रिया को संविधान ने जनता की सर्वोच्च अभिव्यक्ति का माध्यम माना है, उसी प्रक्रिया के दौरान हिंसा, मारपीट, डराने-धमकाने और चुनावी मशीनों से छेड़छाड़ जैसे आरोप सामने आना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। हाल के घटनाक्रमों में भाजपा कार्यकर्ताओं और उम्मीदवारों पर हमले, बूथों पर तनाव और ईवीएम के साथ कथित छेड़छाड़ की खबरें इस बात का संकेत देती हैं कि चुनाव केवल मतदान का कार्य नहीं रह गया है बल्कि शक्ति प्रदर्शन का माध्यम</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177582/attack-on-democracy-in-west-bengal-and-questions-on-credibility"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas19.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में चल रहे चुनावी परिदृश्य ने एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। जिस प्रक्रिया को संविधान ने जनता की सर्वोच्च अभिव्यक्ति का माध्यम माना है, उसी प्रक्रिया के दौरान हिंसा, मारपीट, डराने-धमकाने और चुनावी मशीनों से छेड़छाड़ जैसे आरोप सामने आना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। हाल के घटनाक्रमों में भाजपा कार्यकर्ताओं और उम्मीदवारों पर हमले, बूथों पर तनाव और ईवीएम के साथ कथित छेड़छाड़ की खबरें इस बात का संकेत देती हैं कि चुनाव केवल मतदान का कार्य नहीं रह गया है बल्कि शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनता जा रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इन घटनाओं के केंद्र में राजनीतिक दलों के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा तो है ही, लेकिन उससे भी अधिक चिंता का विषय यह है कि क्या मतदाता वास्तव में बिना भय के अपना मताधिकार इस्तेमाल कर पा रहा है। भाजपा के कार्यकर्ताओं पर हमले के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं, वहीं तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों पर हिंसा फैलाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। यह स्थिति केवल राजनीतिक टकराव नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">चुनाव के दौरान हिंसा की घटनाएं नई नहीं हैं, लेकिन जिस तरह से बूथ स्तर पर एजेंटों को निशाना बनाया गया, उम्मीदवारों की गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई और खुलेआम मारपीट हुई, वह यह दर्शाता है कि कानून और व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि हर नागरिक बिना किसी दबाव के अपने मत का प्रयोग करे। लेकिन जब किसी पोलिंग एजेंट को घायल कर दिया जाता है या किसी उम्मीदवार को मतदान केंद्र के आसपास घेर लिया जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर आघात है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सबसे गंभीर आरोप ईवीएम मशीनों के साथ छेड़छाड़ को लेकर सामने आए हैं। यदि किसी भी मतदान केंद्र पर किसी विशेष पार्टी के चुनाव चिन्ह के सामने टेप लगाया जाता है, तो यह केवल तकनीकी गड़बड़ी नहीं बल्कि मतदाता की स्वतंत्रता को बाधित करने का प्रयास माना जाएगा। इस प्रकार की घटनाएं लोकतंत्र की आत्मा के विपरीत हैं। निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट कहा है कि जहां भी ऐसी शिकायतें सही पाई जाएंगी, वहां पुनर्मतदान कराया जाएगा। यह कदम आवश्यक है, लेकिन इससे यह सवाल भी उठता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न ही क्यों हुई।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राजनीतिक बयानबाजी भी इस पूरे माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना रही है। ममता बानर के नेतृत्व वाली सरकार पर विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि राज्य में निष्पक्ष चुनाव कराना संभव नहीं हो पा रहा है। वहीं सत्ताधारी दल इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज करता है। इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच असली मुद्दा कहीं पीछे छूट जाता है, जो है आम मतदाता की सुरक्षा और स्वतंत्रता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होता, बल्कि यह जनता के विश्वास का प्रतीक होता है। यदि इस प्रक्रिया में हिंसा और डर का माहौल हावी हो जाए, तो यह विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। पश्चिम बंगाल में सामने आई घटनाएं यह संकेत देती हैं कि राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। किसी भी दल की जीत या हार से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष और शांतिपूर्ण हो।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह भी ध्यान देने योग्य है कि लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं चलता, बल्कि उसमें भाग लेने वाले सभी पक्षों की जिम्मेदारी होती है। राजनीतिक दलों, प्रशासन, सुरक्षा बलों और मतदाताओं सभी को मिलकर यह सुनिश्चित करना होता है कि चुनाव एक उत्सव की तरह संपन्न हो, न कि संघर्ष के मैदान की तरह। जब कार्यकर्ता हिंसा का सहारा लेते हैं, तो वे अपने ही लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर करते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल की राजनीतिक संस्कृति लंबे समय से संघर्ष और प्रतिस्पर्धा से भरी रही है। लेकिन आधुनिक लोकतंत्र में इस प्रकार की हिंसात्मक प्रवृत्तियों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। यदि किसी भी स्तर पर यह साबित होता है कि चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए जानबूझकर हिंसा या तकनीकी छेड़छाड़ की गई, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई आवश्यक है। केवल पुनर्मतदान कराना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि दोषियों को सजा देना भी उतना ही जरूरी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू है जनता का भरोसा। जब लोग यह सुनते हैं कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ हुई या किसी पार्टी के कार्यकर्ताओं को मतदान से रोका गया, तो उनके मन में संदेह उत्पन्न होता है। यह संदेह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। यदि जनता का विश्वास ही डगमगा जाए, तो चुनाव का महत्व कम हो जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसलिए आवश्यक है कि सभी पक्ष संयम बरतें और चुनाव आयोग को पूरी स्वतंत्रता और सहयोग दिया जाए। सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सख्त किया जाना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की हिंसा को रोका जा सके। साथ ही राजनीतिक दलों को अपने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश देना चाहिए कि वे कानून का पालन करें और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करें।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अंततः यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल अधिकार नहीं बल्कि जिम्मेदारी भी है। पश्चिम बंगाल में जो घटनाएं सामने आई हैं, वे केवल एक राज्य का मामला नहीं हैं, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चेतावनी हैं। यदि हम इन घटनाओं से सबक नहीं लेते, तो भविष्य में ऐसी परिस्थितियां और अधिक गंभीर हो सकती हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लोकतंत्र की रक्षा केवल कानून से नहीं बल्कि आचरण से होती है। जब तक राजनीतिक दल अपने व्यवहार में सुधार नहीं लाते और हिंसा से दूरी नहीं बनाते, तब तक ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी। अब समय आ गया है कि चुनाव को संघर्ष नहीं बल्कि विश्वास और सहभागिता का माध्यम बनाया जाए, ताकि भारत का लोकतंत्र और अधिक मजबूत बन सके।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कान्तिलाल मांडोत</strong></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 17:25:08 +0530</pubDate>
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                <title>तीन दशक का विश्वास, विकास की राजनीति और संगठन की ताकत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव 2026 के परिणाम केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि तीन दशकों से निर्मित एक राजनीतिक, संगठनात्मक और वैचारिक यात्रा की पुष्टि के रूप में सामने आए हैं। नगर निगमों से लेकर जिला पंचायतों और तालुका पंचायतों तक, भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से व्यापक और लगभग एकतरफा जीत दर्ज की है, वह राज्य की राजनीति के बदलते स्वरूप, मतदाताओं की प्राथमिकताओं और विपक्ष की कमजोरियों को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। यह परिणाम इस बात का संकेत भी है कि गुजरात में राजनीतिक स्थिरता, नेतृत्व पर भरोसा और विकास का नैरेटिव अभी भी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177577/three-decades-of-trust-development-politics-and-the-power-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas19.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">गुजरात के स्थानीय निकाय चुनाव 2026 के परिणाम केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि तीन दशकों से निर्मित एक राजनीतिक, संगठनात्मक और वैचारिक यात्रा की पुष्टि के रूप में सामने आए हैं। नगर निगमों से लेकर जिला पंचायतों और तालुका पंचायतों तक, भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से व्यापक और लगभग एकतरफा जीत दर्ज की है, वह राज्य की राजनीति के बदलते स्वरूप, मतदाताओं की प्राथमिकताओं और विपक्ष की कमजोरियों को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। यह परिणाम इस बात का संकेत भी है कि गुजरात में राजनीतिक स्थिरता, नेतृत्व पर भरोसा और विकास का नैरेटिव अभी भी निर्णायक भूमिका निभा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा की इस जीत की सबसे बड़ी विशेषता इसका व्यापक दायरा है। शहरी क्षेत्रों में जहां पार्टी ने लगभग क्लीन स्वीप किया, वहीं ग्रामीण इलाकों में भी उसका प्रभाव मजबूत बना रहा। 15 में से 15 नगर निगमों में जीत, हजारों सीटों पर कब्जा और जिला पंचायतों में लगभग पूर्ण वर्चस्व इस बात का प्रमाण है कि भाजपा ने केवल शहरों में ही नहीं, बल्कि गांवों तक अपनी पकड़ मजबूत की है। यह जीत किसी एक मुद्दे या लहर का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों से चल रही रणनीति, संगठनात्मक विस्तार और मतदाताओं के साथ निरंतर संपर्क का नतीजा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा की सफलता का सबसे बड़ा आधार उसका मजबूत संगठन और कार्यकर्ता तंत्र रहा है। पार्टी ने बूथ स्तर तक अपनी संरचना को मजबूत किया है, जिससे चुनाव के दौरान हर मतदाता तक पहुंच संभव हो पाई। कार्यकर्ताओं की सक्रियता, चुनावी प्रबंधन और स्थानीय स्तर पर मुद्दों को समझने की क्षमता ने भाजपा को अन्य दलों से आगे रखा। इसके साथ ही, पार्टी का नेतृत्व भी लगातार एक स्पष्ट संदेश देने में सफल रहा कि उसकी प्राथमिकता विकास, सुशासन और स्थिरता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विकास की राजनीति इस चुनाव में भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी। पिछले वर्षों में राज्य में हुए बुनियादी ढांचे के विकास, शहरी सुविधाओं में सुधार, जल आपूर्ति, सड़क निर्माण और डिजिटल सेवाओं के विस्तार ने मतदाताओं के बीच सकारात्मक प्रभाव छोड़ा। खासकर नगर निगम क्षेत्रों में, जहां नागरिक सीधे तौर पर इन सुविधाओं का अनुभव करते हैं, वहां भाजपा को भारी समर्थन मिला। मतदाताओं ने उन परियोजनाओं और योजनाओं को ध्यान में रखा, जिनका सीधा असर उनके दैनिक जीवन पर पड़ा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा, प्रधानमंत्री और राज्य नेतृत्व की छवि ने भी इस जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मतदाताओं के बीच यह धारणा मजबूत रही कि भाजपा के नेतृत्व में राज्य और देश दोनों स्तरों पर स्थिर और निर्णायक सरकार है। यह भरोसा चुनावी परिणामों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। “डबल इंजन सरकार” का नैरेटिव भी मतदाताओं को प्रभावित करने में सफल रहा, जिसमें केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय को विकास की गति से जोड़ा गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके विपरीत, विपक्ष की स्थिति इस चुनाव में बेहद कमजोर दिखाई दी। कांग्रेस, जो कभी गुजरात की प्रमुख राजनीतिक ताकत थी, अब सीमित क्षेत्रों तक सिमटती नजर आई। उसका वोट शेयर कई जगहों पर बना रहा, लेकिन वह इसे सीटों में बदलने में असफल रही। इसका मुख्य कारण संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व का अभाव और स्पष्ट रणनीति की कमी रहा। कांग्रेस स्थानीय स्तर पर मजबूत उम्मीदवार खड़े करने और प्रभावी चुनाव प्रचार करने में पिछड़ गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आम आदमी पार्टी के लिए यह चुनाव सबसे बड़ा झटका साबित हुआ। 2021 में सूरत जैसे शहर में उल्लेखनीय प्रदर्शन करने वाली पार्टी इस बार अपनी स्थिति बनाए रखने में पूरी तरह विफल रही। कई वार्डों में उसका पूरी तरह सफाया हो गया और वह दहाई के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच सकी। इसके पीछे कई कारण रहे, जिनमें सबसे प्रमुख संगठनात्मक ढांचे की कमजोरी और नेतृत्व में अस्थिरता रही। चुनाव से ठीक पहले पार्टी के प्रमुख नेताओं का दल बदलना भी उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मतदाताओं के बीच यह संदेश गया कि पार्टी अंदर से कमजोर है और उसका भविष्य अनिश्चित है। इससे उन मतदाताओं का भरोसा डगमगा गया, जो भाजपा के विकल्प के रूप में आप को देख रहे थे। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों की कमी और जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता के आरोपों ने भी पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया। भाजपा ने इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया और मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने में सफल रही कि आप केवल विरोध की राजनीति कर रही है, जबकि विकास के लिए ठोस प्रयास नहीं कर रही।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा की रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि उसने विपक्ष को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया। आक्रामक प्रचार, स्पष्ट संदेश और मजबूत संगठन के कारण विपक्ष अपनी जमीन बचाने में ही उलझा रहा। खासकर आप, जो पिछली बार की सीटें बचाने की कोशिश में लगी रही, नए क्षेत्रों में विस्तार नहीं कर पाई। इससे भाजपा को सीधा लाभ मिला।एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भाजपा ने समय के साथ अपने वोट शेयर को लगातार बढ़ाया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">1995 से शुरू हुई यात्रा में पार्टी ने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन हर बार वापसी कर अपनी स्थिति मजबूत की। 2001 और 2016 जैसे चुनावों में वोट शेयर में गिरावट के बावजूद पार्टी ने संगठन और रणनीति के दम पर फिर से बढ़त हासिल की। 2026 का चुनाव इस निरंतरता का चरम बिंदु माना जा सकता है, जहां पार्टी ने पिछले 30 वर्षों का सबसे बड़ा वोट शेयर हासिल किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस चुनाव ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि गुजरात की राजनीति में अब मुकाबला एकतरफा होता जा रहा है। जहां भाजपा लगातार अपनी पकड़ मजबूत कर रही है, वहीं विपक्ष अपनी जमीन खोता जा रहा है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए भी एक चुनौती है, क्योंकि मजबूत विपक्ष का होना आवश्यक माना जाता है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में विपक्ष को अपने संगठन, नेतृत्व और रणनीति पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भविष्य की दृष्टि से देखें तो यह चुनाव 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए एक संकेतक भी है। भाजपा के लिए यह जीत आत्मविश्वास बढ़ाने वाली है, जबकि विपक्ष के लिए चेतावनी है कि यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो आगे की राह और कठिन हो सकती है। मतदाताओं ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वे स्थिरता, विकास और मजबूत नेतृत्व को प्राथमिकता देते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः, गुजरात निकाय चुनाव 2026 के परिणाम केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रवृत्तियों का प्रतिबिंब हैं। यह चुनाव दिखाता है कि कैसे एक पार्टी ने तीन दशकों में अपने संगठन, नेतृत्व और नीतियों के दम पर मतदाताओं का विश्वास लगातार बनाए रखा। वहीं, यह भी दर्शाता है कि केवल विकल्प होना पर्याप्त नहीं, बल्कि उस विकल्प को मजबूत, विश्वसनीय और प्रभावी बनाना भी उतना ही जरूरी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 17:18:59 +0530</pubDate>
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                <title>कुपोषित बचपन, कमजोर भविष्य और समाधान की दिशा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश का भविष्य उसके बच्चे होते हैं, यह केवल भावनात्मक कथन नहीं बल्कि एक कठोर सामाजिक सत्य है। यदि यही भविष्य कुपोषण की गिरफ्त में हो, तो सशक्त राष्ट्र का सपना अधूरा ही रह जाता है। भारत में बाल कुपोषण आज एक गंभीर और बहुआयामी चुनौती के रूप में उभर रहा है। विभिन्न सरकारी और स्वतंत्र आंकड़ों के अनुसार देश के 34 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 34–35 लाख बच्चे कुपोषण से प्रभावित हैं, जिनमें करीब 50 प्रतिशत बच्चे गंभीर कुपोषण की श्रेणी में आते हैं। यह स्थिति केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177575/malnourished-childhood-weak-future-and-direction-of-solution"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/2021_11$2021111111391359315_0_news_medium_23.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश का भविष्य उसके बच्चे होते हैं, यह केवल भावनात्मक कथन नहीं बल्कि एक कठोर सामाजिक सत्य है। यदि यही भविष्य कुपोषण की गिरफ्त में हो, तो सशक्त राष्ट्र का सपना अधूरा ही रह जाता है। भारत में बाल कुपोषण आज एक गंभीर और बहुआयामी चुनौती के रूप में उभर रहा है। विभिन्न सरकारी और स्वतंत्र आंकड़ों के अनुसार देश के 34 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 34–35 लाख बच्चे कुपोषण से प्रभावित हैं, जिनमें करीब 50 प्रतिशत बच्चे गंभीर कुपोषण की श्रेणी में आते हैं। यह स्थिति केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश में हर वर्ष बाल दिवस जैसे आयोजनों पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय जैसी संस्थाएं सक्रिय हैं, फिर भी जमीनी स्तर पर अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देता। यह विरोधाभास सोचने पर मजबूर करता है कि संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद उनका समुचित उपयोग क्यों नहीं हो पा रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय मलेरिया, टीबी और अन्य संक्रामक रोगों पर अरबों रुपये खर्च करता है, जो आवश्यक भी है, परंतु बच्चों के पोषण जैसे मूलभूत मुद्दे पर उतनी ही गंभीरता और निरंतरता का अभाव स्पष्ट दिखता है। यदि देश के बच्चे ही शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होंगे, तो वे भविष्य में राष्ट्र निर्माण में प्रभावी भूमिका कैसे निभा पाएंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आंकड़े बताते हैं कि लगभग 18 लाख बच्चे गंभीर कुपोषण  से पीड़ित हैं, जबकि शेष 16 लाख बच्चे मध्यम कुपोषण की स्थिति में हैं। राज्यों के स्तर पर देखें तो महाराष्ट्र में लगभग 6 लाख कुपोषित बच्चे दर्ज किए गए हैं, जिनमें 4.5 लाख से अधिक गंभीर रूप से प्रभावित हैं; बिहार में करीब 5 लाख, गुजरात में लगभग 3.5 लाख, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, असम और तेलंगाना जैसे बड़े राज्यों में भी लाखों बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहां तक कि देश की राजधानी दिल्ली में भी करीब 2 लाख बच्चों का कुपोषित होना यह दर्शाता है कि समस्या केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि प्रबंधन और क्रियान्वयन की कमजोरी भी है। वैश्विक स्तर पर स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है, जब हम वैश्विक भूख सूचकांक की ओर देखते हैं, जहां 2021 में भारत 116 देशों में 101वें स्थान पर पहुंच गया, जबकि 2020 में यह 94वें स्थान पर था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसका सीधा अर्थ है कि स्थिति में सुधार के बजाय गिरावट आई है, और भारत अपने पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान से भी पीछे खड़ा है इसके पीछे भारत की 141 करोड़ की जनसंख्या भी हो सकती है। कुपोषण का प्रभाव केवल तत्काल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह बच्चों के शारीरिक विकास, मानसिक क्षमता और भविष्य की उत्पादकता पर भी गहरा असर डालता है। आंकड़ों के अनुसार लगभग 34 प्रतिशत कुपोषित बच्चों का कद औसत से कम रह जाता है जबकि करीब 21 प्रतिशत बच्चों का वजन अत्यंत कम हो जाता है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे बच्चे बड़े होकर भी कई बीमारियों के प्रति संवेदनशील रहते हैं और उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है, जिससे देश की समग्र उत्पादकता और विकास दर पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। कोविड-19 महामारी ने इस समस्या को और गहरा कर दिया है, क्योंकि लॉकडाउन और आर्थिक संकट के कारण लाखों परिवारों की आय प्रभावित हुई, जिससे बच्चों के पोषण स्तर में गिरावट आई। आंगनबाड़ी सेवाओं, मिड-डे मील योजनाओं और अन्य पोषण कार्यक्रमों के बाधित होने से स्थिति और विकट हुई। यह समय है कि सरकारें और समाज दोनों मिलकर इस चुनौती का समाधान खोजें। केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन, निगरानी और पारदर्शिता पर विशेष ध्यान देना होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आंगनबाड़ी केंद्रों को सशक्त बनाना, पोषण ट्रैकर जैसी तकनीकों का सही उपयोग करना, मातृ शिक्षा और जागरूकता बढ़ाना, स्वच्छता और सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना, और सबसे महत्वपूर्ण गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करना,ये सभी कदम मिलकर ही कुपोषण के खिलाफ प्रभावी लड़ाई लड़ सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस दिशा में समन्वित प्रयासों पर जोर देता है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता और पोषण को एक साथ जोड़कर देखा जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं बल्कि समाज के हर वर्ग की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह इस दिशा में योगदान दे। यदि आज हम अपने बच्चों को स्वस्थ और पोषित नहीं बना पाए, तो आने वाला कल कमजोर और असंतुलित होगा। इसलिए आवश्यक है कि कुपोषण को एक राष्ट्रीय आपात समस्या के रूप में लिया जाए और मिशन मोड में ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि देश का भविष्य सुरक्षित, सशक्त और समृद्ध बन सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 17:14:54 +0530</pubDate>
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                <title>बदलाव के इस दौर में भारत ने सिर्फ समझौता नहीं, संबंध रचे</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक अर्थव्यवस्था के बदलते प्रवाह के बीच </span>27 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को नई दिल्ली के भारत मंडपम में वह ऐतिहासिक क्षण दर्ज हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब भारत–न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते </span><span lang="en-in" xml:lang="en-in">(</span><span lang="hi" xml:lang="hi">एफटीए)</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने एक नए युग का संकेत दिया। यह केवल औपचारिक करार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारत की संतुलित शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रणनीतिक परिपक्वता और दूरदर्शी नेतृत्व का सशक्त प्रमाण है। इस समझौते से भारतीय निर्यात की सभी </span>8,284 <span lang="hi" xml:lang="hi">टैरिफ लाइनों पर </span>100% <span lang="hi" xml:lang="hi">शुल्क-मुक्त पहुंच मिलने से अभूतपूर्व अवसर खुले हैं। वहीं न्यूजीलैंड के लगभग </span>95% <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्यात मूल्य पर शुल्क में कमी या समाप्ति की राह भी बनी है। यह वही क्षण है</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177573/in-this-era-of-change-india-created-relationships-not-just"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/download3.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक अर्थव्यवस्था के बदलते प्रवाह के बीच </span>27 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को नई दिल्ली के भारत मंडपम में वह ऐतिहासिक क्षण दर्ज हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब भारत–न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते </span><span lang="en-in" xml:lang="en-in">(</span><span lang="hi" xml:lang="hi">एफटीए)</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने एक नए युग का संकेत दिया। यह केवल औपचारिक करार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारत की संतुलित शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रणनीतिक परिपक्वता और दूरदर्शी नेतृत्व का सशक्त प्रमाण है। इस समझौते से भारतीय निर्यात की सभी </span>8,284 <span lang="hi" xml:lang="hi">टैरिफ लाइनों पर </span>100% <span lang="hi" xml:lang="hi">शुल्क-मुक्त पहुंच मिलने से अभूतपूर्व अवसर खुले हैं। वहीं न्यूजीलैंड के लगभग </span>95% <span lang="hi" xml:lang="hi">निर्यात मूल्य पर शुल्क में कमी या समाप्ति की राह भी बनी है। यह वही क्षण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां तीव्र गति से बढ़ते अवसर और सजग संरक्षण की समझ साथ-साथ आगे बढ़ रही है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">परिवर्तन की तेज़ रफ्तार के बीच यह समझौता भारत की औद्योगिक धड़कनों में नई शक्ति का संचार करता दिखाई देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां उत्पादन आधारित क्षेत्र इसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरते हैं। टेक्सटाइल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिधान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चमड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जूता और इंजीनियरिंग उत्पाद अब शून्य शुल्क के साथ न्यूजीलैंड के बाजार में प्रवेश करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त कई गुना सशक्त होगी। पहले जो औसत </span>2.2 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत शुल्क एक अदृश्य अवरोध की तरह सामने आता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अब पूरी तरह समाप्त हो चुका है। सूक्ष्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लघु और मध्यम उद्यमों तथा महिला-नेतृत्व वाले व्यवसायों के लिए यह बदलाव केवल अवसर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि एक नए युग का संकेत है। अनुमानित </span>20 <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलियन डॉलर का निवेश आने वाले वर्षों में रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नवाचार और तकनीकी </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रगति को नई गति दे सकता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूरियों को अवसर में बदलती यह पहल व्यापार की सीमाओं से आगे बढ़कर मानव संसाधन के वैश्विक विस्तार को नई दिशा देती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूजीलैंड द्वारा </span>5000 <span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय पेशेवरों के लिए विशेष वीजा कोटा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तथा</span> 1000 <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्य-अवकाश वीजा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि भारतीय कौशल अब विश्व की प्रमुख आवश्यकता बन चुका है। सूचना प्रौद्योगिकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य सेवा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभियंत्रण और शिक्षा जैसे क्षेत्रों के युवा तीन वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय कार्यानुभव अर्जित कर सकेंगे। विज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रौद्योगिकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभियंत्रण तथा गणित (स्टेम</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">के विद्यार्थियों के लिए सरल कार्य-अधिकार इस सहयोग को और मजबूत बनाते हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह पहल केवल रोजगार का अवसर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारतीय युवाओं के आत्मविश्वास को वैश्विक पहचान में बदलने का सशक्त माध्यम है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संतुलित नीतिगत सूझबूझ का सबसे सशक्त प्रतिबिंब</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस समझौते में कृषि क्षेत्र के प्रति बरती गई संवेदनशीलता में दिखाई देता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डेयरी उत्पादों (दूध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दही आदि)</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चीनी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्याज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चना और अन्य प्रमुख संवेदनशील कृषि वस्तुओं को बाहर रखते हुए</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि किसानों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। न्यूजीलैंड के मजबूत डेयरी उद्योग से संभावित चुनौती को दूरदर्शिता से टाला गया है। इसके बदले</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हॉर्टिकल्चर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कीवी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेब और शहद</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग और कोटा-आधारित रियायतों का रास्ता चुना गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे भारतीय कृषि को नई तकनीक और उत्पादकता का लाभ मिलेगा। यह दर्शाता है कि उदारीकरण तभी सार्थक होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब उसके साथ संरक्षण का विवेकपूर्ण संतुलन जुड़ा हो।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">संरचना की व्यापकता और दृष्टि की गहराई में यह समझौता आधुनिक आर्थिक साझेदारी का सशक्त प्रतिमान बनकर उभरता है। </span>20 <span lang="hi" xml:lang="hi">अध्यायों में विन्यस्त यह ढांचा मूल नियमों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीमा शुल्क प्रक्रियाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वच्छता एवं पादप-स्वच्छता मानकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीकी अवरोधों और विवाद निवारण जैसी जटिल व्यवस्थाओं को सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्पष्ट और पारदर्शी स्वरूप देता है। सूक्ष्म</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लघु और मध्यम उद्यमों को विशेष प्राथमिकता देकर उन्हें वैश्विक मूल्य श्रृंखला से जोड़ने का ठोस मार्ग तैयार किया गया है। कृषि प्रौद्योगिकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लॉजिस्टिक्स और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रों में संभावित </span>20 <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलियन डॉलर का निवेश भारत को एक उभरते वैश्विक खाद्य केंद्र के रूप में स्थापित कर सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां केवल उत्पादन ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि मूल्य संवर्धन भी प्रमुख आधार बनेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सफलता की असली कसौटी कागज़ी समझौतों में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनके ठोस क्रियान्वयन में परिलक्षित होती है। अपेक्षित है कि संसदीय अनुमोदन के बाद यह समझौता </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">के अंत तक प्रभावी हो जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु इसके वास्तविक लाभ तभी सामने आएंगे जब भारत अपनी लॉजिस्टिक्स व्यवस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुणवत्ता मानकों और वैश्विक विपणन रणनीतियों को सुदृढ़ बनाएगा। तकनीकी हस्तांतरण और कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों और उद्योगों तक ठोस लाभ पहुंचाना अनिवार्य होगा। वैश्विक व्यापार की तीव्र प्रतिस्पर्धा और अनिश्चितताओं के बीच यह समझौता भारत को स्थिरता और विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों का सशक्त आधार प्रदान कर सकता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह समझौता भारत की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परिपक्व आर्थिक सोच</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का द्योतक है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> अब भारत केवल बाजार खोलने वाला निष्क्रिय राष्ट्र नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपने हितों को केंद्र में रखकर शर्तों को गढ़ने और दिशा देने वाला आत्मविश्वासी तथा निर्णायक सहभागी बन चुका है। सूचना प्रौद्योगिकी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वस्त्र और अन्य निर्यात क्षेत्रों को मिला </span>20 <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलियन डॉलर का प्रोत्साहन</span>, 5000 <span lang="hi" xml:lang="hi">पेशेवरों के लिए विशेष अवसर और द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य इस परिवर्तन की स्पष्ट और प्रभावशाली अभिव्यक्ति हैं। साथ ही किसानों की सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए यह मॉडल समावेशी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संतुलित और टिकाऊ विकास की दिशा में एक सुदृढ़ कदम सिद्ध होता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यहीं से एक नए आर्थिक अध्याय की असली तस्वीर उभरती है—यह मुक्त व्यापार समझौता भारत की दूरदर्शिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आत्मविश्वास और संतुलित नीति-निर्माण की परिपक्वता का तीव्र और प्रभावशाली प्रमाण बनकर सामने आता है। यदि इसका क्रियान्वयन दृढ़ संकल्प</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सटीक रणनीति और अटूट प्रतिबद्धता के साथ किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह केवल व्यापारिक विस्तार तक सीमित नहीं रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भारत को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक निर्णायक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वसनीय और प्रभावकारी शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है। यह वह क्षण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां भारत अवसरों का उपभोग करने भर तक सीमित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उन्हें अपने पक्ष में मोड़ते हुए भविष्य की दिशा को स्वयं आकार देने वाला सक्रिय शिल्पकार बन चुका है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 17:07:14 +0530</pubDate>
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