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                <title>संपादकीय - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>करोड़ों की ठगी, करोड़ों का खर्च और फिर भी नाकाफी रिकवरी; डिजिटल युग की सबसे बड़ी चुनौती बनता साइबर अपराध*</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div>डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहां तकनीक ने लोगों का जीवन आसान बनाया है, वहीं साइबर अपराधियों ने भी इसी तकनीक को अपने अवैध कारोबार का सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, यूपीआई, सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग ने आम नागरिकों की सुविधाएं तो बढ़ाई हैं, लेकिन इसके साथ ही साइबर ठगी के मामलों में भी विस्फोटक वृद्धि देखने को मिल रही है। राजस्थान से सामने आए हालिया आंकड़े इस खतरे की गंभीरता को उजागर करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट और नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181068/fraud-worth-crores-expenditure-of-crores-and-still-inadequate-recovery"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/41.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div>डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहां तकनीक ने लोगों का जीवन आसान बनाया है, वहीं साइबर अपराधियों ने भी इसी तकनीक को अपने अवैध कारोबार का सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, यूपीआई, सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग ने आम नागरिकों की सुविधाएं तो बढ़ाई हैं, लेकिन इसके साथ ही साइबर ठगी के मामलों में भी विस्फोटक वृद्धि देखने को मिल रही है। राजस्थान से सामने आए हालिया आंकड़े इस खतरे की गंभीरता को उजागर करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट और नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार पिछले एक वर्ष में राजस्थान में 77 हजार से अधिक लोग साइबर ठगी का शिकार हुए और ठगों ने लगभग 354 करोड़ रुपए की रकम हड़प ली। चिंताजनक बात यह है कि इस भारी-भरकम ठगी में से केवल 39 करोड़ रुपए ही रिकवर किए जा सके हैं, जबकि साइबर सुरक्षा और साइबर थानों के संचालन पर राज्य सरकार का सालाना खर्च 102 करोड़ रुपए से अधिक है।</div>
<div>यह स्थिति केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है। देश के लगभग सभी राज्यों में साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच जितनी तेजी से बढ़ी है, उससे कहीं अधिक तेजी से साइबर अपराधियों के तौर-तरीके विकसित हुए हैं। आज अपराधी किसी बैंक डकैती या चोरी के बजाय मोबाइल फोन और लैपटॉप के जरिए हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों को निशाना बना रहे हैं। वे नकली निवेश योजनाओं, फर्जी कस्टमर केयर, ऑनलाइन शॉपिंग, डिजिटल अरेस्ट, लॉटरी, नौकरी, टास्क फ्रॉड और क्यूआर कोड स्कैनिंग जैसे अनेक तरीकों से लोगों को जाल में फंसा रहे हैं।</div>
<div>राजस्थान के आंकड़े बताते हैं कि हर घंटे लगभग दस लोग साइबर ठगी का शिकार हो रहे हैं। यह केवल आंकड़ा नहीं बल्कि समाज के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती है। इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है जिन्होंने वर्षों की मेहनत से अपनी बचत जमा की थी। कई मामलों में लोगों की जीवनभर की कमाई कुछ ही मिनटों में उनके खातों से गायब हो गई। पीड़ितों में युवा, व्यापारी, नौकरीपेशा वर्ग, महिलाएं और बुजुर्ग सभी शामिल हैं। विशेष रूप से 25 से 40 वर्ष आयु वर्ग के लोग सबसे अधिक निशाना बन रहे हैं, क्योंकि यही वर्ग डिजिटल सेवाओं का सबसे ज्यादा उपयोग करता है।</div>
<div>साइबर अपराध का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अपराधी लगातार नए-नए तरीके अपनाते रहते हैं। जैसे ही पुलिस और बैंकिंग संस्थाएं किसी एक तरीके पर नियंत्रण करने का प्रयास करती हैं, ठग कोई नया तरीका खोज लेते हैं। हाल के वर्षों में डिजिटल अरेस्ट, इन्वेस्टमेंट फ्रॉड और फर्जी शेयर मार्केट निवेश योजनाओं के जरिए करोड़ों रुपए की ठगी सामने आई है। अपराधी स्वयं को पुलिस अधिकारी, सीबीआई अधिकारी, बैंक कर्मचारी या सरकारी एजेंसी का प्रतिनिधि बताकर लोगों को डराते हैं और फिर उनसे रकम ट्रांसफर करा लेते हैं।</div>
<div>सवाल यह भी उठता है कि जब साइबर थानों और साइबर सुरक्षा तंत्र पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, तब रिकवरी की दर इतनी कम क्यों है। राजस्थान में 354 करोड़ रुपए की ठगी के मुकाबले केवल 39 करोड़ रुपए की रिकवरी होना व्यवस्था की सीमाओं को दर्शाता है। इसका एक कारण यह है कि ठग रकम को तुरंत कई फर्जी खातों में ट्रांसफर कर देते हैं। इन खातों को म्यूल अकाउंट कहा जाता है। रकम कई राज्यों और कई बार विदेशों तक पहुंच जाती है, जिससे उसे ट्रेस करना और वापस लाना बेहद कठिन हो जाता है। इसके अलावा साइबर अपराधों की जांच में तकनीकी विशेषज्ञता, आधुनिक उपकरण और अंतरराज्यीय समन्वय की आवश्यकता होती है, जिसकी कमी कई बार जांच को प्रभावित करती है।</div>
<div>बैंकों की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक प्रभावित ग्राहकों में सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े बैंक शामिल हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि बैंक सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, लेकिन यह जरूर दर्शाता है कि ग्राहकों को जागरूक बनाने और संदिग्ध लेनदेन पर त्वरित कार्रवाई की दिशा में अभी और प्रयासों की आवश्यकता है। बैंकिंग प्रणाली में सुरक्षा के अनेक स्तर मौजूद हैं, फिर भी यदि ग्राहक स्वयं सतर्क नहीं रहेगा तो अपराधी किसी न किसी तरीके से उसे भ्रमित कर सकते हैं।</div>
<div>आज साइबर सुरक्षा केवल पुलिस या बैंक की जिम्मेदारी नहीं रह गई है। यह प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी बन चुकी है। अधिकांश मामलों में ठग लोगों की तकनीकी कमजोरी का नहीं बल्कि उनकी भावनाओं, लालच, डर या जल्दबाजी का फायदा उठाते हैं। कोई व्यक्ति यदि अनजान लिंक पर क्लिक करता है, ओटीपी साझा करता है, स्क्रीन शेयरिंग एप डाउनलोड करता है या फर्जी निवेश योजना में अधिक मुनाफे के लालच में पैसा लगाता है, तो वह स्वयं जोखिम बढ़ा देता है। इसलिए जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है।</div>
<div>सरकार और पुलिस प्रशासन भी लगातार लोगों को जागरूक करने के प्रयास कर रहे हैं। साइबर हेल्पलाइन 1930 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर ठगी होने के बाद पहला एक घंटा सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि पीड़ित तुरंत हेल्पलाइन या साइबर पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराए तो रकम को फ्रीज कराने और रिकवरी की संभावना काफी बढ़ जाती है। दुर्भाग्यवश कई लोग शर्म, घबराहट या जानकारी के अभाव में शिकायत करने में देर कर देते हैं, जिससे अपराधियों को रकम निकालने का पर्याप्त समय मिल जाता है।</div>
<div>देश में डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से विस्तार कर रही है। सरकार कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा दे रही है और करोड़ों लोग रोजाना ऑनलाइन भुगतान कर रहे हैं। ऐसे में साइबर सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता का विषय बनाना होगा। केवल नए साइबर थाने खोलना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित मानव संसाधन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणाली और बैंकिंग संस्थाओं के साथ बेहतर समन्वय भी जरूरी होगा। साथ ही स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने होंगे ताकि लोग साइबर अपराधियों के जाल में फंसने से बच सकें।</div>
<div>वर्तमान समय में साइबर अपराध किसी महामारी से कम नहीं है। यह अपराध बिना हथियार, बिना हिंसा और बिना किसी भौतिक उपस्थिति के लोगों को आर्थिक रूप से तबाह कर रहा है। राजस्थान के आंकड़े इस बात की चेतावनी हैं कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, पुलिस, बैंक, तकनीकी संस्थाएं और आम नागरिक मिलकर इस चुनौती का सामना करें। डिजिटल क्रांति तभी सफल मानी जाएगी जब लोगों का धन और उनका विश्वास दोनों सुरक्षित रहेंगे। अन्यथा साइबर ठगों का यह बढ़ता साम्राज्य आम जनता की मेहनत की कमाई को इसी तरह निगलता रहेगा और सुरक्षा तंत्र पर सवाल लगातार खड़े होते रहेंगे।</div>
<div>          *कांतिलाल मांडोत*</div>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:31:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>गृहिणियों को राष्ट्र निर्माता मानकर सुप्रीम कोर्ट ने रचा सामाजिक न्याय का नया अध्याय</title>
                                    <description><![CDATA[<div>भारतीय समाज में गृहिणी का स्थान हमेशा से परिवार की धुरी के रूप में रहा है। वह घर की व्यवस्था संभालती है बच्चों का पालन-पोषण करती है बुजुर्गों की देखभाल करती है और परिवार को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करती है। इसके बावजूद उसके श्रम को लंबे समय तक आर्थिक मूल्यांकन से बाहर रखा गया। घर के भीतर किए जाने वाले अनगिनत कार्यों को कर्तव्य और जिम्मेदारी का नाम देकर उनकी वास्तविक कीमत को नजरअंदाज किया जाता रहा। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक चेतना को नई दिशा देने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181065/supreme-court-created-a-new-chapter-of-social-justice-by"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/4.jpg" alt=""></a><br /><div>भारतीय समाज में गृहिणी का स्थान हमेशा से परिवार की धुरी के रूप में रहा है। वह घर की व्यवस्था संभालती है बच्चों का पालन-पोषण करती है बुजुर्गों की देखभाल करती है और परिवार को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करती है। इसके बावजूद उसके श्रम को लंबे समय तक आर्थिक मूल्यांकन से बाहर रखा गया। घर के भीतर किए जाने वाले अनगिनत कार्यों को कर्तव्य और जिम्मेदारी का नाम देकर उनकी वास्तविक कीमत को नजरअंदाज किया जाता रहा। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक चेतना को नई दिशा देने वाला भी है। सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाली गृहिणियों के मुआवजे को लेकर सर्वोच्च अदालत ने जो मानक निर्धारित किया है वह महिलाओं के सम्मान और न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता दोनों का प्रतीक है।</div>
<div>अदृश्य श्रम को मिली प्रतिष्ठा</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा है कि गृहिणियों के काम का मूल्य कम से कम 30 हजार रुपए प्रतिमाह माना जाना चाहिए और इसी आधार पर मुआवजे की गणना की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी माना कि गृहिणियां केवल परिवार का हिस्सा नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति हैं। यह टिप्पणी अपने आप में ऐतिहासिक है क्योंकि पहली बार इतने स्पष्ट और प्रभावशाली शब्दों में गृहिणियों की भूमिका को राष्ट्रीय विकास से जोड़ा गया है।</div>
<div> </div>
<div>दरअसल किसी भी समाज की प्रगति का आधार मजबूत परिवार होता है और मजबूत परिवार का आधार अक्सर एक समर्पित महिला होती है। वह बिना किसी वेतन और अवकाश के चौबीसों घंटे कार्य करती है। उसकी मेहनत का कोई हिसाब नहीं रखा जाता और उसके योगदान को आर्थिक आंकड़ों में नहीं मापा जाता। सुप्रीम कोर्ट ने इस वास्तविकता को स्वीकार कर महिलाओं के अदृश्य श्रम को वह सम्मान दिया है जिसकी मांग लंबे समय से की जा रही थी।</div>
<div> </div>
<div>पुरानी सोच को बदलने वाला निर्णय है।अब तक सड़क दुर्घटना मामलों में गृहिणियों की आय का अनुमान अक्सर कुशल मजदूर की मजदूरी के आधार पर लगाया जाता था। यह व्यवस्था न केवल अव्यावहारिक थी बल्कि महिलाओं के योगदान को कम करके आंकने वाली भी थी। अदालत ने इस सोच को खारिज करते हुए कहा कि घरेलू कार्यों को सामान्य मजदूरी के पैमाने पर नहीं तौला जा सकता</div>
<div> </div>
<div>यह निर्णय इस बात की स्वीकारोक्ति है कि घर संभालना एक पूर्णकालिक और बहुआयामी जिम्मेदारी है। गृहिणी एक साथ प्रबंधक शिक्षक मार्गदर्शक परिचारिका और परिवार की भावनात्मक शक्ति के रूप में कार्य करती है। इसलिए उसके योगदान की तुलना किसी एक पेशे या मजदूरी से नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने इसी व्यापक दृष्टिकोण को अपनाकर न्याय की नई परिभाषा प्रस्तुत की है।</div>
<div> </div>
<div>महिला सम्मान की दिशा में बड़ा कदम कहा जा सकता है।</div>
<div>यह फैसला केवल मुआवजे की राशि बढ़ाने का मामला नहीं है बल्कि महिलाओं के सम्मान को कानूनी मान्यता देने का प्रयास भी है। भारतीय समाज में आज भी अनेक महिलाएं अपने कार्यों के लिए सामाजिक सराहना तो पाती हैं लेकिन आर्थिक पहचान नहीं मिलती। अदालत ने इस स्थिति को बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।</div>
<div> </div>
<div>जब देश की सर्वोच्च अदालत किसी गृहिणी को राष्ट्र निर्माता कहती है तब यह संदेश केवल न्यायालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे समाज तक पहुंचता है। इससे महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना मजबूत होती है और यह स्वीकार किया जाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल कार्यालयों और उद्योगों में नहीं बल्कि घरों के भीतर भी होता है।</div>
<div> </div>
<div>न्याय प्रणाली का  संवेदनशील उदाहरण है और इस फैसले की सबसे बड़ी विशेषता न्यायपालिका की संवेदनशीलता है। अदालत ने कहा कि मुआवजा तय करते समय केवल महिला की आय को आधार नहीं बनाया जा सकता। उसकी उम्र शिक्षा कौशल पारिवारिक जिम्मेदारियां और आर्थिक परिस्थितियां भी ध्यान में रखी जानी चाहिए। यह दृष्टिकोण बताता है कि न्यायालय जीवन की वास्तविकताओं को समझते हुए निर्णय दे रहा है</div>
<div> </div>
<div>कई बार दुर्घटना में गृहिणी की मृत्यु के बाद परिवार केवल एक सदस्य को नहीं खोता बल्कि पूरे परिवार की व्यवस्था प्रभावित हो जाती है। बच्चों का भविष्य बुजुर्गों की देखभाल और घर की स्थिरता पर गहरा असर पड़ता है। अदालत ने इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए भावनात्मक और पारिवारिक क्षति को भी मुआवजे का हिस्सा माना है। यह न्याय की मानवीय और व्यावहारिक व्याख्या है।</div>
<div> </div>
<div>त्वरित न्याय के प्रति प्रतिबद्धता</div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने केवल मुआवजे की गणना का नया आधार निर्धारित नहीं किया बल्कि न्याय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि ऐसे मामलों की निगरानी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश स्वयं करें और दावों का निपटारा एक वर्ष के भीतर किया जाए।</div>
<div> </div>
<div>भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबित मामलों की समस्या लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। दुर्घटना पीड़ित परिवार अक्सर वर्षों तक मुआवजे की प्रतीक्षा करते रहते हैं। ऐसे में अदालत का यह निर्देश न्याय को समयबद्ध और पीड़ित केंद्रित बनाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि सर्वोच्च न्यायालय केवल सिद्धांतों की बात नहीं कर रहा बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन को भी सुनिश्चित करना चाहता है</div>
<div>न्यायपालिका की प्रगतिशील सोच</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्यायपालिका की प्रगतिशील और दूरदर्शी सोच का परिचायक है। अदालत ने यह समझा कि बदलते समय में महिलाओं की भूमिका को पुराने मानकों से नहीं आंका जा सकता। आज महिलाओं का योगदान केवल आर्थिक कमाई तक सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक और पारिवारिक संरचना को मजबूत बनाने में भी उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।</div>
<div> </div>
<div>इस निर्णय ने यह संदेश दिया है कि किसी व्यक्ति का मूल्य केवल उसकी वेतन पर्ची से नहीं तय किया जा सकता। समाज के लिए किए गए उसके योगदान को भी समान महत्व मिलना चाहिए। गृहिणियों के मामले में यह संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि उनका अधिकांश श्रम घर की चारदीवारी के भीतर ही रह जाता है।</div>
<div>सामाजिक बदलाव की नई शुरुआत शुरू हो चुका है।</div>
<div> </div>
<div>यह फैसला भविष्य में व्यापक सामाजिक बदलाव का आधार बन सकता है। इससे महिलाओं के घरेलू कार्यों के आर्थिक महत्व पर नई चर्चा शुरू होगी। नीति निर्माण के स्तर पर भी घरेलू श्रम को लेकर गंभीर विचार हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे करोड़ों गृहिणियों को यह एहसास होगा कि उनके कार्यों को देश की सर्वोच्च अदालत ने सम्मान और मान्यता दी है</div>
<div> </div>
<div>समाज में लंबे समय से यह धारणा रही है कि घर का काम स्वाभाविक जिम्मेदारी है और उसका कोई आर्थिक मूल्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस धारणा को चुनौती देते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि घरेलू श्रम भी उतना ही मूल्यवान है जितना किसी अन्य पेशे में किया जाने वाला कार्य। यह विचार महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में सहायक होगा</div>
<div> </div>
<div>न्याय और सम्मान का ऐतिहासिक संगम देखने को मिला है।सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसने गृहिणियों के अदृश्य श्रम को पहचान दी है महिलाओं के सम्मान को नई ऊंचाई प्रदान की है और दुर्घटना पीड़ित परिवारों को अधिक न्यायपूर्ण राहत सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त किया है</div>
<div> </div>
<div>यह फैसला बताता है कि न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक शक्ति भी है। महिलाओं को राष्ट्र निर्माता का दर्जा देकर सर्वोच्च अदालत ने न्याय और संवेदनशीलता का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। यह निर्णय आने वाले वर्षों में महिला सम्मान सामाजिक न्याय और मानवीय न्यायशास्त्र के एक आदर्श उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा। भारत की न्याय प्रणाली ने इस फैसले के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया है कि सच्चा न्याय वही है जो समाज के सबसे अनदेखे और उपेक्षित योगदान को भी सम्मानपूर्वक पहचान दे सके।</div>
<div>     <strong>   *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:01:28 +0530</pubDate>
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                <title>परमाणु शक्ति संपन्न भारत में कब होगी बालिका शिक्षा शत-प्रतिशत।</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181062/when-will-girls-education-be-100-in-nuclear-power-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/4.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञान परंपराओं वाला देश रहा है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालयों ने विश्व को शिक्षा का प्रकाश दिया। वैदिक काल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना था।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं ने सिद्ध किया था कि भारतीय संस्कृति में नारी शिक्षा का गौरवशाली इतिहास रहा है। किंतु मध्यकालीन सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव से बालिका शिक्षा पिछड़ती चली गई। 1835 में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू की। इसका उद्देश्य भारतीय समाज में ऐसे कर्मचारियों का वर्ग तैयार करना था जो अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक कार्यों को संचालित कर सके। आधुनिक विज्ञान और अंग्रेजी भाषा के प्रसार में इस शिक्षा प्रणाली का योगदान रहा, किंतु इसने भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक शिक्षा और कौशल आधारित शिक्षण को काफी हद तक हाशिए पर पहुंचा दिया। उस समय महिलाओं की शिक्षा लगभग नगण्य थी। समाज में बाल विवाह, पर्दा प्रथा और लैंगिक असमानता जैसी कुरीतियां लड़कियों की शिक्षा में बड़ी बाधा थीं।<br />समाज सुधारकों का योगदान</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">+<br />ऐसे कठिन समय में सावित्रीबाई फुले और महात्मा ज्योतिराव फुले ने बालिका शिक्षा की अलख जगाई। 1848 में उन्होंने लड़कियों के लिए पहला आधुनिक विद्यालय प्रारंभ किया।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने महिला शिक्षा और सामाजिक सुधारों को नई दिशा दी। बाद में महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर तथा स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना।<br />डॉ. अंबेडकर का प्रसिद्ध संदेश</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।"<br />स्वतंत्र भारत में शिक्षा का विकास</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की साक्षरता दर लगभग 18 प्रतिशत थी। महिलाओं की साक्षरता तो 10 प्रतिशत से भी कम थी। संविधान निर्माताओं ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार माना।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />समय-समय पर कोठारी आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968, 1986, सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 तथा नई शिक्षा नीति 2020 जैसे प्रयास किए गए। इन प्रयासों से शिक्षा का दायरा बढ़ा और लड़कियों की विद्यालयों तक पहुंच बेहतर हुई।.आज भारत की साक्षरता दर 77 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुकी है, जबकि महिला साक्षरता दर 70 प्रतिशत से अधिक है। यह प्रगति उत्साहजनक है, किंतु अभी भी पुरुषों और महिलाओं की साक्षरता में अंतर बना हुआ है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व के सर्वाधिक शिक्षित देशों से सीख<br />विश्व में फिनलैंड, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जापान और नॉर्वे जैसे देशों की शिक्षा व्यवस्था विश्व में आदर्श मानी जाती है। फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />फिनलैंड में शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन कौशल विकसित करना है। वहां बच्चों पर अनावश्यक परीक्षा का दबाव नहीं होता। शिक्षकों को अत्यंत सम्मान और स्वायत्तता प्राप्त है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br /></div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"> बालिका और बालक के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता। सिंगापुर ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा साधन बनाया। वहां विज्ञान, गणित, तकनीक और कौशल आधारित शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता है। शिक्षा को उद्योगों और रोजगार से जोड़ा गया है।<br />जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में अनुशासन, नैतिकता, समयबद्धता और तकनीकी दक्षता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। परिणामस्वरूप ये देश सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद आर्थिक महाशक्ति बन गए।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;">भारत में प्रतिभा की कोई कमी कभी भी नहीं रही है, किंतु शिक्षा व्यवस्था अभी भी परीक्षा-केंद्रित बनी हुई है। रटंत प्रणाली, विद्यालयों की असमान गुणवत्ता, शिक्षकों की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों का अभाव आज भी चुनौतियां हैं।नई शिक्षा नीति 2020 ने इन समस्याओं के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसमें मातृभाषा आधारित शिक्षा, कौशल विकास, डिजिटल शिक्षण और बहुविषयक अध्ययन पर बल दिया गया है। किंतु इसके वास्तविक लाभ तभी मिलेंगे जब इसका प्रभावी क्रियान्वयन हो। बालिका शिक्षा का सत प्रतिशत होना इसलिए भी आवश्यक है कि शिक्षित बेटी, समृद्ध परिवार</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />एक शिक्षित महिला अपने परिवार को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कार प्रदान करती है। वह अगली पीढ़ी की प्रथम शिक्षिका होती है।सामाजिक कुरीतियों का अंत भी।बाल विवाह, दहेज प्रथा, लैंगिक भेदभाव और घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं को समाप्त करने में शिक्षा सबसे प्रभावी साधन है</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />विश्व बैंक सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का मानना है कि महिलाओं की शिक्षा में निवेश किसी भी देश के आर्थिक विकास को तीव्र गति देता है। यदि भारत की प्रत्येक बेटी शिक्षित होगी तो देश की उत्पादकता और आर्थिक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />शिक्षित महिलाएं स्वास्थ्य, पोषण और परिवार नियोजन के प्रति अधिक जागरूक होती हैं। इससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी आती है।<br />आज महिलाएं विज्ञान, अंतरिक्ष, प्रशासन, राजनीति, सेना और उद्यमिता के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। शिक्षा उन्हें नेतृत्व और नवाचार की शक्ति प्रदान करती है।</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />महापुरुषों की दृष्टि में नारी शिक्षा<br />स्वामी विवेकानंद ने कहा</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />"राष्ट्र की प्रगति का सबसे अच्छा मापदंड वहां की महिलाओं की स्थिति है।"डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का मत था कि<br />"महिलाओं का सशक्तिकरण और शिक्षा किसी राष्ट्र के विकास का सबसे प्रभावी माध्यम है।"पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था<br />"एक महिला को शिक्षित करना एक पीढ़ी को शिक्षित करना है।"</div><div dir="ltr" style="text-align:justify;"><br />इक्कीसवीं सदी ज्ञान, विज्ञान और नवाचार की सदी है। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब देश की प्रत्येक बेटी शिक्षित, आत्मनिर्भर और सशक्त बनेगी। शिक्षा केवल विद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं है; यह सामाजिक चेतना, आर्थिक समृद्धि और राष्ट्रीय विकास का आधार है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली से लेकर नई शिक्षा नीति तक भारत ने लंबी यात्रा तय की है, किंतु अभी मंजिल दूर है। यदि सरकार, समाज, परिवार और शैक्षणिक संस्थान मिलकर बालिका शिक्षा को शत-प्रतिशत अनिवार्य बनाने का संकल्प लें, तो भारत न केवल विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति बनेगा, बल्कि सबसे विकसित और ज्ञानवान राष्ट्रों की अग्रिम पंक्ति में भी खड़ा होगा।<br />क्योंकि किसी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों में नहीं, बल्कि उसकी शिक्षित बेटियों की आंखों में स्वप्न बनकर पलता है।<br /><br />संजीव ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिंतक, स्तंभकार, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,<div>कविता,</div><div>संजीव-नी।<br />शिक्षा का कवच।<br /><br />शिक्षा का कवच।<br />कुछ देना ही तो आइये,<br />नन्हीं बालिकाओं को<br />स्वर्ण के गहने नहीं,<br />शिक्षा का कवच दें।<br />उनकी हथेलियों में<br />रोटी के साथ-साथ<br />कुछ अक्षर भी रख दें,<br />जो भूख से जुझतीं<br />उन्हें ज्ञान की कुंजी दें<br />अँधेरे बंद कमरों में<br />रोशन-दान बनती,<br />ज्ञान की रोशनी के लिए<br />बंद रास्तों पर<br />एक नया आकाश फैला देती,<br />उनकी आँखों में<br />सिर्फ़ स्वप्न ना रखें ,<br />उन तक पहुँचने के पंख भी दें।<br />उन्हें ज्ञान दें कि<br />अपने हिस्से की धूप<br />खुद चुन सकें।<br />किताबें जब उनके हांथों में होंगी,<br />तो सदियों के कई बोझ<br />आप उतर जाएँगे।<br />कलम उँगलियों से चलेंगीं<br />तक़दीर की कविता भी<br />लिखी जाएगी।<br />शिक्षित बालिका<br />अपना जीवन ही नहीं संवारती,<br />आने वाली पीढ़ियों के लिए<br />उजला दीप बन जाती।<br />आइये,<br />बेटी को शिक्षा का रक्षा-कवच दें,<br />ताकि वह<br />अपने सपनों, अपने अधिकारों<br />अपने अस्तित्व की रक्षा<br />स्वयं कर सके।<br /><br />संजीव ठाकुर, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,</div></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 12:57:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ऑपरेशन मिलाप : बिछड़ों को अपनों से मिलाने का मानवीय अभियान, परिवारों के आंसुओं में लौटी खुशियों की रोशनी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">किसी घर का बेटा, बेटी, बहन, भाई या माता-पिता अचानक लापता हो जाएं तो उस परिवार पर क्या गुजरती है, इसका अंदाजा वही लगा सकता है जिसने इस पीड़ा को करीब से महसूस किया हो। गुमशुदगी केवल किसी व्यक्ति का घर से दूर हो जाना नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार की खुशियों, उम्मीदों और मानसिक शांति के खो जाने जैसा होता है। हर गुजरते दिन के साथ परिजनों की चिंता बढ़ती जाती है। हर दरवाजे की आहट उन्हें उम्मीद देती है कि शायद उनका अपना लौट आया हो। हर फोन कॉल उन्हें चौंका देती है। ऐसे में जब वर्षों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181002/operation-milap-a-humanitarian-campaign-to-reunite-separated-people-with"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/delhi-police.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">किसी घर का बेटा, बेटी, बहन, भाई या माता-पिता अचानक लापता हो जाएं तो उस परिवार पर क्या गुजरती है, इसका अंदाजा वही लगा सकता है जिसने इस पीड़ा को करीब से महसूस किया हो। गुमशुदगी केवल किसी व्यक्ति का घर से दूर हो जाना नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार की खुशियों, उम्मीदों और मानसिक शांति के खो जाने जैसा होता है। हर गुजरते दिन के साथ परिजनों की चिंता बढ़ती जाती है। हर दरवाजे की आहट उन्हें उम्मीद देती है कि शायद उनका अपना लौट आया हो। हर फोन कॉल उन्हें चौंका देती है। ऐसे में जब वर्षों या महीनों से बिछड़ा कोई व्यक्ति अचानक परिवार से मिल जाता है तो वह क्षण किसी चमत्कार से कम नहीं होता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">गुजरात पुलिस द्वारा चलाया गया “ऑपरेशन मिलाप” इसी मानवीय संवेदना का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर सामने आया है। इस विशेष अभियान के अंतर्गत मात्र एक महीने में 1470 गुमशुदा व्यक्तियों को खोजकर उनके परिवारों से मिलाया गया। यह केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि हजारों टूटते हुए परिवारों के जीवन में आशा, विश्वास और खुशियों की वापसी का अभियान है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस अभियान में 852 महिलाओं, 342 पुरुषों तथा 276 नाबालिग बच्चों और किशोरियों को खोजकर उनके परिजनों तक पहुंचाया गया। विशेष रूप से यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि बड़ी संख्या में किशोरियां और महिलाएं अपने परिवारों से बिछड़ गई थीं। ऐसे मामलों में समय के साथ परिवारों की चिंता कई गुना बढ़ जाती है। उन्हें हर पल किसी अनहोनी की आशंका सताती रहती है। ऐसे में पुलिस द्वारा इन लोगों को सुरक्षित ढूंढ़ निकालना निश्चित रूप से सराहनीय कार्य है।</div><div style="text-align:justify;">गुजरात पुलिस ने केवल औपचारिक जांच तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि पुराने और लंबित मामलों को दोबारा खोलकर नए सिरे से जांच की। आधुनिक तकनीक, मोबाइल फोन विश्लेषण, सोशल मीडिया गतिविधियों की निगरानी, विभिन्न राज्यों की पुलिस के साथ समन्वय, सार्वजनिक परिवहन केंद्रों और आश्रय गृहों की जांच जैसे अनेक माध्यमों का उपयोग किया गया। शिकायतकर्ताओं और गवाहों से दोबारा संपर्क कर नए सुराग जुटाए गए। यह दर्शाता है कि यदि इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता हो तो वर्षों पुराने मामलों में भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।</div><div style="text-align:justify;">सूरत पुलिस द्वारा सर्वाधिक 341 गुमशुदा व्यक्तियों का पता लगाना भी इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय स्तर पर समर्पित प्रयास किस प्रकार बड़े परिणाम दे सकते हैं। पुलिस और प्रशासन की यह सक्रियता उन परिवारों के लिए राहत का कारण बनी है जो वर्षों से अपने प्रियजनों की प्रतीक्षा में दिन गिन रहे थे।</div><div style="text-align:justify;">इस अभियान का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे समाज के सामने गुमशुदगी के वास्तविक कारण भी उजागर हुए हैं। पुलिस के विश्लेषण में सामने आया कि 14 से 17 वर्ष की आयु वर्ग की अनेक किशोरियां प्रेम संबंधों, पारिवारिक विवादों, अभिभावकों की डांट-फटकार अथवा पढ़ाई में असफलता जैसी परिस्थितियों के कारण घर छोड़कर चली गई थीं। कुछ मामले रोजगार की तलाश में पलायन करने वाले परिवारों से भी जुड़े पाए गए।</div><div style="text-align:justify;">यहां एक गंभीर सामाजिक संदेश छिपा हुआ है। जीवन में कठिनाइयां, असफलताएं, पारिवारिक मतभेद या भावनात्मक उलझनें आना स्वाभाविक है। किशोरावस्था में भावनाएं अधिक संवेदनशील होती हैं और कई बार छोटी घटनाएं भी बहुत बड़ी लगने लगती हैं। लेकिन घर छोड़ देना किसी समस्या का समाधान नहीं है। यह निर्णय क्षणिक आवेश में लिया जा सकता है, पर उसके परिणाम बहुत गंभीर होते हैं।</div><div style="text-align:justify;">कई बार बच्चों और किशोरों को लगता है कि उनके जाने से परिवार को कोई फर्क नहीं पड़ेगा या कुछ दिनों बाद सब सामान्य हो जाएगा। वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत होती है। जिस दिन कोई बच्चा या किशोर घर से लापता होता है, उसी दिन से उसके माता-पिता का चैन और नींद समाप्त हो जाती है। मां की आंखें दरवाजे पर लगी रहती हैं। पिता बाहर से मजबूत दिखने का प्रयास करता है, लेकिन भीतर से टूट चुका होता है। भाई-बहन चिंता और असुरक्षा के बीच जीते हैं। पूरा परिवार हर संभावित स्थान पर तलाश करता है, पुलिस थानों के चक्कर लगाता है और अनिश्चितता के अंधेरे में जीवन बिताता है।</div><div style="text-align:justify;">गुमशुदगी का दर्द केवल भावनात्मक नहीं होता, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी परिवारों को प्रभावित करता है। अनेक परिवार अपनी बचत तक खर्च कर देते हैं। कई लोग कामकाज छोड़कर अपने प्रियजन की तलाश में जुट जाते हैं। मानसिक तनाव के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी उत्पन्न होने लगती हैं। इसलिए किसी भी परिस्थिति में घर छोड़कर चले जाना न तो समझदारी है और न ही समस्याओं का समाधान।</div><div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता इस बात की है कि परिवारों और बच्चों के बीच संवाद को मजबूत बनाया जाए। अभिभावक बच्चों की भावनाओं को समझें और बच्चे अपने माता-पिता पर विश्वास करें। यदि पढ़ाई में असफलता मिली है, किसी बात पर डांट पड़ी है या जीवन में कोई परेशानी आई है, तो उसका समाधान बातचीत से निकाला जा सकता है। परिवार ही वह स्थान है जहां व्यक्ति को सबसे अधिक सुरक्षा, प्रेम और सहयोग मिलता है।</div><div style="text-align:justify;">ऑपरेशन मिलाप की सफलता केवल आंकड़ों में नहीं मापी जा सकती। इसकी वास्तविक सफलता उन हजारों मुस्कानों में दिखाई देती है जो बिछड़ने के बाद फिर से लौट आईं। उन माताओं की आंखों में दिखाई देती है जिन्होंने वर्षों बाद अपने बच्चों को गले लगाया। उन परिवारों की खुशी में दिखाई देती है जिनकी उम्मीदें लगभग समाप्त हो चुकी थीं।</div><div style="text-align:justify;">यह अभियान यह भी सिद्ध करता है कि पुलिस केवल कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली संस्था नहीं है, बल्कि समाज के दुख-दर्द में सहभागी बनने वाली संवेदनशील व्यवस्था भी है। जब पुलिस किसी गुमशुदा व्यक्ति को उसके परिवार तक पहुंचाती है, तब वह केवल एक केस बंद नहीं करती बल्कि एक टूटे हुए परिवार को फिर से जोड़ती है।</div><div style="text-align:justify;">ऑपरेशन मिलाप ने हजारों परिवारों को नई जिंदगी दी है। यह अभियान मानवता, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का उत्कृष्ट उदाहरण है। साथ ही यह हम सभी को यह संदेश भी देता है कि जीवन की किसी भी कठिन परिस्थिति में घर और परिवार से दूर जाना समाधान नहीं है। संवाद, धैर्य और विश्वास ही हर समस्या का सबसे मजबूत उत्तर हैं। यदि यह संदेश समाज के प्रत्येक बच्चे और किशोर तक पहुंच जाए तो शायद भविष्य में अनेक परिवार गुमशुदगी की उस पीड़ा से बच सकेंगे, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं है।</div><div style="text-align:justify;">       </div><div style="text-align:justify;"><strong><br /></strong></div><div style="text-align:justify;"><strong>                                                                           *कांतिलाल मांडोत*</strong></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 18:35:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>हिंसा राजनीतिक अस्थिरता और मानवाधिकार संकट के बीच घिरा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
<div>
<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) एक बार फिर गंभीर अशांति और हिंसा का केंद्र बन गया है। विधानसभा चुनावों से पहले भड़की हिंसा ने पूरे क्षेत्र को तनाव और अनिश्चितता के माहौल में धकेल दिया है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार अब तक लगभग 30 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 200 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। मुजफ्फराबाद, रावलकोट और अन्य प्रमुख शहरों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें स्थानीय लोगों का गुस्सा खुलकर सामने आया है। स्थिति</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180926/pakistan-occupied-kashmir-surrounded-by-violence-political-instability-and-human"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas2.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
<div>
<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
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<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) एक बार फिर गंभीर अशांति और हिंसा का केंद्र बन गया है। विधानसभा चुनावों से पहले भड़की हिंसा ने पूरे क्षेत्र को तनाव और अनिश्चितता के माहौल में धकेल दिया है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार अब तक लगभग 30 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 200 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। मुजफ्फराबाद, रावलकोट और अन्य प्रमुख शहरों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें स्थानीय लोगों का गुस्सा खुलकर सामने आया है। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पाकिस्तान को अतिरिक्त सुरक्षा बल और रेंजर्स तैनात करने पड़े हैं, लेकिन इसके बावजूद हालात सामान्य नहीं हो पाए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">यह हिंसा केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक असंतोष की लंबी पृष्ठभूमि मौजूद है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनकी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं और अधिकारों की लगातार अनदेखी की जा रही है। चुनाव से पहले जिस प्रकार सीटों के आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर विवाद पैदा हुआ, उसने लोगों के भीतर पहले से मौजूद नाराजगी को और अधिक भड़का दिया। यही कारण है कि प्रदर्शन केवल किसी एक निर्णय के विरोध तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे व्यापक असंतोष के रूप में सामने आए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">रावलकोट में हुई झड़पों ने स्थिति को और विस्फोटक बना दिया। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव के बाद हिंसा तेजी से फैल गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े गए और कई स्थानों पर गोलीबारी भी हुई। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ इलाकों में बिना पर्याप्त चेतावनी के बल प्रयोग किया गया, जिससे भगदड़ मच गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हो गए। इन घटनाओं ने स्थानीय जनता के भीतर सेना और सुरक्षा एजेंसियों के प्रति असंतोष को और गहरा कर दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान संकट का एक बड़ा कारण 27 जुलाई को प्रस्तावित विधानसभा चुनाव भी हैं। चुनावों में 45 में से 12 सीटों को शरणार्थियों के लिए आरक्षित किए जाने के फैसले का व्यापक विरोध हो रहा है। विरोधी संगठनों का कहना है कि इस व्यवस्था से स्थानीय निवासियों के राजनीतिक अधिकार प्रभावित होंगे और उनकी वास्तविक भागीदारी कम हो जाएगी। इसी मुद्दे को लेकर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने आंदोलन तेज किया है। बंद और प्रदर्शन की घोषणाओं ने पूरे क्षेत्र में राजनीतिक माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;">पीओके में बढ़ते विरोध प्रदर्शनों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब यह असंतोष केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहा। विदेशों में रहने वाले कश्मीरी समुदाय और मानवाधिकार संगठनों ने भी इस मुद्दे पर आवाज उठानी शुरू कर दी है। ब्रिटेन में पाकिस्तान के दूतावास के बाहर प्रदर्शन किए गए, जहां प्रदर्शनकारियों ने पीओके में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और बल प्रयोग के खिलाफ नारे लगाए। इससे स्पष्ट होता है कि यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित कर रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">ब्रिटेन के लगभग 50 सांसदों द्वारा इस विषय पर चिंता व्यक्त किया जाना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सांसदों ने ब्रिटिश सरकार से मामले पर ध्यान देने और राजनयिक स्तर पर हस्तक्षेप की संभावनाओं पर विचार करने का आग्रह किया है। उनका मानना है कि किसी भी क्षेत्र में लोकतांत्रिक अधिकारों और मानवाधिकारों का सम्मान होना चाहिए तथा राजनीतिक मतभेदों का समाधान संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठती ऐसी आवाजें पाकिस्तान के लिए नई कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी कर सकती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, भारत ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक विफलताओं और मानवाधिकार संबंधी प्रश्नों से ध्यान हटाने के लिए भ्रामक सूचनाओं और दुष्प्रचार का सहारा ले रहा है। भारत का यह भी कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पीओके में घट रही घटनाओं पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वहां रहने वाले लोगों के अधिकारों का सम्मान हो। भारत लंबे समय से पीओके में लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की स्थिति पर चिंता व्यक्त करता रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">पीओके में इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध और संचार व्यवस्था में व्यवधान की खबरों ने भी चिंता बढ़ाई है। कई इलाकों में लोगों को सूचना और संवाद के साधनों से वंचित होना पड़ा है। आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में सूचना तक पहुंच को एक महत्वपूर्ण अधिकार माना जाता है। ऐसे में संचार माध्यमों पर नियंत्रण से लोगों के बीच असुरक्षा और अविश्वास की भावना और अधिक बढ़ सकती है। इससे प्रशासन और जनता के बीच संवाद की संभावनाएं भी कमजोर होती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान संकट पाकिस्तान के सामने एक बड़े राजनीतिक प्रश्न को भी खड़ा करता है। यदि किसी क्षेत्र में लगातार विरोध प्रदर्शन, जनाक्रोश और प्रशासन के प्रति अविश्वास बढ़ रहा हो, तो केवल सुरक्षा बलों के सहारे स्थिति को लंबे समय तक नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसके लिए आवश्यक है कि जनता की शिकायतों को सुना जाए, राजनीतिक संवाद को बढ़ावा दिया जाए और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाया जाए। इतिहास गवाह है कि जब भी जनभावनाओं की उपेक्षा की जाती है, तब असंतोष और अधिक तीव्र रूप में सामने आता है।</div>
<div style="text-align:justify;">पीओके की मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि वहां के लोग अपने राजनीतिक अधिकारों, बेहतर प्रशासन और सम्मानजनक प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर पहले से अधिक मुखर हो चुके हैं। यदि इन मांगों को समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाले दिनों में स्थिति और जटिल हो सकती है। चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता, प्रशासन की जवाबदेही और मानवाधिकारों की रक्षा जैसे मुद्दे आने वाले समय में और अधिक महत्वपूर्ण बनेंगे।</div>
<div style="text-align:justify;">कुल मिलाकर, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भड़की हिंसा केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि यह उस गहरे असंतोष का परिणाम है जो लंबे समय से वहां मौजूद है। बढ़ती मौतें, सैकड़ों घायल, व्यापक प्रदर्शन, अंतरराष्ट्रीय चिंता और राजनीतिक विवाद यह दर्शाते हैं कि पीओके एक संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है। आने वाले दिनों में पाकिस्तान सरकार किस प्रकार इस संकट का समाधान करती है, यह न केवल क्षेत्र की स्थिरता बल्कि उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता को भी प्रभावित करेगा। पीओके के लोगों की आकांक्षाओं और अधिकारों का सम्मान करते हुए शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक समाधान ही इस संकट से बाहर निकलने का सबसे प्रभावी मार्ग साबित हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"><strong>           </strong></div>
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<div style="text-align:justify;"><strong>*कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 16:24:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>मौत की फैक्ट्री ने खोली व्यवस्था की पोल,सबूतों के बाद भी यदि जिम्मेदार बच जाएं तो न्याय अधूरा रहेगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div style="text-align:justify;">जयपुर के खोह नागोरियान क्षेत्र में अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण विस्फोट और आगजनी की घटना केवल एक हादसा नहीं है, बल्कि यह हमारे प्रशासनिक तंत्र, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही की वास्तविक तस्वीर को सामने लाने वाली त्रासदी है। आठ लोगों की दर्दनाक मौत, जिनमें एक मासूम बच्चा भी शामिल था, केवल आंकड़ा नहीं है बल्कि उन परिवारों की जिंदगी का वह अंधेरा अध्याय है जिसे वे कभी भुला नहीं पाएंगे। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ऐसी अवैध गतिविधियां वर्षों तक प्रशासन और पुलिस की नजरों से कैसे बची रहती</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180920/the-death-factory-has-opened-the-systems-polls-even-after"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/feec3084-87ae-405c-9cf7-318a98f01ecb.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div style="text-align:justify;">जयपुर के खोह नागोरियान क्षेत्र में अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण विस्फोट और आगजनी की घटना केवल एक हादसा नहीं है, बल्कि यह हमारे प्रशासनिक तंत्र, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही की वास्तविक तस्वीर को सामने लाने वाली त्रासदी है। आठ लोगों की दर्दनाक मौत, जिनमें एक मासूम बच्चा भी शामिल था, केवल आंकड़ा नहीं है बल्कि उन परिवारों की जिंदगी का वह अंधेरा अध्याय है जिसे वे कभी भुला नहीं पाएंगे। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर ऐसी अवैध गतिविधियां वर्षों तक प्रशासन और पुलिस की नजरों से कैसे बची रहती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिस मकान में यह फैक्ट्री संचालित हो रही थी, वह रिहायशी इलाके के बीचोंबीच स्थित था। वहां करीब डेढ़ सौ मकानों में छह सौ से अधिक लोग रहते हैं। ऐसे घनी आबादी वाले क्षेत्र में लगभग पचास किलो बारूद का भंडारण और पटाखों का निर्माण किसी भी समय बड़े हादसे को निमंत्रण देने जैसा था। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि फैक्ट्री के पास कोई वैध लाइसेंस नहीं था। मकान किराए पर दिया गया था, लेकिन न तो पुलिस सत्यापन कराया गया और न ही विधिवत किरायानामा तैयार किया गया। यह स्थिति बताती है कि नियम केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">घटना के बाद सामने आए तथ्यों ने व्यवस्था की कई परतों को उजागर किया है। बताया जा रहा है कि फैक्ट्री पिछले कई वर्षों से संचालित थी और स्थानीय लोगों को इसकी जानकारी थी। यदि आसपास रहने वाले लोग जानते थे कि यहां पटाखों का काम होता है तो फिर पुलिस, प्रशासन और अन्य जिम्मेदार विभागों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी। थाना क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखना स्थानीय पुलिस की जिम्मेदारी होती है। बीट कांस्टेबल से लेकर थाना प्रभारी तक की जवाबदेही तय होती है। ऐसे में यह मान लेना कठिन है कि किसी को इसकी जानकारी नहीं थी।</div>
<div style="text-align:justify;">इस घटना का सबसे दुखद पहलू यह है कि हादसे के समय वहां काम करने वाले मजदूर बेहद असुरक्षित परिस्थितियों में कार्य कर रहे थे। बारूद के बीच मजदूरों से काम लिया जा रहा था। वहीं खाना भी बनाया जाता था और घरेलू गैस सिलेंडर भी रखा हुआ था। सुरक्षा मानकों की ऐसी घोर अनदेखी किसी भी क्षण विनाश का कारण बन सकती थी। जब आग लगी तो मजदूर जान बचाने के लिए बाहर भागे। कई लोग बुरी तरह झुलस गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उनके कपड़ों के साथ चमड़ी तक निकल गई थी। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने वाला है।</div>
<div style="text-align:justify;">घटना के बाद राहत और बचाव कार्यों को लेकर भी कई सवाल उठे हैं। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि शुरुआती समय में आग इतनी भयावह थी कि घटनास्थल के निकट पहुंचना मुश्किल था। स्थानीय लोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर घायलों को बाहर निकाला। यदि स्थानीय नागरिक साहस नहीं दिखाते तो मृतकों की संख्या और अधिक हो सकती थी। यह तथ्य भी चिंताजनक है कि इतने बड़े हादसे के बावजूद घटनास्थल पर तत्काल और व्यवस्थित आपदा प्रबंधन व्यवस्था दिखाई नहीं दी। ऐसी घटनाओं में शुरुआती कुछ मिनट सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन अक्सर हमारी व्यवस्थाएं इन्हीं क्षणों में कमजोर पड़ जाती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">यह पहला अवसर नहीं है जब अवैध पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट हुआ हो। देश के विभिन्न हिस्सों में हर वर्ष ऐसे हादसे होते हैं और दर्जनों लोग जान गंवाते हैं। कुछ महीने पहले खैरथल-तिजारा क्षेत्र में भी इसी प्रकार का हादसा हुआ था। उसके बाद हजारों फैक्ट्रियों की जांच की गई और बड़ी संख्या में नोटिस जारी किए गए। लेकिन सवाल यह है कि नोटिस देने के बाद क्या हुआ। यदि कार्रवाई प्रभावी होती तो शायद जयपुर की यह घटना टाली जा सकती थी। केवल नोटिस जारी कर देना प्रशासनिक सफलता नहीं कहलाता। वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब नियमों का पालन सुनिश्चित हो और अवैध इकाइयों को समय रहते बंद कराया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण विषय जवाबदेही का है। अक्सर बड़े हादसों के बाद जांच समितियां गठित कर दी जाती हैं, रिपोर्ट मांगी जाती है और कुछ समय बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। मृतकों के परिजनों को मुआवजा देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती है। लेकिन मुआवजा कभी किसी की जिंदगी वापस नहीं ला सकता। न्याय तभी होगा जब उन सभी लोगों की जिम्मेदारी तय होगी जिनकी लापरवाही या मिलीभगत के कारण यह अवैध कारोबार फलता-फूलता रहा। फैक्ट्री संचालक, मकान मालिक, निगरानी के लिए जिम्मेदार अधिकारी और नियमों के पालन की जांच करने वाले विभाग सभी की भूमिका की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।</div>
<div style="text-align:justify;">समाज के सामने भी आत्ममंथन का अवसर है। कई बार लोग अपने आसपास चल रही अवैध गतिविधियों को देखकर भी चुप रहते हैं। भय, उदासीनता या व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण शिकायत नहीं करते। परिणाम यह होता है कि एक दिन वही गतिविधि किसी बड़े हादसे का रूप ले लेती है। नागरिक सतर्कता और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों मिलकर ही ऐसी घटनाओं को रोक सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">आज जरूरत केवल शोक व्यक्त करने की नहीं है बल्कि कठोर और निर्णायक कार्रवाई की है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके लिए सबसे बड़ी सांत्वना यही होगी कि दोषियों को सजा मिले और भविष्य में किसी अन्य परिवार को ऐसी पीड़ा न झेलनी पड़े। यदि इस घटना के स्पष्ट सबूतों और तथ्यों के बावजूद जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं होती, तो यह व्यवस्था पर लोगों के भरोसे को और कमजोर करेगा।</div>
<div style="text-align:justify;">खोह नागोरियान की यह त्रासदी हमें याद दिलाती है कि प्रशासनिक लापरवाही, नियमों की अनदेखी और जवाबदेही के अभाव का परिणाम कितना भयावह हो सकता है। आठ लोगों की मौत केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है। अब देखना यह है कि जांच और कार्रवाई का वादा केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है या फिर वास्तव में दोषियों को सजा देकर यह संदेश दिया जाता है कि लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वालों के लिए कानून में कोई जगह नहीं है। पीड़ित परिवारों को वास्तविक राहत तभी मिलेगी जब न्याय केवल कागजों पर नहीं बल्कि धरातल पर दिखाई देगा।</div>
<div style="text-align:justify;">   </div>
<div style="text-align:justify;">    <strong> *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 15:48:41 +0530</pubDate>
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                <title>स्वाधीनता संग्राम में अमर नाम है राम प्रसाद बिस्मिल का</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr"><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वैचारिक चेतना और सशस्त्र क्रांति का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जिसने दमनकारी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलाकर रख दी थी। इस अद्वितीय संगम के सबसे प्रखर प्रतीक पुरुष थे अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल। वे केवल एक निर्भीक सेनानी ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुवादक और बहुभाषाविद भी थे। उनकी कलम से निकले शब्द जहाँ युवाओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधका देते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनके हाथों में थमी पिस्तौल विदेशी शासकों के मन में भय का संचार करती थी। कलम और पिस्तौल का</span></p></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180910/ram-prasad-bismils-immortal-name-in-the-freedom-struggle"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt"><div class="a3s aiL"><div><div dir="ltr"><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वैचारिक चेतना और सशस्त्र क्रांति का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जिसने दमनकारी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलाकर रख दी थी। इस अद्वितीय संगम के सबसे प्रखर प्रतीक पुरुष थे अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल। वे केवल एक निर्भीक सेनानी ही नहीं थे बल्कि एक संवेदनशील कवि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुवादक और बहुभाषाविद भी थे। उनकी कलम से निकले शब्द जहाँ युवाओं के भीतर देशभक्ति की ज्वाला धधका देते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं उनके हाथों में थमी पिस्तौल विदेशी शासकों के मन में भय का संचार करती थी। कलम और पिस्तौल का ऐसा अद्भुत संतुलन इतिहास में विरला ही देखने को मिलता है। उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति हंसते-हंसते दे दी और आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रवाद का एक ऐसा अनुपम आदर्श स्थापित किया जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस महान क्रांतिकारी का जन्म 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर नामक नगर में हुआ था। उनके पिता मुरलीधर एक साधारण और स्वाभिमानी व्यक्ति थे जबकि उनकी माता मूलमती धार्मिक और दृढ़ संकल्प वाली महिला थीं। बिस्मिल के व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी माता का प्रभाव सबसे गहरा था जिन्होंने उन्हें सदा सत्य और देशप्रेम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। बचपन में उनकी शिक्षा-दीक्षा स्थानीय स्तर पर हुई जहाँ उन्होंने हिंदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्दू और संस्कृत भाषाओं का गहन अध्ययन किया। वे उर्दू में बिस्मिल उपनाम से कविताएँ लिखते थे जबकि हिंदी में राम और अज्ञात के नाम से उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। किशोरावस्था में स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों और आर्य समाज के सिद्धांतों ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी जिससे उनके भीतर अनुशासन और राष्ट्र सेवा का संकल्प और अधिक सुदृढ़ हो गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की पराधीनता और देशवासियों पर होने वाले अत्याचारों ने उन्हें सक्रिय क्रांति के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए विवश कर दिया। वर्ष 1918 में उन्होंने मैनपुरी षड्यंत्र के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी जहाँ उन्होंने युवाओं का एक दल बनाकर देशभक्ति साहित्य का वितरण किया। इसके बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन को एक अधिक संगठित और राष्ट्रव्यापी रूप देने के प्रयास में जुट गए। इसी उद्देश्य से उन्होंने अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान गणतंत्र संघ नामक एक शक्तिशाली क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य लक्ष्य भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाना और एक लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना था। बिस्मिल इस संगठन के मुख्य रणनीतिकार और सेनापति थे। उनके नेतृत्व में चंद्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ जैसे महान क्रांतिकारियों ने अपनी देशभक्ति का पाठ सीखा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्रांतिकारी गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने और अस्त्र-शस्त्र खरीदने के लिए धन की अत्यधिक आवश्यकता थी। विदेशी सरकार से धन मांगना असंभव था और देश की गरीब जनता को लूटना क्रांतिकारियों के सिद्धांतों के विरुद्ध था। इसलिए बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की एक अत्यंत साहसिक योजना बनाई। 9 अगस्त 1925 को उनके कुशल नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने लखनऊ के समीप काकोरी नामक स्थान पर सहारनपुर से लखनऊ जा रही एक यात्री रेलगाड़ी को रोककर सरकारी खजाने को अपने नियंत्रण में ले लिया। इस ऐतिहासिक घटना को काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है। इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य को भीतर तक झकझोर दिया और सरकार ने क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। व्यापक धरपकड़ के बाद बिस्मिल सहित कई प्रमुख क्रांतिकारियों को बंदी बना लिया गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कारागार की चारदीवारों के भीतर भी बिस्मिल का हौसला तनिक भी कम नहीं हुआ। उन्होंने बंदीगृह को ही अपनी साधना स्थली बना लिया और वहाँ रहते हुए प्रचुर मात्रा में उत्कृष्ट साहित्य की रचना की। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा वहीं लिखी जो आज भी भारतीय क्रांतिकारी साहित्य का एक अनमोल रत्न मानी जाती है। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई विदेशी क्रांतिकारी ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद किया और अनेक प्रेरणादायक गीतों की रचना की। कारागार में रहते हुए उन्होंने अपने देशवासियों और विशेष रूप से युवाओं के नाम कई संदेश भेजे जिसमें उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने पर बल दिया। उनके विचार अत्यंत दूरदर्शी थे जो केवल अंग्रेजों को भगाने तक सीमित नहीं थे बल्कि वे एक शोषणमुक्त समाज का निर्माण करना चाहते थे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रिटिश अदालत ने काकोरी घटना का मुख्य सूत्रधार मानते हुए राम प्रसाद बिस्मिल को मृत्युदंड की सजा सुनाई। 19 दिसंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर कारागार में उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। फांसी के चबूतरे की ओर बढ़ते हुए उनके चेहरे पर कोई भय नहीं था बल्कि एक अलौकिक तेज था। उन्होंने हंसते हुए फंदे को चूमा और अपनी मातृभूमि की वंदना करते हुए प्राण त्याग दिए। उनकी अंतिम इच्छा यही थी कि वे बार-बार भारत भूमि पर जन्म लें और तब तक देश की सेवा करते रहें जब तक कि वह पूरी तरह से स्वतंत्र न हो जाए। उनका यह सर्वोच्च बलिदान व्यर्थ नहीं गया और इसने पूरे देश में क्रांति की एक ऐसी लहर पैदा कर दी जिसने अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत को औपनिवेशिक दासता से मुक्ति दिलाई।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">राम प्रसाद बिस्मिल का जीवन और उनका कृतित्व इस बात का साक्षात प्रमाण है कि एक सच्चा देशभक्त केवल अस्त्रों से ही नहीं बल्कि अपने विचारों और नैतिक मूल्यों से भी लड़ता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए। आज भले ही वे हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं लेकिन उनकी कविताएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके विचार और उनका अदम्य साहस हर भारतीय के हृदय में सदैव जीवित रहेगा। राष्ट्र निर्माण और देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए उनका जीवन सदैव एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ की भांति हमें प्रेरणा देता रहेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div></div></div></div><div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 15:31:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कॉकरोच जनता पार्टी का उभार और युवा आकांक्षाओं की राजनीति में भाजपा की विकासवादी चुनौती</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि यहां हर वर्ग को अपनी बात रखने का अधिकार प्राप्त है। समय समय पर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों ने देश की नीतियों और जनचर्चाओं को प्रभावित किया है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया के माध्यम से उभरी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) भी इसी लोकतांत्रिक परंपरा का एक नया उदाहरण बनकर सामने आई है। दिल्ली के जंतर मंतर पर आयोजित इसके प्रदर्शन ने यह स्पष्ट किया है कि देश का एक वर्ग विशेष रूप से युवा पीढ़ी शिक्षा व्यवस्था रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180817/the-rise-of-the-cockroach-janata-party-and-bjps-evolutionary"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/86b5a220-571b-11f1-89a3-d1f559421220.jpg.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि यहां हर वर्ग को अपनी बात रखने का अधिकार प्राप्त है। समय समय पर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों ने देश की नीतियों और जनचर्चाओं को प्रभावित किया है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया के माध्यम से उभरी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) भी इसी लोकतांत्रिक परंपरा का एक नया उदाहरण बनकर सामने आई है। दिल्ली के जंतर मंतर पर आयोजित इसके प्रदर्शन ने यह स्पष्ट किया है कि देश का एक वर्ग विशेष रूप से युवा पीढ़ी शिक्षा व्यवस्था रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करना चाहती है। हालांकि इस आंदोलन को राजनीतिक परिवर्तन की बड़ी लहर मानना जल्दबाजी होगी क्योंकि भारत की राजनीति में जनविश्वास का सबसे मजबूत आधार आज भी विकास सुशासन और स्थिर नेतृत्व है जिसका प्रतिनिधित्व भारतीय जनता पार्टी कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म मूल रूप से सोशल मीडिया पर व्यंग्य और असंतोष की अभिव्यक्ति के रूप में हुआ था। कुछ ही समय में इसने बड़ी संख्या में युवाओं का ध्यान आकर्षित किया। जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन में बड़ी संख्या में छात्रों और युवा पेशेवरों की भागीदारी ने यह संकेत दिया कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता रोजगार के अवसरों और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे विषय युवाओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह मांगें नई नहीं हैं। हर पीढ़ी अपने समय की चुनौतियों को लेकर आवाज उठाती रही है और लोकतंत्र में यह स्वाभाविक भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन केवल नारों और भीड़ के आधार पर नहीं किया जा सकता। यह देखना भी आवश्यक है कि देश की वास्तविक परिस्थितियां क्या हैं और सरकार ने उन चुनौतियों के समाधान के लिए क्या प्रयास किए हैं। इस संदर्भ में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का कार्यकाल उल्लेखनीय रहा है। पिछले एक दशक में भारत ने बुनियादी ढांचे आर्थिक सुधारों डिजिटल परिवर्तन और वैश्विक प्रतिष्ठा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। देश के राजमार्गों रेलवे नेटवर्क हवाई अड्डों बंदरगाहों और डिजिटल सेवाओं में जिस गति से विस्तार हुआ है वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युवाओं की सबसे बड़ी चिंता रोजगार और अवसरों को लेकर होती है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने मेक इन इंडिया स्टार्टअप इंडिया स्किल इंडिया डिजिटल इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे व्यापक कार्यक्रम शुरू किए। इन पहलों का उद्देश्य केवल नौकरियां पैदा करना नहीं बल्कि युवाओं को रोजगार देने वाला उद्यमी बनाना भी है। आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है। लाखों युवा तकनीक नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से नए अवसर प्राप्त कर रहे हैं। यह परिवर्तन किसी एक दिन में नहीं आया बल्कि इसके पीछे दीर्घकालिक नीतिगत प्रयास और राजनीतिक इच्छाशक्ति रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सीजेपी का आंदोलन युवाओं की कुछ वास्तविक चिंताओं को सामने लाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी है। यदि कहीं अनियमितता या प्रशासनिक कमजोरी दिखाई देती है तो उसके समाधान की अपेक्षा स्वाभाविक है। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी समस्या का अस्तित्व यह सिद्ध नहीं करता कि पूरा तंत्र विफल हो गया है। भारत जैसे विशाल देश में करोड़ों छात्र विभिन्न परीक्षाओं में भाग लेते हैं। ऐसे में चुनौतियां सामने आ सकती हैं लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार उन्हें सुधारने के लिए कितनी प्रतिबद्ध है। हाल के वर्षों में परीक्षा प्रक्रियाओं को अधिक सुरक्षित और तकनीक आधारित बनाने के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो कॉकरोच जनता पार्टी फिलहाल एक संगठित वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति के बजाय असंतोष की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति अधिक दिखाई देती है। इसके समर्थकों में बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है जो व्यवस्था में सुधार चाहते हैं। यह भावना लोकतंत्र के लिए सकारात्मक मानी जा सकती है क्योंकि जागरूक नागरिक ही लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाते हैं। हालांकि किसी आंदोलन को स्थायी जनसमर्थन प्राप्त करने के लिए केवल विरोध पर्याप्त नहीं होता। उसे स्पष्ट नीतियां व्यवहारिक समाधान और व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करना पड़ता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में इसके पहले भी कई आंदोलन उभरे हैं जिन्होंने व्यवस्था परिवर्तन के बड़े दावे किए। कुछ समय के लिए उन्हें व्यापक लोकप्रियता भी मिली लेकिन दीर्घकालिक सफलता केवल उन्हीं को मिली जो शासन और विकास का प्रभावी मॉडल प्रस्तुत कर सके। भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी शक्ति यही रही है कि उसने चुनावी नारों से आगे बढ़कर विकास को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में स्थापित किया। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश ने आर्थिक विकास राष्ट्रीय सुरक्षा तकनीकी प्रगति और वैश्विक कूटनीति के क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। विदेशी निवेश लगातार बढ़ रहा है। विनिर्माण क्षेत्र को नई गति मिली है। रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ी है। डिजिटल भुगतान प्रणाली ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर सेमीकंडक्टर निर्माण तक भारत नए क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है। इन उपलब्धियों का सीधा लाभ युवाओं को मिलने वाले अवसरों के रूप में दिखाई देता है। यही कारण है कि भाजपा का जनाधार केवल राजनीतिक समर्थन तक सीमित नहीं बल्कि विकास के प्रति विश्वास पर आधारित है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जंतर मंतर का प्रदर्शन यह संदेश देता है कि देश का युवा अपनी अपेक्षाओं को लेकर मुखर है। यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य का संकेत है। लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट है कि भारत जैसे विशाल और तेजी से आगे बढ़ते राष्ट्र में परिवर्तन केवल विरोध से नहीं बल्कि रचनात्मक सहभागिता से संभव होगा। सरकार और युवाओं के बीच संवाद जितना मजबूत होगा उतना ही देश का भविष्य सशक्त बनेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कॉकरोच जनता पार्टी को युवाओं की कुछ मांगों और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है। वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी का विकास मॉडल यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक परिवर्तन के लिए दूरदर्शी नीतियां मजबूत नेतृत्व और सतत विकास आवश्यक हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सीजेपी अपने आंदोलन को किस दिशा में ले जाती है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा की विकास यात्रा और जनविश्वास की मजबूत नींव उसके लिए सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनी हुई है। भारत की जनता विशेष रूप से युवा वर्ग अवसर पारदर्शिता और प्रगति चाहता है और इन्हीं अपेक्षाओं की कसौटी पर भविष्य की राजनीति का मूल्यांकन होता रहेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 18:33:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>भारत की विकास यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की महती भूमिका</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत आज दुनिया की तीसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहा है। जब देशवासी अपने देश की तरक्की की बातें सुनते हैं तो बेशक उन्हें बड़ी खुशी और गर्व होता है। भारत की इस विकास यात्रा में केंद्र व राज्यों की सरकारों के साथ-साथ देश के नागरिकों का भी अपना अथाह योगदान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी तो आज हम दुनिया की तीसरी बड़ी महाशक्ति बनकर उभर रहे हैं। भारत की विकास यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका भी महती रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे नकारा नहीं जा सकता है। बेशक कुछ संघ-विरोधी विचारधारा वाले लोगों को देश की विकास यात्रा में</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180815/important-role-of-rashtriya-swayamsevak-sangh-in-indias-development-journey"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/rss-shatabdi-varsh-jan-sampark-abhiyaan-history.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत आज दुनिया की तीसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहा है। जब देशवासी अपने देश की तरक्की की बातें सुनते हैं तो बेशक उन्हें बड़ी खुशी और गर्व होता है। भारत की इस विकास यात्रा में केंद्र व राज्यों की सरकारों के साथ-साथ देश के नागरिकों का भी अपना अथाह योगदान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी तो आज हम दुनिया की तीसरी बड़ी महाशक्ति बनकर उभर रहे हैं। भारत की विकास यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका भी महती रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे नकारा नहीं जा सकता है। बेशक कुछ संघ-विरोधी विचारधारा वाले लोगों को देश की विकास यात्रा में संघ का योगदान अचरज भरा भी लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के योगदान को यह देश कभी भुला नहीं पाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आजादी के उस वक्त को याद कर कल्पना करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ तथाकथित सत्ता-स्वार्थी राजनेताओं की हुक्मरान बनने की चाहत के चलते जिस देश की आजादी धर्म के नाम पर की गई हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहाँ कितना खून-खराबा अपनों का अपनों के ही हाथों हुआ होगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पाकिस्तान के उदय के साथ ही लाहौर से लेकर कराची तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्वी-पश्चिमी सीमाओं तक बसने वाले हिंदुओं के कत्लेआम की जो दास्तां देश ने देखी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी कल्पना मात्र से आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं और शरीर में सिहरन पैदा हो जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आजादी से पहले भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अखंड भारत की कल्पना को साकार करने की अलख जगाने के लिए लोगों को जागरूक कर रहा था। कई मौकों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जन्मदाता और तत्कालीन प्रथम सरसंघचालक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार और द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ‘गुरुजी’ ने भी देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले सभी बड़े तत्कालीन नेताओं से अखंड भारत बनाए रखने की लड़ाई लड़ने की बात कही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन संघ विरोधी मानसिकता वाले कुछ लोगों ने हर बार संघ की बातों को नजरअंदाज करते हुए मुस्लिम लीग के जिन्ना की जिद के आगे नतमस्तक होकर आखिरकार अखंड भारत को धर्म के नाम पर टुकड़ों में बांट दिया था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्ना की मुस्लिम लीग के समर्थक गुंडों और पाकिस्तानी फौजी सिपाहियों ने पाकिस्तान के हर हिस्से में रह रहे हिंदुओं को वहाँ से भागने के लिए उन पर रक्तरंजित अत्याचार ही नहीं किए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि हिंदू बेटियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बहुओं और माताओं की अस्मिता को भी सरेआम लूटकर तार-तार किया था। पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में हिंदुओं की लाशों के ढेर इस बात के सबूत थे कि हिंदुओं के प्रति जिन्ना और उसके गुंडों ने सत्ता की लालच में लोगों के बीच कितना जहर भरा था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आजादी के उस रक्तरंजित दौर में पाकिस्तान में सबसे पहले हिंदू माँ-बहनों और बेटियों की अस्मिता को बचाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता ही आगे आए और जिन्ना के गुंडों तथा उसके सिपाहियों से अपनी जान की बाजी लगाकर जितना हो सकता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतने हिंदुओं को बचाने का भरसक प्रयास भी किया था। इतना ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने विभाजन की त्रासदी से अपनी ही जमीन से बेदखल किए गए हिंदुओं की मदद हेतु जगह-जगह राहत शिविर खोलकर पाकिस्तान से बेदखल और प्रताड़ित किए गए हिंदुओं तथा उनके परिजनों को न केवल सुरक्षा दी</span>,</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि स्वयंसेवकों ने बिना सरकारी मदद के अपने दम पर महीनों तक उन हिंदुओं के भोजन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी और स्वास्थ्य की भी व्यवस्था की थी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह तो देश जानता है कि विभाजन के उस कठिन दौर में कैसे आरएसएस के स्वयंसेवकों ने पाकिस्तान में रह रहे हिंदुओं को बचाया था। आजादी के दौर के बहुत से लोगों का मानना है कि यदि आजादी के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक हिंदुओं को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी नहीं लगाते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जिन्ना के गुंडे और गुंडागर्दी पर उतारू उसकी सेना नफरत की आग में पाकिस्तान से समूची हिंदू कौम का ही सर्वनाश कर देते।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आजादी के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीयों में एकजुटता बनी रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस महान उद्देश्य को लेकर बिना प्रचार-प्रसार के अपने कार्यकर्ताओं के बूते अलख जगाए रखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी परिणति यह है कि भारत आज दुनिया की महाशक्तियों को अपने आगे झुकाने वाला देश बन गया है। देश में जब-जब भी विपदाएँ आईं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब-तब सरकार से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता निस्वार्थ भाव से अपनी जान की परवाह किए बिना विपदाओं में उम्मीदों का सहारा बनकर खड़े हुए हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा किए गए कार्यों की विपक्ष के नेता तक खुले मन से प्रशंसा करते रहे हैं। देश में जब भी कहीं भीषण बाढ़ आई हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूखा पड़ा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूकंप की त्रासदी हुई हो या फिर कोई गंभीर बीमारी ही क्यों न फैली हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यकर्ता देश में आई हर विपदा में सबसे पहले सहारा बनकर खड़ा हो जाता है और बिना जाति-धर्म पूछे अपनी जान की बाजी लगाकर सेवा कार्यों में जुट जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आरएसएस देश को जोड़ने और मजबूती प्रदान करने वाला संगठन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बिना जाति-धर्म का भेद किए देश के हर वर्ग और समाज के विकास में सहयोग प्रदान करता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आरएसएस का दायरा समूचा देश और देश में रहने वाले सभी जाति-धर्मों के लोगों के बीच मानवीय प्रेम और राष्ट्रीय एकता बनी रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसी महान उद्देश्य को लेकर दिन-रात उसके स्वयंसेवक कार्य करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एकमात्र ऐसा संगठन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने किए गए कार्यों का कभी दिखावा नहीं करता और न कभी अपना बखान करता है। देश की सेहत देखकर ही संघ की सक्रियता समझी जा सकती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देश यदि आज दुनिया में सिरमौर बन रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो इसमें आरएसएस की भूमिका को भी खुले मन से स्वीकारना होगा। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया के सबसे बड़े राष्ट्रहित को समर्पित संगठन आरएसएस के करोड़ों कार्यकर्ता बेहद अनुशासित तरीके से अपने सरसंघचालक के हर शब्द को अपना सर्वस्व त्याग कर निस्वार्थ भाव से पूर्ण करते हैं। यह संघ के सरसंघचालक के तपोबल का ही परिणाम है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के श्री मोहन भागवत छठे सरसंघचालक हैं। इससे पूर्व डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुकर दत्तात्रेय देवरस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ और के. एस. सुदर्शन जी के त्याग और अनुशासन से संघ दुनिया भर के देशों में अपनी जड़ें मजबूती से जमाए हुए मानवीय सेवा के कार्यों हेतु समर्पित है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय राजनीति के कुछ अवसरवादी सत्ता-स्वार्थी नेताओं ने अपने वोट बैंक की राजनीति के चक्कर में आरएसएस को देश-विरोधी संगठन बताने से भी गुरेज नहीं किया है। इतना ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ राजनीतिक दलों ने सत्ता में आने के बाद जाति-धर्म के वोट बैंक के सहारे सत्ता में बने रहने की चाहत में अपने-अपने राज्यों में आरएसएस पर प्रतिबंध भी लगा दिया था और आरएसएस से संबंध रखने वाले भारतीयों को प्रताड़ित भी किया जाता था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के कुछ राज्यों में आज भी आरएसएस के कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर बंदिशें लगाई गई हैं। वर्तमान में राजनीति से जुड़े कुछ लोगों ने एक विशेष वर्ग के वोट बैंक पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए आरएसएस को केवल हिंदुओं का संगठन बता कर उसके खिलाफ आए दिन जहर उगला है। बेशक आरएसएस एक हिंदुत्ववादी विचारधारा वाला संगठन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका महान उद्देश्य सभी धर्मों और जातियों के लोगों में राष्ट्रप्रेम की भावना जागृत कर राष्ट्र को एकजुट और मजबूत बनाना है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आरएसएस की विचारधारा के विरोधी जो भी लोग आज राजनीति में मौजूद होकर जात-पात की राजनीति करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री जी से सीखना चाहिए कि उन्होंने देशहित के कार्यों में आरएसएस की दलगत राजनीति से ऊपर उठकर समय-समय पर प्रशंसा भी की है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत देश के सभी वर्गों और धर्मों के प्रमुखों के साथ मिलकर संघ के प्रति राजनीतिक दलों द्वारा जो दूषित धारणाएँ फैलाई गई थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें बहुत हद तक दूर कर संघ के सच्चे राष्ट्र हित के उद्देश्य से परिचित करवाकर अन्य धर्मों को भी संघ की विचारधारा से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देश इस वर्ष विजयादशमी के अवसर पर आरएसएस की स्थापना का शताब्दी वर्ष मना रहा है। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के मार्गदर्शन में देशभर में संघ के कार्यों से देश की नई पीढ़ी को अवगत कराने के कार्यक्रम जारी हैं। आरएसएस एक ऐसा सामाजिक संगठन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो जाति-धर्म के नाम पर टुकड़ों में बंटे और बिखरे लोगों को एकजुट करता है तथा उनमें अपने राष्ट्र की निस्वार्थ सेवा के लिए व्यक्ति निर्माण से लेकर राष्ट्र निर्माण तक का पाठ सिखाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आरएसएस की स्थापना भी सन </span>1925 <span lang="hi" xml:lang="hi">में विजयादशमी के दिन डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जी द्वारा इसी महान उद्देश्य को लेकर की गई थी। अपने सौ वर्षों के सफर में आरएसएस अपने कार्यकर्ताओं के समर्पण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">त्याग और अनुशासन के बल पर आज एक वटवृक्ष बनकर दुनिया के अस्सी से ज्यादा देशों में फैल चुका है।</span>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरसंघचालक श्री मोहन भागवत की अगुवाई में संघ अपना सौवां जन्मोत्सव पिछली विजयादशमी को मनाया गया उस ऐतिहासिक पल का समूचा दे साक्षी बना!  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष को पूरे वर्ष देशभर में हर्षोल्लास से मनाएगा और कार्यक्रमों के माध्यम से देश के विकास में संघ की भूमिका से उसके त्याग बलिदान और कर्तव्य निष्ठा से नवपीढ़ी को परिचित भी करवाएगा।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 18:29:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डैमोग्राफी बदलाव भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जनसांख्यिकीय बदलाव के कारणों के अध्ययन, अवैध प्रवासन की जांच और समाधान हेतु भारत सरकार ने हाल ही में जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता में एक हाई-लेवल कमेटी का गठन किया है। यह समिति राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक संतुलन पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन कर रही है।इसके अतिरिक्त, डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) का लाभ उठाने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए मुख्य कदम निम्नलिखित हैं. डीसीयुवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए स्किल इंडिया मिशन और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना  चलाई जा रही है।रोजगार और उद्यमिता  और मुद्रा योजना के माध्यम से स्वरोजगार को बढ़ावा दिया</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180812/demographic-change-is-a-serious-threat-to-indias-security"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जनसांख्यिकीय बदलाव के कारणों के अध्ययन, अवैध प्रवासन की जांच और समाधान हेतु भारत सरकार ने हाल ही में जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता में एक हाई-लेवल कमेटी का गठन किया है। यह समिति राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक संतुलन पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन कर रही है।इसके अतिरिक्त, डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) का लाभ उठाने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए मुख्य कदम निम्नलिखित हैं. डीसीयुवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए स्किल इंडिया मिशन और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना  चलाई जा रही है।रोजगार और उद्यमिता  और मुद्रा योजना के माध्यम से स्वरोजगार को बढ़ावा दिया जा रहा है।शिक्षा : नई शिक्षा नीति  2020 के तहत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें डेमोग्राफिक चेंज पर केंद्र सरकार ने हाई लेवल कमेटी का गठन किया है।   बता दें कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफिक चेंज और घुसपैठ बड़ा मुद्दा था। इस मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार का घेराव किया था। इसी आधार पर भाजपा ने विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मात दी और पूर्व बहुमत से सत्ता हासिल की। ऐसे में अब केंद्र सरकार द्वारा डेमोग्राफिक चेंज पर हाई लेवल कमेटी गठित करना अहम माना जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डेमोग्राफिक चेंज पर केंद्र सरकार ने हाई लेवल कमेटी का गठन किया है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार (26 मई 2026) को इसकी घोषणा की. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट कर कहा कि घुसपैठ और अन्य कारणों से किसी भी राष्ट्र के वर्तमान व भविष्य के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है. इसी चुनौती से निपटने के लिए 15 अगस्त 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डेमोग्राफिक चेंज पर 'हाई लेवल कमेटी' बनाने की घोषणा की थी. गृह मंत्री अमित शाह ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा, 'मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि सरकार ने इस कमेटी का गठन कर लिया है. जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में बनी इस कमेटी में जनगणना आयुक्त के साथ दुर्गा शंकर मिश्रा (रिटायर्ड आईएएस), बालाजी श्रीवास्तव (रिटायर्ड आईपीएस) और डॉ. शमिका रवि समिति के सदस्य होंगे. संयुक्त सचिव (फॉरेनर्स-I), गृह मंत्रालय, इस समिति के सदस्य सचिव होंगे.'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफिक चेंज और घुसपैठ बड़ा मुद्दा था. इस मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार का घेराव किया था. इसी आधार पर बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मात दी और पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल की. ऐसे में अब केंद्र सरकार द्वारा डेमोग्राफिक चेंज पर हाई लेवल कमेटी गठित करना अहम माना जा रहा है. </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको याद हो कि पीएम मोदी ने 15 अगस्त 2025 कहा था कि भारत अवैध घुसपैठ से निपटने के लिए जनसांख्यिकीय मिशन शुरू करेगा. उन्होंने लोगों को अवैध घुसपैठ के माध्यम से देश की जनसांख्यिकी को बदलने की सोची-समझी साजिश के बारे में चेतावनी दी और कहा कि कोई भी राष्ट्र घुसपैठियों को बर्दाश्त नहीं कर सकता, क्योंकि उन्होंने इस समस्या से निपटने के लिए एक उच्च स्तरीय जनसांख्यिकीय मिशन की घोषणा की.उनहोने कहा था आज देश के सामने एक चिंता, एक चुनौती के संबंध में आगाह करना चाहता हूं.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">षड्यंत्र के तहत, सोची समझी साजिश के तहत देश की डेमोग्राफी को बदला जा रहा है. एक नए संकट के बीच बोए जा रहे हैं और यह घुसपैठिए, मेरे देश के नौजवानों के रोजी-रोटी छीन रहे हैं. यह घुसपैठिए मेरे देश की बहन बेटियों को निशाना बना रहे हैं, यह बर्दाश्त नहीं होगा. यह घुसपैठिए भोले भाले आदिवासियों को भ्रमित करके उनकी जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं. यह देश सहन नहीं करेगा और इसलिए मेरे प्यारे देशवासियों जब डेमोग्राफी परिवर्तन होता है, सीमावर्ती क्षेत्रों में डेमोग्राफी में परिवर्तन होता है, तब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए संकट पैदा होता है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश की एकता, अखंडता और प्रगति के लिए यह संकट पैदा करता है. सामाजिक तनाव के बीज बो देता है और कोई देश अपना देश घुसपैठियों के हवाले नहीं कर सकता है. दुनिया का कोई देश नहीं कर सकता है, तो हम भारत को कैसे कर सकते हैं हमारे पूर्वजों ने त्याग और बलिदान से आजादी पाई है. हमें स्वतंत्र भारत दिया है, उन महापुरुषों के प्रति हमारा कर्तव्य हैं कि हम हमारे देश में ऐसी हरकतों को स्वीकार न करें, उनकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी और इसलिए मैं आज लाल किले को प्राचीर से कहना चाहता हूं.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हमने एक हाई पावर डेमोग्राफी मिशन शुरू करने का निर्णय किया है. यह मिशन, इस मिशन के द्वारा यह जो भीषण संकट नजर आ रहा है, भारत पर मंडरा रहा है यह जो संकट है, उसको निपटाने के लिए तय समय में सुविचारित निश्चित रूप से अपने कार्य को करेगा, उस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं.  भारत में धर्म के अनुसार जनसंख्या का प्रतिशत लगातार हिन्दू आबादी के गिरावट होने का संकेत देता है 1951 2011 2001 1991 1981 1971 1961 ह1951 हिंदू -4.30% 79.80% 80.50% 81.50% 82.30% 82.70% 83.50% 84.10% मुस्लिम 4.40% 14.20% 13.40% 12.60% 11.80% 11.20% 10.70% 9.80%।  1951 से 2011 तक की जनगणना में जो सभी धर्मों की जनसंख्या वृद्धि में असमानता दिखती है, उसका प्रमुख कारण घुसपैठ है. इस देश में 1951, 1971, 1991 और 2011 में जनगणना हुई, जिनमें शुरू से ही धर्म पूछने की परंपरा रही है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">1951 की जनगणना में हिंदू आबादी 84 प्रतिशत थी, जबकि मुस्लिम आबादी 9.8 प्रतिशत थी. 1971 में हिंदू आबादी 82 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी 11 प्रतिशत हो गई. 1991 में हिंदू आबादी 81 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी 12.2 प्रतिशत हो गई.वहीं, 2011 में हिंदू आबादी 79 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी 14.2 प्रतिशत हो गई. मुस्लिम आबादी में 24.6 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है, जबकि हिंदू आबादी में 4.5 प्रतिशत की कमी आई है. मोदी सरकार की घुसपैठ विरोधी 3डी नीति- पहचान करना मतदाता सूची से हटवाना , उन्हें वापस भेजना है. सबसे गौरतलब बात है कि भारत में मुस्लिम समुदाय की आबादी हिंदू आबादी की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रही है. साल 2010 में 14.4% से बढ़कर 2050 में 18.4% होने का अनुमान है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा था कि झारखंड की आदिवासी आबादी में गिरावट के पीछे बांग्लादेशी घुसपैठ का हाथ है. उन्होंने मांग की थी कि राज्य के कुछ हिस्सों के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों और बिहार के किशनगंज और कटिहार को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया जाए ताकि क्षेत्र में "बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों" की बढ़ती संख्या से उत्पन्न चुनौती से निपटा जा सके, जिसके कारण, उनके अनुसार, आदिवासी आबादी में काफी कमी आई है.</div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने ने लोकसभा में शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाया और कहा कि झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र में आदिवासियों की आबादी बांग्लादेशी घुसपैठियों की बढ़ती संख्या के कारण घट रही है. उन्होंने कहा कि संथाल परगना क्षेत्र में आदिवासी आबादी 2000 में 36% थी, जो अब घटकर 26% रह गई है. उन्होंने पूछा, 'ये आदिवासी कहां चले गए?'2014 से, भारत की सीमाओं पर घुसपैठ के 8,500 से अधिक प्रयासों का पता चला है, जबकि 20,000 से अधिक घुसपैठियों को गिरफ्तार किया गया है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर सुरक्षा, अर्थशास्त्र और नीति निर्माण के स्तर पर अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। केंद्र सरकार और सुरक्षा विश्लेषकों का एक वर्ग इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक संतुलन के लिए गंभीर चुनौती मानता है, जबकि अर्थशास्त्री और जनसांख्यिकी विशेषज्ञ इसे गिरती प्रजनन दर और बुजुर्ग होती आबादी से जुड़ी आर्थिक चुनौती के रूप में देखते हैं।इस विषय को मुख्य रूप से अलग-अलग दृष्टिकोणों के माध्यम से समझा जा सकता है: सुरक्षा और सामाजिक संतुलन का दृष्टिकोण इस दृष्टिकोण के तहत, देश के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों, विशेषकर सीमावर्ती इलाकों में हो रहे "अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय बदलाव" को एक बड़ा खतरा माना जाता है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, अवैध घुसपैठ और अनियमित प्रवासन के कारण सीमावर्ती राज्यों (जैसे असम, पश्चिम बंगाल, और बिहार) की जनसंख्या बनावट में असामान्य बदलाव आए हैं, जो कानून-व्यवस्था और संप्रभुता के लिए चिंता का विषय हैं।सरकार को गंभीरता से सख्त कदम उठाने चाहिए ।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 18:25:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>क्या पुतिन ने एक वाक्य में बदलती दुनिया का सच कह दिया?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास के कठिन दौर ही रिश्तों की असली परीक्षा लेते हैं। ऐसे समय में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत को </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया के सबसे भरोसेमंद साझेदारों में से एक” बताना महज़ कूटनीतिक वाक्य नहीं है। </span>4 <span lang="hi" xml:lang="hi">जून </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सेंट पीटर्सबर्ग में दिया गया उनका बयान ऐसे समय आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया नए राजनीतिक खाँचों में बँटती दिख रही है। प्रतिबंधों से घिरा रूस अपने विश्वसनीय मित्रों को पहचान रहा है और भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति से अलग सम्मान पा रहा है। पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180810/did-putin-tell-the-truth-of-the-changing-world-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/_113223674_gettyimages-1223723529.jpg.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास के कठिन दौर ही रिश्तों की असली परीक्षा लेते हैं। ऐसे समय में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत को </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">दुनिया के सबसे भरोसेमंद साझेदारों में से एक” बताना महज़ कूटनीतिक वाक्य नहीं है। </span>4 <span lang="hi" xml:lang="hi">जून </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सेंट पीटर्सबर्ग में दिया गया उनका बयान ऐसे समय आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया नए राजनीतिक खाँचों में बँटती दिख रही है। प्रतिबंधों से घिरा रूस अपने विश्वसनीय मित्रों को पहचान रहा है और भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति से अलग सम्मान पा रहा है। पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सराहना करते हुए भारत पर पश्चिमी दबाव को “निष्फल और प्रतिकूल” बताया। यह केवल मित्रता की प्रशंसा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत के बढ़ते महत्व की स्वीकारोक्ति है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शब्द अक्सर परिस्थितियों का आईना होते हैं। पुतिन की भारत-प्रशंसा को भी इसी संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। यूक्रेन संघर्ष के बाद रूस पश्चिमी प्रतिबंधों और राजनीतिक दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे समय में भारत उन विरले देशों में रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसने अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार रूस से संबंध बनाए रखे। न उसने किसी दबाव के आगे झुकना स्वीकार किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न अपनी विदेश नीति का मार्ग बदला। पुतिन भलीभांति समझते हैं कि भारत जैसा मित्र केवल आर्थिक सहयोगी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि कूटनीतिक संबल भी है। इसलिए उनका यह बयान प्रशंसा से अधिक उस विश्वास की अभिव्यक्ति है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस पर रूस भविष्य की अपनी रणनीति का एक महत्वपूर्ण आधार देखता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पुतिन के बयान का एक संभावित</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संकेत चीन की ओर भी है। रूस और चीन भले ही अटूट साझेदारी का दावा करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उनके संबंधों में रणनीतिक सतर्कता बनी रहती है। चीन की बढ़ती आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीकी और सैन्य शक्ति ने एशिया का शक्ति-संतुलन बदल दिया है। मॉस्को समझता है कि बीजिंग पर अत्यधिक निर्भरता उसकी स्वतंत्र भूमिका को सीमित कर सकती है। ऐसे में भारत के साथ मजबूत संबंध उसे संतुलन देते हैं। यही कारण है कि पुतिन ने ब्रह्मोस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा सहयोग और उन्नत सैन्य प्रौद्योगिकी साझेदारी का विशेष उल्लेख किया। इसे मुख्य रूप से</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चीन के विरुद्ध संदेश न मानकर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एशिया में शक्ति-संतुलन साधने की रूस की दीर्घकालिक कूटनीतिक रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी पहचान उसकी स्वतंत्रता है। यही कारण है कि रूस के राष्ट्रपति</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">व्लादिमीर पुतिन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने भारत पर पड़ रहे अमेरिकी दबाव के बीच उसकी नीति की सराहना की। अमेरिका लंबे समय से रूस से जुड़े ऊर्जा और रक्षा संबंधों को लेकर भारत को अपने अधिक निकट लाने का प्रयास करता रहा है। इसके बावजूद नई दिल्ली ने स्पष्ट किया है कि उसके निर्णय राष्ट्रीय हितों से संचालित होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसी बाहरी दबाव से नहीं। पुतिन ने इसी आत्मविश्वास की प्रशंसा करते हुए कहा कि भारत जैसे उभरते राष्ट्र पर दबाव डालना उलटा पड़ सकता है। उनका संदेश केवल वाशिंगटन के लिए नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरी दुनिया के लिए था कि भारत अब अपनी राह स्वयं तय करने वाली शक्ति है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक शक्ति उसका संतुलित और स्वतंत्र दृष्टिकोण है। भारत एक ओर रूस से ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा उपकरण और सामरिक सहयोग प्राप्त कर रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी ओर अमेरिका के साथ तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निवेश और सुरक्षा साझेदारी भी मजबूत कर रहा है। चीन से प्रतिस्पर्धा के बावजूद व्यापारिक संबंध भी बने हुए हैं। यही संतुलन भारत को वैश्विक राजनीति में अलग पहचान देता है। पुतिन ने मोदी सरकार की आर्थिक उपलब्धियों और तेज विकास दर की सराहना करते हुए संकेत दिया कि भारत अब किसी शक्ति-गुट का अनुसरण करने वाला देश नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विश्व राजनीति का एक स्वतंत्र और प्रभावशाली शक्ति केंद्र बन चुका है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत-रूस संबंध अब केवल कूटनीति तक सीमित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आर्थिक क्षेत्र में भी नई मजबूती हासिल कर रहे हैं। वित्तीय वर्ष </span>2024-25 <span lang="hi" xml:lang="hi">में दोनों देशों का व्यापार लगभग </span>68.7 <span lang="hi" xml:lang="hi">अरब डॉलर तक पहुंच गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें रूसी तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गैस और कोयले की प्रमुख भूमिका रही। पुतिन द्वारा </span>100 <span lang="hi" xml:lang="hi">अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य का उल्लेख इस बात का संकेत है कि रूस भारत को केवल मित्र नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक साझेदार मानता है। ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरिक्ष</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परमाणु सहयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा उत्पादन और उन्नत प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार विस्तार पा रहा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच दोनों देश एक-दूसरे की क्षमताओं को अपने विकास का महत्वपूर्ण आधार मान रहे हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मित्रता जितनी गहरी होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसकी चुनौतियां भी उतनी ही वास्तविक होती हैं। भारत-रूस संबंधों के सामने भी व्यापार असंतुलन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भुगतान व्यवस्था की बाधाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रक्षा खरीद में भारत की नई प्राथमिकताएं और रूस-चीन की बढ़ती निकटता जैसे प्रश्न मौजूद हैं। इसलिए पुतिन ने भारत-चीन सीमा पर तनाव कम करने के प्रयासों का स्वागत किया। यह केवल एक टिप्पणी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि रूस का यह संदेश था कि वह एशिया में स्थिरता और संतुलन का पक्षधर है। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह यह भरोसा भी दिलाना चाहता है कि चीन से उसके संबंध भारत के हितों की कीमत पर नहीं हैं। भारत के लिए यह आश्वासन महत्वपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि उसकी विदेश नीति का आधार केवल राष्ट्रीय हित हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व राजनीति में कुछ वक्तव्य तत्कालीन घटनाओं से आगे जाकर भविष्य की दिशा भी बताते हैं। पुतिन का भारत को “भरोसेमंद साझेदार” कहना ऐसा ही संकेत है। यह केवल भारत-रूस संबंधों की निकटता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आकार ले रही नई वैश्विक व्यवस्था की झलक है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एकध्रुवीय प्रभुत्व का दौर पीछे छूट रहा है और नई शक्तियां उभर रही हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ब्रिक्स का विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक दक्षिण का बढ़ता प्रभाव और भारत की भूमिका इसी परिवर्तन के संकेत हैं। रूस का यह सार्वजनिक विश्वास एक स्पष्ट संदेश देता है—भारत अब किसी समीकरण का हिस्सा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि स्वयं एक निर्णायक समीकरण है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए पुतिन का यह बयान केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था की स्पष्ट स्वीकारोक्ति है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 18:20:08 +0530</pubDate>
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                <title>नरेंद्र मोदी के नाम दर्ज होने जा रहा एक नया रिकॉर्ड</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है। यहाँ जनता समय</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर अपने नेताओं का चयन करती है और सत्ता परिवर्तन के माध्यम से लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत बनाती है। स्वतंत्रता के बाद से देश ने अनेक प्रधानमंत्रियों को देखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ नेता ऐसे रहे जिन्होंने केवल शासन नहीं किया बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा और स्वरूप को भी गहराई से प्रभावित किया। जवाहर लाल नेहरू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के बाद यदि किसी प्रधानमंत्री ने सबसे अधिक प्रभाव छोड़ा है तो वह नरेंद्र मोदी हैं। </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>2026</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180808/a-new-record-is-going-to-be-registered-in-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/178054939444.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है। यहाँ जनता समय</span>-<span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर अपने नेताओं का चयन करती है और सत्ता परिवर्तन के माध्यम से लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत बनाती है। स्वतंत्रता के बाद से देश ने अनेक प्रधानमंत्रियों को देखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ नेता ऐसे रहे जिन्होंने केवल शासन नहीं किया बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा और स्वरूप को भी गहराई से प्रभावित किया। जवाहर लाल नेहरू</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के बाद यदि किसी प्रधानमंत्री ने सबसे अधिक प्रभाव छोड़ा है तो वह नरेंद्र मोदी हैं। </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> का दिन इसी कारण राजनीतिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ऐसे रिकॉर्ड के साथ चर्चा के केंद्र में होंगे जो भारतीय राजनीति में उनके लंबे और प्रभावशाली सफर का प्रतीक माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नरेंद्र मोदी ने पहली बार </span>26<span lang="hi" xml:lang="hi"> मई </span>2014<span lang="hi" xml:lang="hi"> को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। उस समय भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था। यह जीत इसलिए ऐतिहासिक थी क्योंकि लगभग </span>30<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों बाद किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिला था। उस दौर में देश भ्रष्टाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक सुस्ती और राजनीतिक अस्थिरता जैसे मुद्दों से जूझ रहा था। जनता एक ऐसे नेतृत्व की तलाश में थी जो निर्णायक दिखाई दे और देश को नई दिशा दे सके। नरेंद्र मोदी ने विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुशासन और मजबूत नेतृत्व के नारों के साथ चुनाव अभियान चलाया और जनता ने उन्हें भारी समर्थन दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">2014<span lang="hi" xml:lang="hi"> की जीत केवल एक चुनावी विजय नहीं थी बल्कि भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत थी। लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहने वाली कांग्रेस पार्टी पहली बार इतनी कमजोर स्थिति में पहुँच गई। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय राजनीति की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी। नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व इस परिवर्तन का मुख्य केंद्र बन गया। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहचान पहले से ही एक विकासवादी नेता की बन चुकी थी और उसी छवि को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार मिला।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बाद </span>2019<span lang="hi" xml:lang="hi"> का लोकसभा चुनाव आया। सामान्यतः किसी सरकार के </span>5<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्षों के बाद सत्ता विरोधी लहर देखी जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पहले से भी अधिक सीटें जीत लीं। इस विजय ने यह स्पष्ट कर दिया कि मोदी केवल एक लोकप्रिय नेता नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व बन चुके हैं। </span>2019<span lang="hi" xml:lang="hi"> की जीत के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति और मजबूत हुई। जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद </span>370<span lang="hi" xml:lang="hi"> हटाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीन तलाक कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर उनकी सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए जिनका व्यापक राजनीतिक प्रभाव पड़ा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">2024<span lang="hi" xml:lang="hi"> के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह उपलब्धि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। लगातार तीन बार सत्ता में लौटना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आसान नहीं होता। इसके लिए केवल चुनावी रणनीति ही नहीं बल्कि व्यापक जनसमर्थन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजबूत संगठन और प्रभावी नेतृत्व की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि मोदी की तीसरी पारी को भारतीय राजनीति के बड़े घटनाक्रमों में गिना जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">10<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> को नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन को लेकर चर्चा इसलिए तेज है क्योंकि वे लंबे समय तक लगातार प्रधानमंत्री बने रहने वाले नेताओं की सूची में और अधिक मजबूत स्थिति प्राप्त करेंगे। भारतीय राजनीति में लंबे कार्यकाल का विशेष महत्व माना जाता है क्योंकि लोकतंत्र में जनता हर चुनाव में सरकार को बदलने का अधिकार रखती है। ऐसे में यदि कोई नेता लगातार वर्षों तक जनता का समर्थन बनाए रखता है तो यह उसकी राजनीतिक क्षमता और जनस्वीकार्यता को दर्शाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू लगभग </span>16<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ष </span>286<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिन तक लगातार प्रधानमंत्री रहे। यह रिकॉर्ड आज भी सबसे लंबा लगातार प्रधानमंत्रित्व माना जाता है। नेहरू ने </span>15<span lang="hi" xml:lang="hi"> अगस्त </span>1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> से लेकर </span>27<span lang="hi" xml:lang="hi"> मई </span>1964<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक देश का नेतृत्व किया। उनके सामने विभाजन की त्रासदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक कमजोरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्थाओं के निर्माण और अंतरराष्ट्रीय पहचान जैसी अनेक चुनौतियाँ थीं। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव मजबूत करने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वजनिक क्षेत्र के विकास और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने का प्रयास किया। आधुनिक भारत के निर्माण में उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर नरेंद्र मोदी ऐसे समय में प्रधानमंत्री बने जब भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था। उनके सामने चुनौती थी कि भारत को आर्थिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामरिक और तकनीकी दृष्टि से और अधिक शक्तिशाली बनाया जाए। मोदी ने राष्ट्रवाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक पहचान और मजबूत नेतृत्व को अपनी राजनीति का मुख्य आधार बनाया। उन्होंने विदेश नीति में भी सक्रियता दिखाई। अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फ्रांस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जापान और खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों को नई गति मिली। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली दिखाई देने लगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मोदी सरकार के दौरान अनेक कल्याणकारी योजनाएँ भी शुरू की गईं। जन धन योजना के माध्यम से करोड़ों लोगों के बैंक खाते खोले गए। उज्ज्वला योजना के अंतर्गत गरीब परिवारों को गैस कनेक्शन उपलब्ध कराए गए। आयुष्मान योजना के जरिए गरीबों को स्वास्थ्य सुरक्षा देने का प्रयास हुआ। स्वच्छ भारत अभियान ने स्वच्छता को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया। कोरोना महामारी के दौरान मुफ्त राशन योजना ने करोड़ों लोगों को राहत दी। इन योजनाओं ने गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के बीच मोदी सरकार की लोकप्रियता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि विपक्ष लगातार सरकार की आलोचना भी करता रहा है। बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि संकट और सामाजिक तनाव जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश की गई। कई विश्लेषकों का मानना है कि आर्थिक असमानता अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराना आने वाले समय में सरकार के सामने सबसे कठिन कार्यों में से एक होगा। किसान आंदोलन ने भी यह दिखाया कि बड़े जनसमूह सरकार की नीतियों का विरोध कर सकते हैं। लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद नरेंद्र मोदी की राजनीतिक लोकप्रियता लंबे समय तक बनी रही।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय जनता पार्टी की संगठनात्मक शक्ति भी मोदी की सफलता का एक बड़ा कारण रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का विशाल कार्यकर्ता तंत्र बूथ स्तर तक सक्रिय रहता है। चुनाव प्रबंधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रचार अभियान और मतदाताओं तक सीधा संपर्क भाजपा की विशेषता बन चुके हैं। इसके अलावा विपक्ष की एकजुटता की कमी ने भी भाजपा को लाभ पहुँचाया। कई राज्यों में विपक्षी दल आपसी मतभेदों के कारण मजबूत चुनौती प्रस्तुत नहीं कर सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक राजनीति में संचार माध्यमों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। नरेंद्र मोदी ने डिजिटल माध्यमों का प्रभावी उपयोग किया। सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता ने उन्हें युवाओं और नए मतदाताओं से सीधे जोड़ने में सहायता की। रेडियो कार्यक्रमों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वीडियो संदेशों और विशाल जनसभाओं के माध्यम से उन्होंने लगातार जनता के साथ संवाद बनाए रखा। यह शैली पहले के प्रधानमंत्रियों से अलग मानी जाती है। नेहरू के समय में संचार के साधन सीमित थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि आज राजनीति का बड़ा हिस्सा डिजिटल मंचों पर भी संचालित होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास केवल आँकड़ों से नहीं बनता बल्कि जनमानस की स्मृतियों से भी बनता है। जवाहर लाल नेहरू को आधुनिक भारत की संस्थाओं के निर्माण के लिए याद किया जाता है। इंदिरा गांधी को निर्णायक नेतृत्व और राजनीतिक साहस के लिए जाना जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी को संवाद और सहमति की राजनीति का प्रतीक माना जाता है। नरेंद्र मोदी की छवि एक ऐसे नेता की बनी है जिसने भारतीय राजनीति को अत्यधिक केंद्रीकृत नेतृत्व की दिशा दी और राष्ट्रवाद को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में स्थापित किया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">10<span lang="hi" xml:lang="hi"> जून </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह दिन भारतीय राजनीति में नेतृत्व की निरंतरता और बदलते जनादेश दोनों का प्रतीक बन रहा है। लोकतंत्र में लंबे समय तक सत्ता में बने रहना असाधारण उपलब्धि माना जाता है। यह केवल चुनावी जीत नहीं बल्कि जनता के विश्वास का संकेत भी होता है। नरेंद्र मोदी के समर्थक इसे मजबूत नेतृत्व की विजय मानते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि आलोचक इसे भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व आधारित राजनीति के बढ़ते प्रभाव के रूप में देखते हैं। लेकिन दोनों पक्ष इस बात से सहमत दिखाई देते हैं कि पिछले एक दशक से अधिक समय में भारतीय राजनीति का केंद्र नरेंद्र मोदी ही रहे हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य में इतिहास नरेंद्र मोदी के कार्यकाल का मूल्यांकन कई आधारों पर करेगा। आर्थिक विकास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक समरसता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विदेश नीति की उपलब्धियाँ और आम नागरिक के जीवन में आए बदलाव इन सबके आधार पर उनके शासन को परखा जाएगा। यदि आने वाले वर्षों में भारत आर्थिक और तकनीकी शक्ति के रूप में और मजबूत होता है तो मोदी के कार्यकाल को विशेष महत्व दिया जाएगा। वहीं यदि बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगाई और सामाजिक असंतोष जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं तो आलोचनाएँ भी तेज होंगी। यही लोकतंत्र की विशेषता है कि किसी भी नेता का अंतिम मूल्यांकन इतिहास और जनता दोनों मिलकर करते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार </span>10 <span lang="hi" xml:lang="hi">जून </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल एक तारीख नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण दौर का प्रतीक बनने जा रही है। यह दिन उस राजनीतिक यात्रा की याद दिलाता है जिसमें एक साधारण परिवार से निकला व्यक्ति देश का सबसे प्रभावशाली नेता बनता है और लगातार वर्षों तक सत्ता में बना रहता है। नेहरू से मोदी तक की यह यात्रा भारतीय लोकतंत्र की शक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जनता के बदलते विश्वास और नेतृत्व की निरंतर बदलती परिभाषा को भी दर्शाती है। भारतीय राजनीति में रिकॉर्ड बनते और टूटते रहेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो इतिहास में स्थायी रूप से दर्ज हो जाते हैं। </span>10 <span lang="hi" xml:lang="hi">जून </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को लेकर चल रही चर्चा भी भारतीय लोकतंत्र के ऐसे ही एक ऐतिहासिक क्षण की ओर संकेत करती है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 18:18:22 +0530</pubDate>
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