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                <title>विचारधारा - Swatantra Prabhat</title>
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                            <item>
                <title>मौसम परिवर्तन जल की कमी मिट्टी का कटाव परिवेश में हमारे किसान और कृषि पर संकट बढ़  रहा है, कृषि वैज्ञानिक - प्रोफेसर प्यारेलाल</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">दया शंकर त्रिपाठी।</p><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> हिमाचल प्रदेश में राजकीय कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे डॉक्टर अशोक कुमार प्यारेलाल ने कहा है कि मौसम परिवर्तन जल की कमी मिट्टी का कटाव परिवेश में हमारे किसान और किसी  पर संकट बढ़ रहा है। लगातार जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के मध्य नजर कृषि पर इसका क्या असर पड़ेगा इस संबंध में उन्होंने इलाहाबाद ब्यूरो के प्रमुख दयाशंकर त्रिपाठी से विस्तार से बातचीत की जिस पर उन्होंने कृषि पर पड़ने वाले दुष्परिणाम के कई कारण बताएं।उन्होंने कहा की जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण वनों की कटाई और जैव विविधता का ह्रास जैसी पर्यावरणीय चुनौतियां अब दूर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180800/climate-change-water-shortage-soil-erosion-the-crisis-on-our"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260605-wa0071.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दया शंकर त्रिपाठी।</p><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> हिमाचल प्रदेश में राजकीय कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे डॉक्टर अशोक कुमार प्यारेलाल ने कहा है कि मौसम परिवर्तन जल की कमी मिट्टी का कटाव परिवेश में हमारे किसान और किसी  पर संकट बढ़ रहा है। लगातार जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के मध्य नजर कृषि पर इसका क्या असर पड़ेगा इस संबंध में उन्होंने इलाहाबाद ब्यूरो के प्रमुख दयाशंकर त्रिपाठी से विस्तार से बातचीत की जिस पर उन्होंने कृषि पर पड़ने वाले दुष्परिणाम के कई कारण बताएं।उन्होंने कहा की जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण वनों की कटाई और जैव विविधता का ह्रास जैसी पर्यावरणीय चुनौतियां अब दूर की समस्या नहीं रही यह सब सीधे हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित कर रही हैंजैसे अत्यधिक मौसम परिवर्तन जल की कमी मिट्टी का कटाव और घटती वायु गुणवत्ता।ऐसे परिवेश में हमारे किसान और कृषि पर संकट बढता जा रहा है।</p><p style="text-align:justify;">मौसम के बदलते तेवर से  किसानों बागवानो को  जहां बहुत अधिक लाभ  नहीं होने वाला है। वहीं दूसरी तरफ इस साल का मानसून आम जनता को  भी  परेशान करेगा। एक अनुमान के अनुसार इस साल सामान्य से कम वर्षा होगी और साथ में अल नीनो का प्रभाव  बहुत  ख़तरनाक होगा सूखा और गर्मी   बढ़ेगी जिसके कारण खरीफ की फसलों का उत्पादन काम होगा विशेष तौर पर उन क्षेत्रों में जहां फसलों की सिंचाई की सुविधा नही है वहां पर बिजाई देर से होगी।और उत्पादन भी कम होगा।और देश में महंगाई बढ़ेगी । आमदनी पिछले साल की अपेक्षा इस साल कम हहोगी।<br /></p><p style="text-align:justify;">आज विश्व का हर देश ईरान इजरायल अमेरिका युद्ध से भयंकर महंगाई के मोहाने पर खड़ा हो गया है। परन्तु युद्ध लड़ने वालों को मौसम मानसून  महंगाई और जनता से सरोकार नहीं है।  बस अपने को शक्तिशाली दिखाने की होड़ विश्व पटल पर लगी है कि मैं महान विजेता हूं ।इस युद्ध से भारत भी बहुत बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है।देश में महंगाई बढ़ रही है ऊर्जा का दाम बढ़ रहा है।तो वहीं यह मानसून भारत पर अलग तरह से कहर बरपाने का संकेत देकर भारत की गरीब जनता को और गरीबी में जीने के लिए मजबूर कर रहा है</p><p style="text-align:justify;">भारत को तीन  तरफ से मार पड़ेगा ।खराब मानूसन  खाद  की कमी और ऊर्जा ।भले टी वी डिवेट  पर सरकार के समर्थक  लोग आंकड़ों के जाल में जनता को फंसाते रहे परन्तु सच्चाई इन  आंकड़ों से इतर है। युद्ध कब तक चलेगा यह अगस्त या आगे तक भी चल सकता है फिर देश में नोट बन्दी की तरह हर चीज पर प्रतिबंध जैसे बैंकों से कम रुपया निकालना तेल गैस पर प्रतिबंध हर चीज का सीमित उपयोग।आदि  क ई तरह के उपाय करने पड़ सकते हैं। खाद के संकट को देखते हुए कृषि मंत्रालय ने एक जुन से तीस जुन तक खेत बचाओ अभियान शुरू करने जा रहा है जिसमे कृषि वैज्ञानिक किसानों को रासायनिक खाद का उपयोग कम करने हरी खाद को बढ़ावा देने याद गोबर की खाद का अधिक उपयोग करने के फायदे बतायेंगे ।</p><p style="text-align:justify;">किसानों को अपने खेत की कम होती उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए कौन-सा सही तरीका लाभ कारी होगा साथ में खेती में लागत कम लगे और उत्पादन बढे यह एक सही कदम है।अब किसानों को आधुनिक खेती के साथ पुरानी खेती को अपनाने की जरुरत है जिसमें हरी खाद कमृपोष्ट खाद का बहुत महत्व है परन्तु बहुत से छोटे मझोले किसानों के पास पशुधन यानि बैल गाय भैंस नहीं के बराबर है जिससे गोबर की खाद बनेऔर खेत बचे साथ में उत्पादन भी बढ़े।सत्तर के दशक में कम्पोस्ट खाद बनाने की सरकार द्वारा योजना चला ई ग ई किसानों ने  गोबर गैस  प्लांट लगवाया खाद का उपयोग किया खेती से मजदुरो का पलायन होना शुरू हुआ पशुधन कम हुए तो गोबर गैस प्लांट बंद होते गये।अब खेती ट्रैक्टर रासायनिक खाद पर निर्भर है।</p><p style="text-align:justify;">हिमाचल के साथ देश भर में पिछले दो महीने से रुक रुक कर बे मौसमी बारिश ओला तेज हवा के कारण किसानों को काफी नुकसान पहुंचा है । जनहानि भी हुई है।मौसम की यह बेरूखी  ऊपरी हिमाचल में सेव  के किसानों और अन्य फल के किसानों को भारी नुकसान पहुंचाया है  । यह भी  एक अनुमान है कि हिमाचल प्रदेश वर्ष में 5000 से 6000 करोड़ का सेव  का कारोबार  हर साल होता है। जो इस साल  बे मौसम बरसात ओलावृष्टि से सेव का उत्पादन कम होने का अनुमान है। जिसके कारण  किसानों को 1500 से 2000 करोड़ का नुकसान होगा।  कम पैदावार का नुकसान आम जनता को भी उठाना पड़ता है कि फल सब्जियां अनाज दूध तेल सब महगे दामो  पर बिकेंगे गरीब और गरीब होता जाएगा व्यापारी अमीर होता जाएगा।<br /></p><p style="text-align:justify;">आईएमडी के अनुसार बरसात  कम हो सकती है प्रशांत महासागर  में अल नीनो का प्रभाव बढ़ रहा   है। मानसून इस साल जल्दी आयेगा ।उत्तर और मध्य भारत में कम बारिश हो सकती है खेती में फसलों के साथ फल  जैसे सेव  नाशपाती  का उत्पादन के साथ  बिजली उत्पादन कम हो सकता है।  मानसून कमजोर होने पर सीधा असर  फसलो  किसानों की आय और खाद्यान्न की कीमतों पर पड़ता है।   कमजोर मानसून से कम पैदावार होगी खरीफ की फसलों के साथ सब्जी फल  महंगें होगे। सिंचाई की लागत भी बढेगी सरकार का प्रयास रहा है कि जल संचयन को बढ़ावा  जाए।  यह प्रयास बहुत अच्छा नहीं हो पाया गांव-गांव अमृत सरोवर बन रहा है।  परंतु लाभ उतना नहीं मिलता है जितनी उम्मीद सरकार कर रही है अमृतसरोवर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है यदि किसानों को यह जानकारी पहले से हो कि मानसून कमजोर है और कम वर्षा होगी तो  अधिक पानी की फसलों की जगह कम पानी की फसलो जैसे बाजार ज्वार मक्का उड़द मूंग  तिल अन्य मिलट की फसलों की बिजाई करने से बहुत लाभ हो सकता है ।  </p><p style="text-align:justify;">सरकार को इन फसलों की खरीद  को भी सुनिश्चित करना होगा।  अरहर  मूग उड़द बाजरा के साथ मिश्रित खेती अधिक लाभकारी होगी ।जब मानसून कमजोर होता है तब इस तरह की खेती किसानों के लिए लाभदायक होती  है। इस वर्ष   ओलावृष्टि वारिस जो  हिमाचल और भारत के अन्य प्रदेशों में हो रही है।  जिसके परिणामस्वरूप  सबसे ज्यादा सेवव फल   उत्पादक किसान प्रभावित हो रहे हैं ।इस बदले मानसून से हिमाचल  मे सेव  का उत्पादन 50 से 70% कम होगा। बे मौसमी  बारिश से सेव  के पौधों में फूल काम हो गए हैं । मधुमक्खियां  से परगण भी काम हुआ है ।  हिमाचल में ढाई लाख परिवार बागवानी विशेष तौर पर सेव के ऊपर  निर्भर है।<br /></p><p style="text-align:justify;">भारत कृषि प्रधान देश है खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर  है तो दूध उत्पादन में पहले पायदान पर दुनिया में टिका हुआ है । सब्जी फल उत्पादन में भी दुनिया में अपना स्थान बनाया हुआ है।  परंतु अभी तक हमारे वैज्ञानिकों ने मौसम के अनुकूल या कम बारिश होने पर उस तरह के बीजों का ईजाद नहीं कर पाए हैं जो कम पानी में अधिक पैदावार दे सके। कुछ किस्में हैं  परन्तु उतना लाभदायक नहीं है। कमजोर मानसुन होने पर खाघानो के साथ फल सब्जियों का उत्पादन कम न हो । और देश में कम उत्पादन के कारण महंगाई न बढ़े परन्तु ऐसा नहीं हो पा रहा है।</p><p style="text-align:justify;"> किसानों को भी खेती से घाटा न हो वह भी  राहत महसुस करें कि कमजोर मानसून होने पर आय कम नहीं होंगी बस फसल बदल दे तो निश्चित ही आय होगी। यह देखा गया है कि धान लगाने वाला किसान जल्दी फसल नहीं बदलते है । वह धान पर ही टिका रहता है धान में अधिक सिंचाई के कारण लागत बढ़ जाता है।बाजार में सही मूल्य नहीं मिलता  है।तब किसानो  को नुकसान उठाना ही होता है ।अगर मानुसन के अनुरूप किसान सही फसल का चयन कर लेता है तो कभी भी किसान नुकसान में नहीं होगा बस उसके उत्पाद का सही बाजार मूल्य सरकार दे।<br /></p><p style="text-align:justify;">खरीफ के मौसम में  अधिकांश तौर पर पंजाब हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश राजस्थान के किसान धान की खेती करते हैं कम बारिश के कारण धान की खेती में अधिक सिंचाई की जरूरत होगी जो महंगे डीजल के कारण पैदावार में लागत  मूल्य को बढ़ाता है।बाजार में मूल्य कम मिलता है। कमजोर मानसून से होने वाले नुकसान से बचने के लिए बस मोटे अनाजों की खेती है  एक मात्र सही उपाय है।जिसमें पानी की बहुत कम जरुरत होती है। मिश्रित खेती जैसे बाजरा उड़द अरहर बाजरा अहरह उड़द की खेती लाभ कारी होगी।। </p><p style="text-align:justify;">इस तरह की खेती से डीजल और  बिजली की बचत भी हो सकती है।  साथ में रसायनिक खाद की जरुरत भी कम पड़ती है।इस वर्ष किसानों पर तीन तरह से   मार पड़ेगी पहली मार कि मानसुन कमजोर है। बारिश कम होंगी। दुसरी मार खाद भी कम मात्रा में मिलेगा।  तीसरा ऊर्जा की कमी ।कारण ईरान अमेरिका इजरायल युद्ध से देश में यूरिया के साथ साथ पोटाश फास्फोरस जैसे खादों का जो आयात होता वह भी कम होगा जिससे किसानों को खरीफ के फसलों के लिए भरपूर रसायनिक खाद नहीं मिलेगा।</p><p style="text-align:justify;">पिछले साल देश ने बड़े शोर के साथ मोटे अनाजों के उत्पादन और उपयोग पर बहुत गोष्ठी और सेमीनार करके किसानों को जागरूक किया और इन मोटे अनाजों के उपयोग से लाभ के बारे में भी खुब चर्चा हुई परन्तु उत्पादन बढ़ा कितना इस पर बात उसके बाद नही हुआ। नहीं यह बताया गया कि देश में क्या यह भोजन की थाली में आया या बस पशुचारा में गया मुफ्त अनाज योजना में मोटे अनाज को वितरित किया गया परन्तु अधिकांश परिवारो  को जो मुफ्त में दिया गया उसे बाजार में बेच दिये।अब देश को मुफ्त अनाज वितरण को बन्द करें।<br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 23:16:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>होली एआई रे…</title>
                                    <description><![CDATA[जानिए कैसे डिजिटल युग में रंगों से ज़्यादा फ़िल्टर और डेटा का त्योहार बन गई है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/171996/holi-ai-re%E2%80%A6"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/img_20260301_114028.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:left;"><strong>      होली <span style="color:rgb(224,62,45);">एआई</span> रे… </strong></h1>
<h5 style="text-align:center;"><span style="background-color:rgb(241,196,15);"><strong>रंगों से ज़्यादा <span style="color:rgb(224,62,45);">फ़िल्टर</span> का त्योहार</strong></span></h5>
<p style="padding-left:40px;"> </p>
<p>होली आई रे… नहीं साहब, इस बार होली <span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>एआई</strong></span> रे!</p>
<p>अब न पिचकारी असली रही, न रंग असली—सब कुछ “अपडेटेड वर्ज़न” में आ गया है। मोहल्ले की गली में अबीर-गुलाल कम और मोबाइल के कैमरे ज़्यादा उड़ते दिखाई देते हैं। पहले लोग होली पर गले मिलते थे, अब “फेस रिकॉग्निशन” से पहचानते हैं—“अरे तुम ही हो न? वही जो पिछले साल मेरे ऊपर पक्का रंग डालकर भाग गए थे?” अब बदला भी डिजिटल हो गया है। एआई बता देता है कि किसने किस पर कितना रंग लगाया और किसने फोटो में कितनी मुस्कान एडिट की।कहते हैं होली बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। भक्त प्रह्लाद की भक्ति और होलिका के दहन की कथा हम बचपन से सुनते आए हैं। पर आजकल लगता है कि असली होलिका तो हमारी प्राइवेसी है, जो हर साल सोशल मीडिया की अग्नि में स्वाहा हो जाती है।अब देखिए, पहले मथुरा-वृंदावन की होली की चर्चा होती थी, लोग मथुरा और वृंदावन जाने का सपना देखते थे। अब सपना यह होता है कि “रील” वायरल हो जाए। रंग से ज्यादा फिक्र इस बात की होती है कि वीडियो पर कितने व्यूज़ आए। कोई गुलाल लगाने से पहले पूछता है—“भाई, कैमरा ऑन है न?”एआई का कमाल देखिए—अब होली की शुभकामनाएँ भी इंसान नहीं, “चैटबॉट” लिखते हैं। एक क्लिक में सौ लोगों को एक जैसा संदेश—“रंगों का त्योहार आपके जीवन में खुशियों की बहार लाए।” बहार तो ठीक है, पर मौलिकता का क्या?मोहल्ले के शर्मा जी ने इस बार “स्मार्ट पिचकारी” खरीदी है। कहते हैं इसमें सेंसर लगा है—जो सामने वाले के कपड़ों की कीमत पहचानकर उसी हिसाब से रंग की मात्रा तय करता है। महंगे कपड़े पर हल्का गुलाल, सस्ते पर पूरा टैंक खाली! तकनीक का न्याय भी बड़ा विचित्र है।बच्चे अब कीचड़ में नहीं कूदते, वे “वर्चुअल होली गेम” खेलते हैं। स्क्रीन पर रंग उड़ाते हैं और असली कपड़े साफ रखते हैं। मां-बाप भी खुश—न कपड़े धुलेंगे, न गली में शिकायत आएगी।</p>
<p>और नेताओं की होली? वह भी एआई-प्रूफ हो गई है। भाषण पहले से ही “डेटा एनालिसिस” से तैयार—किस मोहल्ले में कितनी मिठास घोलनी है, किस वर्ग पर कितना रंग डालना है, सब एल्गोरिद्म तय करता है।पर इस व्यंग्य के बीच एक सच भी छिपा है—तकनीक ने सुविधाएँ दी हैं, पर त्योहार की आत्मा अभी भी दिलों में बसती है। होली का असली रंग तब चढ़ता है जब रूठे मन मान जाते हैं, जब बिना फिल्टर की हँसी गूंजती है, जब रिश्तों की पिचकारी सच्चे स्नेह से भीगती है।तो आइए, इस बार “होली एआई रे…” कहते हुए भी इंसानियत का रंग फीका न पड़ने दें। तकनीक का आनंद लें, पर रिश्तों को ऑफलाइन ही रखें। क्योंकि असली होली वही है, जो दिल से खेली जाए—बिना डेटा पैक और बिना एडिट के।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Mar 2026 11:57:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sachin Bajpai]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिल्ली जाइए, स्वर्ग का रास्ता दिल्ली होकर जाता है!</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">आजकल हमारे देश में सब काम भगवान भरोसे चल रहा है। भगवान भरोसे इसलिए कि दुनिया के इस कोने में जितने भगवान हैं और अंधभक्त बनकर उसको मानने वाले लोग, दुनिया के किसी और कोने में नहीं मिलेंगे। धर्म प्रधान देश है, तो धत्कर्म भी होना ही है।<img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-01/1006642573.jpg" alt="1006642573" width="1200" height="800" /> वरना बताईए, किस देश का प्रधानमंत्री ऐसा बहुरूपिया होगा, जैसा हमारे देश का है। हाथ में त्रिशूल लिए, डमरू बजाते  भोले शंकर का बाना धरे दुनिया के किसी और नेता का फोटो-वोटो बताईए! इतना धर्मभक्त प्रधानमंत्री, जो दिन के 18-18 घंटे इस देश के सांस्कृतिक स्वाभिमान को जगाने के काम में लगा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/166513/go-to-delhi-the-way-to-heaven-goes-through-delhi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/1006721897.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">आजकल हमारे देश में सब काम भगवान भरोसे चल रहा है। भगवान भरोसे इसलिए कि दुनिया के इस कोने में जितने भगवान हैं और अंधभक्त बनकर उसको मानने वाले लोग, दुनिया के किसी और कोने में नहीं मिलेंगे। धर्म प्रधान देश है, तो धत्कर्म भी होना ही है।<img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-01/1006642573.jpg" alt="1006642573" width="1200" height="800"></img> वरना बताईए, किस देश का प्रधानमंत्री ऐसा बहुरूपिया होगा, जैसा हमारे देश का है। हाथ में त्रिशूल लिए, डमरू बजाते  भोले शंकर का बाना धरे दुनिया के किसी और नेता का फोटो-वोटो बताईए! इतना धर्मभक्त प्रधानमंत्री, जो दिन के 18-18 घंटे इस देश के सांस्कृतिक स्वाभिमान को जगाने के काम में लगा हो, उसे एक ट्रेन के 3 घंटे रुकने के लिए कोसना कितनी बड़ी असभ्यता है! निश्चित ही, यह धर्म विरोधी विपक्ष का काम है, जो दीन-दुनिया के हर काम-धाम में प्रधानमंत्री को कोसने के मौके खोजते रहता है। अब बताईए भला, ट्रेन को सही समय पर चलाना ड्राइवर का काम है या प्रधानमंत्री का?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">खबर केवल इतनी-सी है कि समस्तीपुर से सहरसा तक जाने वाली 63348 नंबर की ट्रेन 12:45 बजे समस्तीपुर से रवाना हुई। यह ट्रेन भगवानपुर देसुआ से 12:57 में खुली, लेकिन भगवानपुर से निकलने के बाद और अंगार घर स्टेशन पहुंचने से पहले, बीच रास्ते में ब्रेक वैन का एक्सल लॉक हो गया और चलती ट्रेन के पहिए रुक गए। इस तकनीकी खराबी के कारण वहां ट्रेन लगभग 3 घंटे खड़ी रही। फिर एक्सीडेंट रिलीफ ट्रेन (आर्ट) मौके पर पहुंची, जिस पर कैरिज एंड वैगन स्टाफ तथा यांत्रिकी विभाग के अधिकारी-कर्मचारी सवार थे। उन्होंने युद्धस्तर पर मरम्मत कार्य किया, खराबी दूर की, ठोक-बजाकर ब्रेक वैन का ठीक होना घोषित किया। फिर ट्रेन वहां से रवाना हुई। तब तक के लिए ट्रेनों का आवागमन दोनों ओर से पूरी तरह बंद रहा। केवल समयबद्धता बनाए रखने के उद्देश्य से राजधानी एक्सप्रेस को बरौनी जंक्शन होते हुए समस्तीपुर के रास्ते डाइवर्ट किया गया। इस पूरी घटना और कार्यवाही की जानकारी देते हुए रेलवे ने प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की और यात्रियों को हुई असुविधा के लिए खेद व्यक्त किया है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस खबर को सकारात्मक ढंग से देखना चाहिए। देखिए, भगवान की कितनी कृपा बरस रही है। पहली बात तो यह कि इस ट्रेन की किसी और ट्रेन से भिड़ंत नहीं हुई। हमारे देश का विपक्ष मोदीजी की रेल को बदनाम करने के लिए आजकल यही काम करवा रहा है। लेकिन विपक्ष का ऐसा दांव यहां फेल हो गया और किसी भी तरह के जान-माल का नुकसान नहीं हुआ। जान बची, सो लाखों पाएं। सरकार की तिजोरी से भी मुआवजा के रूप में माल निकलने से बच गया। इस माल को देश के विकास के लिए अडानी को सौंपा जा सकता है। इससे अर्थव्यवस्था का इंजन आगे बढ़ेगा और चौथी से तीसरी सीढ़ी पर पहुंचने की हमारी रफ्तार तेज होगी। यह तो हुआ पहला दृष्टिकोण।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब दूसरे सकारात्मक दृष्टिकोण पर आईए। इंजन के फेल होने या न होने पर मोदी सरकार का बस नहीं है। भगवानपुर में भगवान समाया हुआ है। भगवान और खासकर हिंदुओं का भगवान सर्वशक्तिमान है। हमारे भगवान के गॉड और अल्लाह से भी ज्यादा शक्तिमान होने की चर्चा आजकल गली-कूचों में चल रही है। हमारा भगवान यहां-वहां अपनी शक्ति प्रदर्शन के जरिए इसके नमूने भी दिखा रहा है। अच्छी तरह से समझ लीजिए कि हमारे मोदीजी ऐसे ही डमरू नहीं बजा रहे हैं। अब यह भगवानपुर में विराजमान भगवान की मर्जी है कि वह किस ट्रेन को आगे जाने दे या न जाने दे या आगे ले जाकर कहां रोके! सो, अंगारघर से पहले शीतलता देने उसने ट्रेन रोक दी, ताकि थके हुए यात्री ट्रेन से उतरकर पेड़ों की छांव में कुछ सुस्ता लें, कुछ सूसू-वुसू आदि भी कर लें। शरीर हल्का होने से मन भी हल्का हो जाता है और मन हल्का होने से ताजगी आती है। ट्रेन के खड़ी होने की खबर से पास के गांव के लोग कुछ भजिए-समोसे भी तलकर ले आते हैं, उससे सस्ते में ही कुछ को पेट पूजा का, तो कुछ को अपने चटोरेपन को संतुष्ट करने का भी मौका मिल जाता है। भारतीय रेल गरीबों का जितना खयाल रखती है, अमेरिकी रेल भी अपने अमीरों का उतना खयाल नहीं रखती होगी। भगवानपुर के साथ-साथ मोदीजी को इसके लिए धन्यवाद देना तो बनता ही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब तीसरे सकारात्मक दृष्टिकोण पर आईए। ट्रेन का रुकना हमारे अंक ज्योतिष के सही होने का सबसे बड़ा प्रमाण है। इस मामले में सब कुछ तीन पर टिका है और कहावत ऐसे ही नहीं बनी है, तीन तिग़ाड़ा, काम बिगाड़ा! ट्रेन रुकी किलोमीटर संख्या 75/3 पर। अंकों का योग होता है 15 और फिर इनका योग 6 होता है। ट्रेन नंबर है 63348 और इसके अंकों का भी अंतिम योग 6 होता है।  ट्रेन चली 12:45 बजे याने 3 का योग। अटकी 12:57 पर -- फिर 6 अंतिम योग। गार्ड ब्रेक वैन का नंबर 198732, फिर 3 का योग। पूरा मामला 3 के मूलाधार पर टिका है। जहां मामला ही 3 की अशुभ संख्या का हो, वहां मोदीजी शंकर का रूप धरे या राम का, कुछ हो नहीं सकता -- होंहिहैं वोही जो राम रचि राखा। यह अंक ज्योतिष हैं, जिसके सामने पश्चिम का पूरा गणित फेल हैं। इस घटना ने हमारे सनातनी ज्ञान की बिना किसी तनातनी के फिर पुष्टि कर दी है। सनातन जिंदाबाद!</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इधर सनातनी धीरेन्द्र शास्त्री ने सरकार को तीन के प्रकोप से बचने की सलाह दी है। धीरेन्द्र शास्त्री की महिमा जान लें कि वे अघोषित सरकार हैं। सरकार से भी बड़े सरकार, जिन्हें और जिनके चेलों-चपाटों को ढोने के लिए उच्च स्तर पर, गैर-कानूनी तरीके से विमानों का इंजाम किया जाता है। धीरेन्द्र शास्त्री की सलाह से सरकार कैसे करे इंकार! सो, रेलवे मिनिस्ट्री के निर्देश पर पूरा रेल महकमा तीन के प्रकोप को दूर करने में लगा है। एक-एक ट्रेन का नंबर देखा जा रहा है, किस स्टेशन पर कितने समय पहुंचती है और किस समय पर प्रस्थान करती है। ये सब नंबर और समय कहीं तीन के मूलाधार कर तो नहीं टिके हैं, टिके हैं, तो कैसे इसे बदला जाएं, आदि-इत्यादि। काम कोई छोटा-मोटा नहीं है, बाकायदा एक आयोग के गठन की मांग करता है। इसकी रिपोर्ट 2046 तक अपेक्षित होगी, ताकि दुर्घटना-मुक्त रेल के रूप में 2047 की पंद्रह अगस्त को हम विकसित भारत में प्रवेश कर सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सकारात्मक दृष्टिकोण का चौथा एंगल भी देखिए। दुर्घटना हुई नहीं कि हमारी रिलीफ ट्रेन तकनीज्ञों को लेकर पहुंच गई दुर्घटना स्थल पर। वरना पहले के राज में तो रिलीफ ट्रेन को पहुंचने में ही 13-13 घंटे लग जाते थे। पैसेंजर्स बोगियों से उतरकर जंगल-झाड़ियों में ही निबट लेते थे, लकड़ियां बटोरकर पूरे ट्रैक पर स्वाहा-स्वाहा की ध्वनि के साथ यज्ञ शुरू कर देते थे और रिलीफ ट्रेन का आह्वान करते थे। लेकिन इस बार ऐसा कोई मौका मोदीजी की ट्रेन ने पैसेंजर्स को नहीं दिया। रिलीफ टीम ने ट्रेन की बीमारी का भी तुरंत इलाज कर दिया, थमे हुए चक्कों में फिर जान डाल दीं। इससे यात्रियों की अटकी हुई सांस भी फिर से चलने लगी। वरना सोचिए, ठंड के दिन! और यात्री दोपहर से अगली सुबह तक कुछ अपनी किस्मत को कोसते, कुछ भारतीय रेल के चक्कों के पंक्चर होने को सराहते वही पड़े रहते न!!</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असल में, मोदीजी हैं, तो मुमकिन है। उन्होंने भारतीय तकनीक को इतनी ऊंचाई तक पहुंचा दिया है कि नासा की नाक नीचे है और हम इतने ऊपर कि तीन का काट करने में भी सक्षम हैं। पहले होता यह था कि किसी दुर्घटना के इंतज़ार में बैठी-बैठी हमारी टीम इतनी उकता जाती थी, पस्त होकर सो जाती थी कि दुर्घटना के बाद उसे ही उठाने में घंटों लग जाते थे। अब उनको दुर्घटना का इंतज़ार नहीं करना पड़ता, छोटी-मोटी तो होते ही रहती है, बड़ी-बड़ी दुर्घटनाएं भी खुद उनके पास चलकर आती है। वे ताक में बैठे ही रहते हैं कि दुर्घटना अब हुई कि तब हुई और होने से पहले ही अपना आर्ट दिखा देते हैं। अब भारतीय रेल जैसा कोई चुस्त रेल इस दुनिया में नहीं है कि चौबीसों घंटे किसी दुर्घटना के इंतज़ार में बैठे रहे और अपने हुनर का कौशल दिखाए!!</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और पांचवीं बात। ऐसी ही दुर्घटनाओं के सहारे हमारे देश के लोग थोड़ी-बहुत ज्यादा दुनिया भी देख लेते हैं, वरना तो उन्हें अपना परलोक सुधारने और इस जन्म में हिंदू धर्म को बचाने के झंझट से फुर्सत नहीं मिलती। लेकिन इसके लिए उन्हें किसी पैसेंजर ट्रेन में नहीं, राजधानी ट्रेन नंबर 20503 में सवार होना चाहिए, जिसके अंकों का मूलाधार 1 हो। हमारी कुशलता इसी से पता चलती है कि कितनी जल्दी दिल्ली पहुंचा जाएं। रुकने की फुर्सत नहीं है। दिल्ली पहुंचना है, तो बरौनी जंक्शन के भी मुफ्त में अतिरिक्त दर्शन हो जाएं, तो इसमें बुराई क्या है? स्वर्ग जाने के रास्ते की हर बाधा को दूर करना जरूरी है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सब दिल्ली जाने की हड़बड़ी में है, क्योंकि जीवन का पूरा पुण्य वही समाया हुआ है। अब अगली बार से किसी पैसेंजर ट्रेन में भूलकर मत बैठना। बैठना है, तो राजधानी में बैठना। दिल्ली स्वर्ग है। मोदीजी का सेवा तीर्थ भी वही है, जहां से स्वर्ग की टिकट मिल रही है। इस पुण्य का लाभ कमाईये। जितनी जल्दी हो सके, दिल्ली जाइए। यात्री बनकर जाईए, विधायक-सांसद बनकर जाईए, मंत्री या उसके चमचे बनकर जाईए, राष्ट्रपति बनकर जाईए या उप राष्ट्रपति बनकर, या अडानी-अंबानी के वफादार नौकर बनकर जाईए, लेकिन दिल्ली जरूर जाएं। स्वर्ग का रास्ता दिल्ली से होकर जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>(व्यंग्य : संजय पराते)</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 18 Jan 2026 17:37:53 +0530</pubDate>
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                <title>नए उत्तर प्रदेश की उड़ान विकास, विश्वास और वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर प्रदेश</title>
                                    <description><![CDATA[<div>उत्तर प्रदेश कभी “बीमारू राज्य”, अराजकता और अव्यवस्था के लिए जाना जाता था। निवेशक यहां आने से कतराते थे, उद्योग पलायन की राह पकड़ रहे थे और कानून-व्यवस्था आम नागरिक के लिए सबसे बड़ी चिंता बनी हुई थी। लेकिन 2017 के बाद उत्तर प्रदेश ने जो करवट ली है, उसने न सिर्फ देश को बल्कि दुनिया को भी यह संदेश दिया है कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्पष्ट नीतियां और ईमानदार नेतृत्व मिल जाए तो कोई भी प्रदेश अपनी तस्वीर और तकदीर दोनों बदल सकता है। आज उत्तर प्रदेश विकास, विश्वास और वैश्विक निवेश का नया केंद्र बनकर उभर रहा है।</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/165668/flight-of-new-uttar-pradesh-state-moving-towards-development-confidence"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-01/नए-उत्तर-प्रदेश-की-उड़ान-विकास.webp" alt=""></a><br /><div>उत्तर प्रदेश कभी “बीमारू राज्य”, अराजकता और अव्यवस्था के लिए जाना जाता था। निवेशक यहां आने से कतराते थे, उद्योग पलायन की राह पकड़ रहे थे और कानून-व्यवस्था आम नागरिक के लिए सबसे बड़ी चिंता बनी हुई थी। लेकिन 2017 के बाद उत्तर प्रदेश ने जो करवट ली है, उसने न सिर्फ देश को बल्कि दुनिया को भी यह संदेश दिया है कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्पष्ट नीतियां और ईमानदार नेतृत्व मिल जाए तो कोई भी प्रदेश अपनी तस्वीर और तकदीर दोनों बदल सकता है। आज उत्तर प्रदेश विकास, विश्वास और वैश्विक निवेश का नया केंद्र बनकर उभर रहा है।</div>
<div> </div>
<div>लखनऊ के सरोजनी नगर में लगभग 70 एकड़ में बनी अशोक लीलैंड की इलेक्ट्रिक वाहन मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्री इसी बदले हुए उत्तर प्रदेश की पहचान है। महज 16 महीनों में तैयार हुआ यह प्लांट न केवल प्रदेश की पहली ई-बस फैक्ट्री है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण भी है कि उत्तर प्रदेश अब रिकॉर्ड समय में बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स को जमीन पर उतारने की क्षमता रखता है। यहां ई-बस, ई-ट्रेवलर और ई-लोडिंग वाहनों का निर्माण होगा, जिससे न सिर्फ रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे बल्कि हरित और टिकाऊ परिवहन को भी बढ़ावा मिलेगा। यह फैक्ट्री आने वाले समय में 2,500 से बढ़कर 5,000 इलेक्ट्रिक बसों के उत्पादन की क्षमता रखेगी, जो देश के सार्वजनिक परिवहन को नई दिशा देगी।</div>
<div> </div>
<div>इस ऐतिहासिक अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का यह कहना कि वे योगी आदित्यनाथ को पहले राजनीति का माहिर समझते थे, लेकिन अब उन्हें अर्थशास्त्र का भी मास्टर मानते हैं, अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है। निवेश कैसे लाया जाए, उद्योग कैसे पनपे और राज्य को मुनाफे की दिशा में कैसे आगे बढ़ाया जाए,यह कला आज उत्तर प्रदेश की नीतियों और फैसलों में साफ दिखाई देती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश ने यह सिद्ध कर दिया है कि विकास और सुशासन साथ-साथ चल सकते हैं।</div>
<div> </div>
<div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में केंद्र और राज्य सरकार के समन्वय ने उत्तर प्रदेश को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास का मंत्र उत्तर प्रदेश में जमीन पर उतरता दिखाई देता है। कानून-व्यवस्था में सुधार, भ्रष्टाचार पर कठोर प्रहार और नीतिगत स्थिरता ने निवेशकों के मन से वर्षों पुराना डर निकाल दिया है। आज उत्तर प्रदेश में कोई पॉलिसी पैरालिसिस नहीं है। उद्योगपति जानते हैं कि यहां लिया गया फैसला समय पर लागू होगा और उन्हें सरकार का पूरा सहयोग मिलेगा।</div>
<div> </div>
<div>मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि उत्तर प्रदेश उत्सवों का प्रदेश है। यहां हर महीने कोई न कोई पर्व, मेला या सांस्कृतिक आयोजन होता है। यह सांस्कृतिक जीवंतता सामाजिक समरसता को मजबूत करती है और प्रदेश की पहचान को नई ऊर्जा देती है। बीते आठ वर्षों में दंगों का न होना, कानून-व्यवस्था की मजबूती का सबसे बड़ा प्रमाण है। यही कारण है कि आज उत्तर प्रदेश को देश में सबसे ज्यादा राजस्व देने वाले राज्यों में गिना जा रहा है।</div>
<div>निवेश के आंकड़े खुद कहानी बयां करते हैं। बीते वर्षों में उत्तर प्रदेश में हजारों करोड़ रुपये का निवेश आया है, लाखों करोड़ की ग्राउंड ब्रेकिंग हो चुकी है और आने वाले समय में इससे भी बड़े निवेश की तैयारी है। यह सब किसी एक दिन का परिणाम नहीं है, बल्कि यह निरंतर प्रयास, स्पष्ट विजन और मजबूत नेतृत्व का नतीजा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस उत्तर प्रदेश अनलिमिटेड संभावनाओं वाला प्रदेश की बात कही थी, वह आज हकीकत बन चुका है।</div>
<div> </div>
<div>डिफेंस सेक्टर में उत्तर प्रदेश की भूमिका भी लगातार मजबूत हो रही है। लखनऊ में स्थापित ब्रह्मोस फैक्ट्री इसका बड़ा उदाहरण है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जिस ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस की क्षमता का जिक्र किया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश इस आत्मनिर्भर भारत अभियान का एक मजबूत स्तंभ बन चुका है। यहां बनने वाले रक्षा उपकरण न सिर्फ देश की सुरक्षा को मजबूत करेंगे, बल्कि प्रदेश के युवाओं को उच्च तकनीक वाले रोजगार भी देंगे।</div>
<div> </div>
<div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत की सोच को उत्तर प्रदेश ने पूरी निष्ठा से अपनाया है। एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, रैपिड रेल, वाटर वे और औद्योगिक कॉरिडोर जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स ने प्रदेश की कनेक्टिविटी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। आज उत्तर प्रदेश देश का पहला रैपिड रेल चलाने वाला और वाटर वे को प्रभावी ढंग से अपनाने वाला प्रदेश बन चुका है। यह बुनियादी ढांचा न सिर्फ उद्योगों के लिए बल्कि आम नागरिकों के जीवन को आसान बनाने के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।</div>
<div>कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर उत्तर प्रदेश ने जो सख्ती दिखाई है, वह पूरे देश के लिए उदाहरण बन गई है। रोड रोमियो जैसी समस्याओं पर कड़ा प्रहार, महिलाओं के खिलाफ अपराधों में जीरो टॉलरेंस नीति और अपराधियों के खिलाफ बिना भेदभाव के कार्रवाई ने प्रदेश में विश्वास का माहौल बनाया है। आज लोग निडर होकर काम कर रहे हैं, उद्योगपति बेहिचक निवेश कर रहे हैं और युवा अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त हैं।</div>
<div> </div>
<div>राजनाथ सिंह का यह कहना कि हिंदुजा ग्रुप भले लखनऊ का न हो, लेकिन लखनऊ के लोग उन्हें अपना मानेंगे, उत्तर प्रदेश की उस सांस्कृतिक उदारता को दर्शाता है जो यहां आने वाले हर व्यक्ति को अपनापन देती है। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बने प्रेरणा स्थल, शहरों का सौंदर्यीकरण और ऐतिहासिक विरासत का संरक्षण यह दिखाता है कि विकास के साथ-साथ संस्कृति और परंपरा को भी समान महत्व दिया जा रहा है।</div>
<div>आज उत्तर प्रदेश देश की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक व्यवस्था बन चुका है और बहुत जल्द अव्वल बनने की ओर अग्रसर है। यह उपलब्धि केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि उस भरोसे की है जो देश और दुनिया ने उत्तर प्रदेश पर किया है। भाजपा के नेतृत्व में केंद्र और राज्य सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब नीयत साफ हो और नेतृत्व मजबूत हो, तो परिणाम अपने आप सामने आते हैं।</div>
<div> </div>
<div>देश के लिए उत्तर प्रदेश की भूमिका आने वाले समय में और भी महत्वपूर्ण होने वाली है। देश की सबसे बड़ी आबादी, विशाल युवा शक्ति, मजबूत औद्योगिक आधार और तेजी से विकसित हो रहा इंफ्रास्ट्रक्चर,ये सभी मिलकर उत्तर प्रदेश को भारत की विकास गाथा का केंद्र बना रहे हैं। यहां बनने वाली ई-बसें देश के शहरों को स्वच्छ परिवहन देंगी, रक्षा उपकरण देश की सीमाओं को सुरक्षित करेंगे और यहां के उद्योग देश की अर्थव्यवस्था को गति देंगे।</div>
<div>आज भाजपा एक अच्छे विकल्प के रूप में इसलिए अग्रणी है क्योंकि उसने केवल वादे नहीं किए, बल्कि उन्हें जमीन पर उतारकर दिखाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदृष्टि, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दृढ़ नेतृत्व और भाजपा की संगठित कार्यशैली ने उत्तर प्रदेश को नई पहचान दी है। यह पहचान विकास, सुशासन और आत्मनिर्भरता की है।</div>
<div>नया उत्तर प्रदेश अब पीछे मुड़कर नहीं देख रहा। वह आत्मविश्वास के साथ भविष्य की ओर बढ़ रहा है।देश को मजबूत बनाने, अर्थव्यवस्था को गति देने और हर नागरिक के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के संकल्प के साथ। यही उत्तर प्रदेश की नई कहानी है और यही भारत के उज्ज्वल भविष्य की मजबूत नींव भी।</div>
<div> </div>
<div><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Sat, 10 Jan 2026 18:20:57 +0530</pubDate>
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                <title>विज्ञान कोई मंजिल नहीं, यह यात्रा है</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" align="center"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">[जहाँ सवाल होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं विज्ञान जन्म लेता है]</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" align="center"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">[विश्व विज्ञान दिवस: ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास और नवाचार का उत्सव]</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक अंधेरी रात में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदियों पहले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई इंसान आकाश की ओर देखता है और मन में सवाल उठता है – </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ये</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तारे</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्यों</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">टिमटिमाते</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ये ग्रह क्यों घूमते हैं</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">यही सवाल गैलीलियो को दूरबीन थामने के लिए प्रेरित करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूटन को सेब गिरते देखने के लिए मजबूर करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और आज हम मंगल पर मानव बस्तियाँ बसाने का सपना देख रहे हैं। विज्ञान केवल किताबों या डिग्रियों तक सीमित नहीं है</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/159482/science-is-not-a-destination-it-is-a-journey"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/विज्ञान-कोई-मंजिल-नहीं, यह-यात्रा-है.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" align="center"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">[जहाँ सवाल होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं विज्ञान जन्म लेता है]</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" align="center"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">[विश्व विज्ञान दिवस: ज्ञान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास और नवाचार का उत्सव]</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक अंधेरी रात में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सदियों पहले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोई इंसान आकाश की ओर देखता है और मन में सवाल उठता है – </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" xml:lang="hi">ये</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तारे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्यों</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">टिमटिमाते</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">ये ग्रह क्यों घूमते हैं</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">यही सवाल गैलीलियो को दूरबीन थामने के लिए प्रेरित करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यूटन को सेब गिरते देखने के लिए मजबूर करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और आज हम मंगल पर मानव बस्तियाँ बसाने का सपना देख रहे हैं। विज्ञान केवल किताबों या डिग्रियों तक सीमित नहीं है – यह वह अंतहीन जिज्ञासा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो इंसान को इंसान बनाती है। हर साल </span>10 <span lang="hi" xml:lang="hi">नवंबर को जब हम विश्व विज्ञान दिवस मनाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम उस अविचलित जिज्ञासा को नमन करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अज्ञानता के अंधकार से प्रकाश की ओर हमारी राह खोलती है और हमारी सोच की सीमाओं को पीछे छोड़ देती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यूनेस्को ने इस दिवस की शुरुआत </span>2001 <span lang="hi" xml:lang="hi">में की थी और इसका नाम रखा था –</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">शांति और विकास के लिए विश्व विज्ञान दिवस।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस नाम में ही एक संदेश छिपा है: विज्ञान न किसी देश का गुलाम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न किसी धर्म का विरोधी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जब दुनिया परमाणु बम की धमकियों से कांप रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी समय विज्ञान ने इंसुलिन खोजकर मधुमेह से पीड़ित लोगों को जीवन दिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पोलियो को जड़ से उखाड़ फेंका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और इंटरनेट जैसी क्रांति से ज्ञान की सीमाओं को तोड़ा। विज्ञान ने हमेशा यह साबित किया है कि उसके हाथों में शक्ति है –</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विनाश की भी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रचना की भी।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दिशा तय करना हमारा काम है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आज जलवायु संकट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक महामारी या अंतरिक्ष में नई दुनिया की खोज – हर चुनौती में विज्ञान सबसे आगे खड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारा मार्गदर्शन करता है और मानवता को उज्जवल भविष्य की ओर ले जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की मिट्टी में विज्ञान की जड़ें गहरी हैं। हजारों साल पहले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आर्यभट्ट ने पृथ्वी के घूमने की बात कही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोग हँसे। आज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चंद्रयान-</span>3 <span lang="hi" xml:lang="hi">के जरिए चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर पानी की खोज कर रहे हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कोविड के सबसे कठिन दिनों में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब पूरी दुनिया वैक्सीन के लिए तरस रही थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत ने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कोविशील्ड और कोवैक्सीन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विकसित कर एक अरब से ज्यादा डोज़ दुनिया को दीं। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसरो</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का बजट तो किसी हॉलीवुड फिल्म से भी कम है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी उसने</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>104 <span lang="hi" xml:lang="hi">सैटेलाइट्स एक साथ लॉन्च कर विश्व रिकॉर्ड बनाया।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह कमाल पैसों का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जुनून का</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और यही जुनून आज के छोटे वैज्ञानिकों में भी दिखता है – राजस्थान की एक लड़की जो सौर ऊर्जा से पानी शुद्ध करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिहार का एक लड़का जो पुराने फोन से वेंटिलेटर बनाता है। ये बच्चे कल के वैज्ञानिक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आज के हीरो</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन रास्ते में काँटे भी हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अंधविश्वास आज भी सिर ऊँचा किए घूम रहा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वैक्सीन को लेकर फैल रही अफवाहें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलवायु परिवर्तन को झुठलाने वाले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ज्योतिष को विज्ञान बताने वाले – ये सभी विज्ञान के असली विरोधी हैं। विज्ञान सवाल करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जवाब माँगता है। और जो सवाल से डरते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे विज्ञान से डरते हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हमें चाहिए:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूलों में प्रयोगशालाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गाँवों में इंटरनेट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और सबसे ज्यादा – ऐसा माहौल जहाँ सवाल पूछने पर डाँट न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि तारीफ हो।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सपना देखिए: दस साल बाद का भारत। हर गाँव में सौर ऊर्जा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर खेत में ड्रोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर बच्चे के हाथ में टैबलेट और दिमाग में सवाल। कैंसर का इलाज सस्ता और सुलभ हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हवा साफ हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समुद्र का पानी पीने लायक हो। अंतरिक्ष में हमारा अपना भारतीय स्टेशन हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तिरंगा गर्व से लहराता हो।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सपना कोई कविता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह विज्ञान का</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वादा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है। बस जरूरत है – नीति की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निवेश की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और सबसे बड़ी बात:</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वास की।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व विज्ञान दिवस कोई केवल त्योहार नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह एक पुकार है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पुकार है उस बच्चे की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो पहली बार दूरबीन से चाँद देखता है और उसकी आँखें विस्मय से चौड़ी हो जाती हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पुकार है उस माँ की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो वैक्सीन लगवाकर अपने बच्चे की सुरक्षा महसूस करती है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पुकार है उस किसान की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो मौसम की सटीक जानकारी से अपनी फसल बचा लेता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारा सबसे बड़ा दुश्मन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अज्ञान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और सबसे बड़ा साथी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक किताब उठाइए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक सवाल पूछिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक प्रयोग कीजिए। क्योंकि जिस दिन हम सवाल पूछना बंद कर देंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी दिन हम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इंसान होना</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी बंद कर देंगे।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विज्ञान कोई मंजिल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक यात्रा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">है – और यह यात्रा अभी शुरू ही हुई है। चलिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साथ चलें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सवालों के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खोज के साथ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उज्जवल भविष्य की ओर कदम बढ़ाते हुए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन </span></strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span></strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरिजीत</span></strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span></strong><strong>,</strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> बड़वानी</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Nov 2025 18:42:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जेमिमा रोड्रिग्स- आस्था के आँसू और बौद्धिक कुप्रचार का खेल</title>
                                    <description><![CDATA[<p dir="ltr">देश इस समय ख़ुमारी में है। महिला क्रिकेट का विश्व कप जीत कर जहाँ एक ओर देशवासी जीत के जश्न में हैं वहीं दूसरी तरफ एक खिलाड़ी की आड़ में कुप्रचार के एक ऐसे खेल से जूझ रहे हैं जो हमारी सामाजिकता और खेल भावना के लिए बेहद घातक है। इस कुप्रचार की शुरुआत हुई वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में भारत की जीत के बाद बल्लेबाज जेमिमा रोड्रिग्स के भावुक उद्बोधन से।</p>
<p dir="ltr">सेमीफाइनल में 127 रन की शानदार नाबाद पारी के लिए जेमिमा को ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ चुना गया। इसके पुरस्कार वितरण समारोह में जेमिमा ने जीसस के प्रति</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/159118/jemimah-rodrigues-tears-of-faith-and-a-game-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/जेमिमा-रोड्रिग्स--आस्था-के-आँसू-और-बौद्धिक-कुप्रचार-का-खेल.jpg" alt=""></a><br /><p dir="ltr">देश इस समय ख़ुमारी में है। महिला क्रिकेट का विश्व कप जीत कर जहाँ एक ओर देशवासी जीत के जश्न में हैं वहीं दूसरी तरफ एक खिलाड़ी की आड़ में कुप्रचार के एक ऐसे खेल से जूझ रहे हैं जो हमारी सामाजिकता और खेल भावना के लिए बेहद घातक है। इस कुप्रचार की शुरुआत हुई वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में भारत की जीत के बाद बल्लेबाज जेमिमा रोड्रिग्स के भावुक उद्बोधन से।</p>
<p dir="ltr">सेमीफाइनल में 127 रन की शानदार नाबाद पारी के लिए जेमिमा को ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ चुना गया। इसके पुरस्कार वितरण समारोह में जेमिमा ने जीसस के प्रति भावपूर्ण आभार व्यक्त किया, फिर आंसुओं से भीगे उद्बोधन में बाइबिल में लिखी चंद पंक्तियां उद्धृत करते हुए अपनी पारी को चिंता से उबरने का ‘चमत्कार’ बताया। इसके तुरंत बाद शुरू हो गया सोशल मीडिया पर भारत के कथित सेक्युलर वामपंथी बुद्धिजीवियों का हिंदुत्व के खिलाफ कुप्रचार का खेल।</p>
<p dir="ltr">जेमिमा का वक्तव्य उनकी आस्था की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति थी, लेकिन भारत के कथित प्रगतिशील, सेक्युलर वामपंथी बुद्धिजीवियों ने इसे तुरंत एक राजनीतिक हथियार बना लिया। वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने ‘एक्स’ पर लिखा: "दक्षिणपंथियों ने जेमिमा और उनके परिवार को उनकी धार्मिक आस्था के लिए ट्रोल किया है। उम्मीद है कि कुछ लोग आज शर्म से गड्ढे में सिर छिपा लें।" हिंदी की लेखिका मधु कांकरिया ने फेसबुक पर पोस्ट की- “विजय के इस क्षण के पीछे उसकी (जेमिमा) वेदना का मार्मिक इतिहास छिपा है। इसे उसकी धार्मिक मान्यताओं और पहचान को लेकर उसकी निजता पर हमला बोला गया।</p>
<p dir="ltr">कट्टरपंथियों द्वारा ट्रोल किया गया।” सच यह है कि राजदीप सरदेसाई की छवि साफ तौर पर एक एजेंडवादी पत्रकार की रही है। इसी छवि के कारण वे कई बार विवादों में भी रह चुके हैं। उधर, यह भी पहली बार नहीं है जब औसत दर्जे की लेखिका मधु कांकरिया ने इस प्रकार का नैरेशन गढ़ा हो। अगस्त 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद जब अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय पर बेहद हिंसक अत्याचार हो रहे थे, महिलाओं से बलात्कार, घरों में लूटपाट, मंदिरों में तोड़फोड़ जैसी हिंसक वारदातों की ख़बरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बन रही थीं, उस भीषण दौर में भी मधु कांकरिया ने “बांग्लादेश में मामूली तनाव है।” जैसी संवेदनहीन टिप्पणी कर मुस्लिम कट्टरपंथियों की हिंसा से ध्यान भटकाने का प्रयास किया था। उनकी यह टिप्पणी भी काफी विवादस्पद रही थी लेकिन कथित प्रगतिशील वामपंथी उनके पक्ष में आ गए।</p>
<p dir="ltr">जेमिमा वाले प्रसंग में भी ‘उसकी धार्मिक मान्यताओं और पहचान को लेकर उसकी निजता पर हमला’ जैसी मिथ्या टिप्पणी भी उसी मानसिकता का परिचय है। ऐसे ही माहौल में अपने आप को जाति और धर्म से निरपेक्ष कहने वाले डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म प्रोड्यूसर आनंद पटवर्द्धन ने भारत की जीत का श्रेय पूरी टीम की बजाए सिर्फ़ ‘ईसाई और सिक्ख’ खिलाड़ियों को दे दिया तो राजस्थानी के एक वरिष्ठ कवि मालचंद तिवाड़ी ने जेमिमा की प्रतिभा की बजाए उसके मज़हब को प्रमुखता देते हुए “एक ईसाई भारतीय बेटी को सैल्यूट” ठोक डाला। माकपा की पूर्व सांसद सरला माहेश्वरी ने तो आनन-फानन में जेमिमा पर ‘कविता’ लिख डाली। ये उदाहरण उनकी उस दोहरी मानसिकता के हैं जो समाज के किसी व्यक्ति की  योग्यता-प्रतिभा-विशेषज्ञता से ऊपर उसकी जाति समुदाय और धर्म, मज़हब को रखते हैं।</p>
<p dir="ltr">जेमिमा के शतकीय पारी की सफलता का श्रेय जीसस और बाइबिल को देने को प्रगतिशील कवि-लेखक और स्वयंभू बुद्धिजीवी वर्ग ने  हिंदुत्ववादी ताकतों के खिलाफ एक नैरेटिव बना दिया। वे इसे ‘एक ईसाई लड़की का जज्बा हिंदुत्व के खिलाफ’ और जेमिमा की पारी को ‘ईसाई हिम्मत’ का प्रतीक बताने लगे, जबकि वास्तविकता यह है कि जेमिमा का संबंध खेल से है और वो एक खिलाड़ी है।</p>
<p dir="ltr">उनकी सफलता उनकी प्रतिभा, टीमवर्क और व्यक्तिगत आस्था का परिणाम थी, न कि कोई मज़हबी मसला, लेकिन किसी भी अल्पसंख्यक (मुस्लिम या ईसाई) से जुड़े मुद्दे को तुरंत मज़हबी रंग देकर हिंदू धर्म, हिंदुत्व और दक्षिणपंथी ताकतों के खिलाफ कुप्रचार शुरू कर देना भारत के कथित सेक्युलर वामपंथी धड़े की पुरानी पहचान रही है। तथ्यों से देखें तो जेमिमा ने स्वयं कभी ट्रोलिंग या हिंदू, हिंदुत्व या दक्षिणपंथ की बात नहीं की, लेकिन वामपंथी धड़ों ने नैरेटिव थोप दिया। इसके लिए वे दो घटनाओं को मिथ्याधार बनाते हैं। एक जेमिमा का 'मिरेकल हीलिंग' वाला इंटरव्यू और दूसरी जिमखाना से सदस्यता रद्द करने की।</p>
<p dir="ltr">जुलाई 2023 में, पॉडकास्टर रणवीर अल्लाहबादिया के शो ‘द रणवीर शो’ में जेमिमा ने अपनी कई 'मिरेकल हीलिंग' की  घटनाओं का जिक्र किया, जैसे: क्रिकेट के दौरान लगी चोटें,जो प्रार्थना और विश्वास से जल्दी ठीक हो गईं। दूसरी है खार जिमखाना की। अक्टूबर 2024 में मुंबई के ऐतिहासिक खार जिमखाना ने जेमिमा की मानद सदस्यता रद्द कर दी थी। यह कार्रवाई जेमिमा के पिता इवान रोड्रिग्स द्वारा क्लब में अनाधिकृत धार्मिक सभाएं करने के कारण हुई थी। आरोप था कि इवान रोड्रिग्स ने ‘ब्रदर मैनुअल मिनिस्ट्रीज’ के तहत लगभग 18 महीनों में 35 धार्मिक सभाएं आयोजित की थीं, जो क्लब के नियमों का उल्लंघन था। सदस्यों ने शिकायत की कि हॉल में ट्रांस म्यूजिक, अंधेरा कमरा और प्रचारात्मक सत्र हो रहे थे, जो धर्मांतरण (कन्वर्जन) जैसा लग रहा था।</p>
<p dir="ltr">क्लब के अध्यक्ष विवेक देवनानी ने कहा कि सदस्यों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर उनकी सदस्यता रद्द की थी। निश्चित ही यह कोई ‘हिंदुत्ववादी साजिश’ नहीं, बल्कि एक सेक्युलर क्लब का नियमों का पालन था। फिर भी, वामपंथी बुद्धिजीवियों ने इसे ‘ईसाई उत्पीड़न’ का मामला बना दिया। उनका पैटर्न साफ है- तथ्य नजरअंदाज, लिजलिजी भावनात्मक अपील, और अंत में हिंदू और हिंदुत्व को खलनायक बनाना। जेमिमा की प्रतिभा, उनके मज़हब की आड़ लेकर हिंदुत्व के ख़िलाफ़ कुप्रचार का कुचक्र का उनका यह खेल भी उन्हीं में से एक है।</p>
<p dir="ltr"><strong>हरीश शिवनानी</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 06 Nov 2025 18:10:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल संगठन नहीं एक परिवार है</title>
                                    <description><![CDATA[<p>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज शताब्दी वर्ष मना रहा है संघ को जो लोग समाचार पत्रों से टेलीविजन से एवं अन्यान्य लोगों से सुनते और समझते हैं उन्हें संघ केवल एक हिन्दुओं का संगठन समझ में आता होगा लेकिन जब आप संघ में आकर, जुड़कर साथ मिलकर काम करेंगे तो ध्यान में आएगा कि मैं एक संगठन से ही नहीं बल्कि एक परिवार से भी जुड़े हैं। इस विषय में मैं अपना स्वयं का अनुभव भी साझा कर रहा हूं - मेरी संघ आयु लगभग 20 वर्ष हो रही है मैं संघ में सामान्य स्वयंसेवक, गटनायक, गणशिक्षक, मुख्य शिक्षक से लेकर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/159116/rashtriya-swayamsevak-sangh-is-not-just-an-organization-but-a"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/राष्ट्रीय-स्वयंसेवक-संघ-केवल-संगठन-नहीं-एक-परिवार-है1.jpg" alt=""></a><br /><p>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज शताब्दी वर्ष मना रहा है संघ को जो लोग समाचार पत्रों से टेलीविजन से एवं अन्यान्य लोगों से सुनते और समझते हैं उन्हें संघ केवल एक हिन्दुओं का संगठन समझ में आता होगा लेकिन जब आप संघ में आकर, जुड़कर साथ मिलकर काम करेंगे तो ध्यान में आएगा कि मैं एक संगठन से ही नहीं बल्कि एक परिवार से भी जुड़े हैं। इस विषय में मैं अपना स्वयं का अनुभव भी साझा कर रहा हूं - मेरी संघ आयु लगभग 20 वर्ष हो रही है मैं संघ में सामान्य स्वयंसेवक, गटनायक, गणशिक्षक, मुख्य शिक्षक से लेकर विस्तारक और जिला प्रचारक तक के सघन दायित्वों का निर्वहन करते हुए आज भी सक्रिय दायित्व में रहकर काम कर रहा हूं। हमको जब कभी जहां संघ का कार्य करने का अवसर मिला, नए - नए क्षेत्रों में गया, नए - नए स्वयंसेवकों से मिला हमे सभी जगह अपनापन मिला, एक परिवार जैसा भाव मिला।</p>
<p>संघ में एक व्यवस्था के नाते कोई अधिकारी है तो कोई सामान्य कार्यकर्ता बस वास्तव में है तो सभी भाई साहब ही। संघ में प्रत्येक स्वयंसेवक की संभाल व देखरेख, शारीरिक और बौद्धिक , चारित्रिक प्रशिक्षण परिवार भावना से किया जाता है। मेरा आठ वर्ष का प्रचारक जीवन रहा है मै नए स्थानों पर काम करने गया। नए पुराने स्वयंसेवकों से मिला सभी ने मुझे पुत्रवत, भातृत्व स्नेह दिया, कभी यह नहीं लगा कि हम अपने परिवार से दूर हैं। संघ में अधिकारी और स्वयंसेवक के बीच कोई अंतर नहीं रहता बस यही लगता है कि भाई साहब हमारे परिवार के मुखिया हैं। स्वयंसेवक का परिवार बिल्कुल अपना परिवार जैसा ही लगता है।</p>
<p>मैं यहां एक घटना की भी चर्चा करूंगा - इसी लखनऊ पश्चिम भाग में मै मालवीय नगर में विस्तारक था एक दिन शाम को शाखा के बाद रात्रि भोजन पर नगर कार्यवाह श्री विनय जी के यहां भोजन पर गया उसी समय मुझे तेज बुखार आ गया, भोजन करना भी कठिन हो गया तुरन्त नगर कार्यवाह जी ने बुखार नापा और दवाई दी अपने यहां ही रुकने का आग्रह किया मैने कहा कि कार्यालय ही रुकेंगे उन्होंने रात में ही कार्यालय भारती भवन राजेन्द्र नगर में छोड़ गए और प्रातः ही आकर फिर हाल चाल लिया व दवाई इत्यादि की व्यवस्था की। अब यह भाव केवल संघ में ही देखने को मिलते हैं।  सन २०२० में प्रचारक जीवन से वापस लौट आने के बाद भी हमारे सभी स्वयंसेक परिवारिक वातावरण के साथ आज भी मिलते हैं।</p>
<p>हम जब बाहर के अन्य संगठनों को देखते हैं तो वहां कहीं न कहीं स्वार्थ, राजनैतिक महत्वाकांक्षा, पद का मोह दिखाई पड़ता है लेकिन संघ विशुद्ध पारिवारिक संगठन है। अभी ९ माह पूर्व मेरी मेरी धर्म पत्नी शिविल हॉस्पिटल लखनऊ में एडमिट थी मैने संकोच बस किसी को नहीं बताया कि सभी परेशान होंगे, लेकिन किसी तरह हमारे स्वयंसेवकों को पता चला तो सभी कार्यकर्ताओं ने हाथों हांथ लिया। भोजन आदि की व्यवस्था भी किया रोज कोई न कोई स्वयंसेवक दोनों समय का भोजन हॉस्पिटल पहुंचा जाता।</p>
<p>अब यही भाव ही परिवार भाव है। संघ में हम लोग गीत भी गाते हैं कि शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है..... मेरा समाज के लोगों से आग्रह है कि संघ को साहित्य से पढ़कर नहीं समझा जा सकता संघ जानना है तो शाखा में आइए। संघ जैसा दुनियां में कोई नहीं.... संघ के अपने अनुभव को शब्दों में लिख पाना बहुत मुश्किल है। अबिगत- गति कछु कहत न आवै। ज्यों गूँगे मीठे फल कौ रस अंतरगत ही भावै।।</p>
<p><strong>बालभास्कर मिश्र</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 06 Nov 2025 18:05:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रदेश की अर्थव्यवस्था के अनुरूप हों चुनावी घोषणाएँ</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि जनहित और नीति-निर्माण की दिशा तय करने का माध्यम होते हैं। जनता हर बार यह उम्मीद करती है कि जो भी दल सत्ता में आए, वह उसके जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाएगा। परंतु आज के परिदृश्य में चुनावी घोषणाएँ विकास के विज़न से अधिक लोकलुभावन प्रतिस्पर्धा का रूप ले चुकी हैं। राजनीतिक दल एक-दूसरे से आगे बढ़ने के लिए ऐसे वादे करने लगे हैं जो प्रदेश की आर्थिक स्थिति और संसाधनों की सीमा से बहुत दूर हैं।</div>
<div>  </div>
<div>हर चुनाव में “मुफ्त बिजली”, “गैस सिलेंडर”, “बेरोजगारी भत्ता”, “लैपटॉप”, “यात्रा सुविधा” और</div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/158875/election-announcements-should-be-in-line-with-the-states-economy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/प्रदेश-की-अर्थव्यवस्था-के-अनुरूप-हों-चुनावी-घोषणाएँ.jpeg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि जनहित और नीति-निर्माण की दिशा तय करने का माध्यम होते हैं। जनता हर बार यह उम्मीद करती है कि जो भी दल सत्ता में आए, वह उसके जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाएगा। परंतु आज के परिदृश्य में चुनावी घोषणाएँ विकास के विज़न से अधिक लोकलुभावन प्रतिस्पर्धा का रूप ले चुकी हैं। राजनीतिक दल एक-दूसरे से आगे बढ़ने के लिए ऐसे वादे करने लगे हैं जो प्रदेश की आर्थिक स्थिति और संसाधनों की सीमा से बहुत दूर हैं।</div>
<div> </div>
<div>हर चुनाव में “मुफ्त बिजली”, “गैस सिलेंडर”, “बेरोजगारी भत्ता”, “लैपटॉप”, “यात्रा सुविधा” और यहाँ तक कि “नकद राशि” देने जैसी घोषणाएँ सुनने को मिलती हैं। ये वादे जनता को आकर्षित तो करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या राज्य की अर्थव्यवस्था इतने बोझ को वहन कर सकती है? अधिकांश राज्यों के बजट पहले से ही घाटे में हैं। ऐसे में अव्यवहारिक घोषणाएँ न केवल आर्थिक संतुलन बिगाड़ती हैं, बल्कि आने वाली सरकारों को कर्ज और वित्तीय संकट की ओर धकेल देती हैं।</div>
<div> </div>
<div>राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि वादे केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही का आधार होते हैं। जब कोई दल असंभव घोषणाएँ करता है, तो वह जनता के विश्वास के साथ-साथ राज्य की वित्तीय साख से भी खिलवाड़ करता है। अतः आवश्यक है कि चुनावी घोषणाएँ प्रदेश की अर्थव्यवस्था, बजट और राजस्व की वास्तविक स्थिति के अनुरूप हों।</div>
<div> </div>
<div>इस दिशा में राजनीतिक दल, चुनाव आयोग और वित्तीय संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। चुनाव आयोग को निम्न प्रावधान लागू करने पर विचार करना चाहिए :</div>
<div> </div>
<div>(अ)प्रत्येक दल अपने घोषणापत्र के साथ आर्थिक व्यौरा प्रस्तुत करे, जिसमें बताया जाए कि वादों की पूर्ति के लिए धन कहाँ से आएगा।</div>
<div> </div>
<div>(ब)राज्य के सकल घरेलू उत्पाद  के एक निश्चित प्रतिशत से अधिक के आर्थिक भार वाले वादों को अस्वीकार्य घोषित किया जाए।</div>
<div> </div>
<div>(स) राजनैतिक दलों की सहमति से स्वतंत्र आर्थिक समीक्षा समिति गठित की जाए, जो चुनावी घोषणाओं की व्यवहार्यता का मूल्यांकन करे और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करे।</div>
<div> </div>
<div>(द)असंभव या भ्रामक वादों पर दंडात्मक प्रावधान हो, ताकि राजनीतिक ईमानदारी बनी रहे।</div>
<div> </div>
<div>भारत की वित्तिय संस्थाएं तथा अर्थशास्त्री समय-समय पर “फ्रीबी कल्चर” को लेकर चेतावनी दे चुके हैं। सभी का स्पष्ट मत है कि मुफ्त योजनाओं की अंधी दौड़ दीर्घकाल में आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा है। ऐसे में वित्तीय अनुशासन को चुनावी प्रक्रिया से जोड़ना न केवल आवश्यक, बल्कि लोकतंत्र की सेहत के लिए अनिवार्य हो गया है।</div>
<div> </div>
<div>यदि राजनीतिक दल वास्तव में जनसेवा के लिए प्रतिबद्ध हैं, तो उन्हें चाहिए कि वे वादों की संख्या नहीं, गुणवत्ता बढ़ाएं। ऐसी घोषणाएँ करें जो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, जल, पर्यावरण और स्वावलंबन से जुड़ी हों तथा राज्य के विकास केन्द्रित हो। सभी को ध्यान रखना होगा कि मुफ्त की वस्तुएँ नहीं, बल्कि सृजन के अवसर देना ही सच्चा जनकल्याण है।</div>
<div> </div>
<div>“प्रदेश की अर्थव्यवस्था के अनुरूप घोषणाएँ” केवल एक नीति नहीं, बल्कि एक नैतिक प्रतिबद्धता होनी चाहिए। जब चुनावी वादे संसाधनों की वास्तविकता पर आधारित होंगे, तब न केवल शासन विश्वसनीय बनेगा, बल्कि लोकतंत्र भी अधिक परिपक्व होगा।</div>
<div> </div>
<div>निष्कर्ष रूप में मैं कहना चाहूंगा कि लोकतंत्र में घोषणाएँ आवश्यक हैं, परंतु वे तभी सार्थक हैं जब वे प्रदेश की आर्थिक सीमाओं में रहते हुए जनता के दीर्घकालिक हित को साधें। अतः अब समय है कि देश की राजनीति लोकलुभावन वादों से आगे बढ़कर वित्तीय उत्तरदायित्व की दिशा में कदम बढ़ाए , तभी लोकतंत्र जनकल्याण का वास्तविक माध्यम बन सकेगा।</div>
<div> </div>
<div><strong>लेखक: प्रो. (डा.) मनमोहन प्रकाश</strong></div>
</div>
<div class="yj6qo"> </div>
<div class="adL"> </div>
</div>
</div>
<div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Nov 2025 19:01:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वैश्विक संदर्भ में राष्ट्रवाद बनाम धार्मिक कट्टरता</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">वास्तविक राष्ट्रवाद के संदर्भ में धार्मिक कट्टरता राष्ट्रवाद किसी भी राष्ट्र की आत्मा होता है और वैश्विक संदर्भ में राष्ट्रवाद बनाम धार्मिक कट्टरता पर बौद्धिक विमर्श की परम आवश्यकता है l यह केवल राजनीतिक नारा या भीड़ संचालित भाव नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का वह केंद्र है जो देश की एकता, अखंडता और गरिमा को अभिव्यक्त करता है। यह वह सार्वभौमिक सत्य है, जिसने युगों से सभ्यताओं को स्थायित्व दिया और समाजों को अनुशासन एवं उद्देश्य की दिशा में अग्रसर किया। किंतु जब यही राष्ट्रवाद धार्मिक कट्टरता, संकीर्ण विचारधारा अथवा अवसरवादी राजनीति के मोहपाश में बंध जाता है, तब वह</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/158678/nationalism-versus-religious-fundamentalism-in-a-global-context"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/kattarta.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वास्तविक राष्ट्रवाद के संदर्भ में धार्मिक कट्टरता राष्ट्रवाद किसी भी राष्ट्र की आत्मा होता है और वैश्विक संदर्भ में राष्ट्रवाद बनाम धार्मिक कट्टरता पर बौद्धिक विमर्श की परम आवश्यकता है l यह केवल राजनीतिक नारा या भीड़ संचालित भाव नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का वह केंद्र है जो देश की एकता, अखंडता और गरिमा को अभिव्यक्त करता है। यह वह सार्वभौमिक सत्य है, जिसने युगों से सभ्यताओं को स्थायित्व दिया और समाजों को अनुशासन एवं उद्देश्य की दिशा में अग्रसर किया। किंतु जब यही राष्ट्रवाद धार्मिक कट्टरता, संकीर्ण विचारधारा अथवा अवसरवादी राजनीति के मोहपाश में बंध जाता है, तब वह अपनी दिव्यता खो बैठता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्र के निर्माण और वैश्विक एकीकरण के संदर्भ में नागरिकों की निष्ठा, समर्पण और संवेदनशीलता अनिवार्य है। परंतु इसका यह तात्पर्य नहीं कि सत्ता-लोलुप राजनीतिक दल राष्ट्रवाद को धर्म, जाति या संप्रदाय से जोड़कर इसे सत्ता प्राप्ति का अस्त्र बना लें। ऐसा करने से न केवल राष्ट्रीय भावना आहत होती है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने में विभाजन और अविश्वास की दीवारें खड़ी हो जाती हैं। इतिहास साक्षी है कि जब-जब सत्ता पर बने रहने की अंधी चाह बढ़ी है, तब-तब साम्राज्यों की जड़ें खोखली हुई हैं। वर्तमान भारतीय राजनीति भी इस प्रपंच से मुक्त नहीं — जहां राष्ट्रवाद कई बार धर्म का पर्याय बनाकर प्रस्तुत किया जाता है, ताकि भावनात्मक उन्माद के सहारे सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ी जा सकें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">              लोकतंत्र में सत्ता का परिवर्तनशील रहना ही उसकी प्राणवायु है। निरंतर सत्ता एक व्यक्ति या दल को अधिनायकवादी बनाकर लोकतांत्रिक संस्थाओं की जड़ों को कमजोर कर देती है। अवसरवादी राजनीति, जातिगत समीकरणों की गणना, और तुष्टीकरण की नीति ये सब मिलकर जनकल्याण की मूल भावना को धूमिल करते हैं। जनता के दीर्घकालिक हितों के स्थान पर तात्कालिक लाभों की घोषणाएँ लोकतंत्र को सस्ती लोकप्रियता की ओर ढकेल देती हैं। इससे न केवल राष्ट्रीय चरित्र का ह्रास होता है, बल्कि सामाजिक अनुशासन भी दरकने लगता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीति में पदलोलुपता, अवसरवाद और जातिवादी समीकरणों की राजनीति लोकतांत्रिक आदर्शों को विकृत करती जा रही है। संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के मूल सिद्धांत जब तुष्टीकरण की नीति से प्रभावित होते हैं, तब लोकतंत्र का स्वरूप विकृत होकर सामंतवादी प्रवृत्तियों को जन्म देता है। जातिवादी मतदान, अवतारवाद और निरंकुश सत्ता की चाह,ये सब लोकतंत्र के भीतर अधिनायकवाद के बीज बोने वाले तत्व हैं।भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद संतुलन, समरसता और विचारशीलता पर टिकी है। किंतु जब धर्म को राजनीतिक औज़ार बना दिया जाता है, तब न केवल आस्था का अपमान होता है बल्कि नागरिकता की समानता पर भी गहरी चोट पहुँचती है। पशु व्यापार पर एकतरफा प्रतिबंध, सांप्रदायिक नीतियों के संरक्षण या धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक प्रयोग ये सभी लोकतंत्र के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर प्रश्नचिह्न बन जाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">       आज के वैश्विक संदर्भ में देखा जाए तो राष्ट्रवाद और धार्मिक कट्टरता के बीच की रेखा अत्यंत सूक्ष्म हो चली है। बीसवीं सदी के जर्मनी, इटली, म्यांमार या पाकिस्तान के उदाहरण हमें बताते हैं कि जब राष्ट्रवाद सैनिक या संप्रदायिक रूप ले लेता है, तो वह फासीवाद या सैन्य तानाशाही का पूर्वरूप बन जाता है। भारत जैसे प्राचीन सांस्कृतिक राष्ट्र के लिए यह और भी चिंताजनक है, क्योंकि यहाँ लोकतंत्र केवल शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का हिस्सा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र का मर्म जनता के विचारों की स्वतंत्रता और उनकी विवेकशीलता में निहित है। जब राजनीतिक दल शासकीय संसाधनों का दुरुपयोग कर सस्ती लोकप्रियता के लिए उपहारों, योजनाओं और प्रलोभनों की बाढ़ लाते हैं, तब यह नैतिक पतन का संकेत है। इससे जनता की कर प्रणाली पर बोझ तो बढ़ता ही है, साथ ही वास्तविक जनहितकारी योजनाओं का प्रवाह भी बाधित होता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे संक्रमणकाल में देश के प्रबुद्ध वर्ग विद्वान, चिंतक, शिक्षक, मीडिया कर्मी और सामाजिक संस्थाएँ सभी को सजग होकर आगे आना होगा। लोकतंत्र की असल शक्ति सत्ता में नहीं, बल्कि नागरिक चेतना में निहित है। यदि विचारशीलता, तर्कशीलता और संतुलन नहीं रहेगा, तो राष्ट्रवाद भी कट्टरता में परिवर्तित हो जाएगा और लोकतंत्र अपनी आत्मा खो देगा।</div>
<div style="text-align:justify;">इसलिए आज आवश्यकता है — राष्ट्रवाद को धार्मिक या राजनीतिक संकीर्णता से मुक्त कर बौद्धिक संतुलन के पथ पर ले जाने की। क्योंकि सच्चा राष्ट्रवाद न मंदिर में है, न संसद में, वह उस विचार में है, जो हर नागरिक को समान अधिकार, समान अवसर और समान सम्मान देता है। जब हम इस विचार को जीना सीख लेंगे, तभी राष्ट्र वास्तव में शक्तिशाली, संवेदनशील और आत्मनिर्भर बन सकेगा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर, चिंतक</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Nov 2025 20:16:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>समावेशी राष्ट्रवाद&quot;.की अवधारणा. विसंगतियों को अवसर में बदलने की प्रक्रिया l</title>
                                    <description><![CDATA[<div>आज़ादी के बाद भारत ने औद्योगिक, कृषि, शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, किंतु सामाजिक विषमताओं का गहरा साया आज भी देश की आर्थिक प्रगति की गति को रोक रहा है। स्वतंत्र भारत के सामने सामाजिक और आर्थिक असमानता सबसे गंभीर समस्या बनकर खड़ी हुई है। जिस देश में जाति, धर्म, भाषा और वर्ग के आधार पर समाज विभाजित हो, वहां आर्थिक विकास का संतुलित प्रवाह बनाए रखना अत्यंत कठिन हो जाता है।</div>
<div>भारतीय समाज में विविधता हमारी सांस्कृतिक पहचान तो है, किंतु यही विविधता जब विषमता में बदल जाती है, तो विकास के मार्ग में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/158167/68fb1ff309eac"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-10/समावेशी-राष्ट्रवाद-की-अवधारणा.jpg" alt=""></a><br /><div>आज़ादी के बाद भारत ने औद्योगिक, कृषि, शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, किंतु सामाजिक विषमताओं का गहरा साया आज भी देश की आर्थिक प्रगति की गति को रोक रहा है। स्वतंत्र भारत के सामने सामाजिक और आर्थिक असमानता सबसे गंभीर समस्या बनकर खड़ी हुई है। जिस देश में जाति, धर्म, भाषा और वर्ग के आधार पर समाज विभाजित हो, वहां आर्थिक विकास का संतुलित प्रवाह बनाए रखना अत्यंत कठिन हो जाता है।</div>
<div>भारतीय समाज में विविधता हमारी सांस्कृतिक पहचान तो है, किंतु यही विविधता जब विषमता में बदल जाती है, तो विकास के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती है। स्वतंत्रता पूर्व काल में सामाजिक विषमताओं ने दासता की जंजीरों को और मजबूत किया, वहीं स्वतंत्रता के पश्चात भी इन विषमताओं ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अनेक स्तरों पर कमजोर किया है। आज जातिगत संघर्ष, क्षेत्रीय असंतुलन, धार्मिक विभाजन और भाषाई विवाद हमारे समाज के लिए गंभीर चुनौतियां बन चुके हैं।</div>
<div> </div>
<div>राजनीति ने इन विषमताओं को सुलझाने के बजाय अक्सर इन्हें भुनाया है। जातीय समीकरण और वर्गीय विभाजन सत्ता तक पहुंचने के साधन बन गए हैं। उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। यही सामाजिक असंतुलन आर्थिक असमानता को जन्म देता है, जो आगे चलकर नक्सलवाद, बेरोजगारी और अपराध जैसे रूपों में फूट पड़ता है।भारत में न केवल जातिगत बल्कि धार्मिक विभाजन भी गहरी जड़ें जमा चुका है। मंदिर-मस्जिद के विवादों ने देश के सामाजिक सौहार्द को बार-बार चोट पहुंचाई है। सांप्रदायिकता के कारण समाज में अविश्वास और असुरक्षा की भावना बढ़ती गई है, जिससे निवेश और विकास का माहौल भी प्रभावित होता है। पश्चिमी अर्थशास्त्रियों ने भी यह स्वीकार किया है कि भारत के आर्थिक विकास में जाति और धर्म आधारित असमानताएं सबसे बड़ी रुकावट हैं, क्योंकि इनकी जड़ें इतिहास में बहुत गहराई तक फैली हुई हैं।</div>
<div> </div>
<div>भाषाई विवाद भी इस समस्या का एक संवेदनशील पहलू है। स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने पर दक्षिण भारत के राज्यों में भारी विरोध हुआ। आज भी बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और उड़ीसा जैसे राज्यों में भाषाई पहचान को लेकर तनाव समय-समय पर उभरते रहते हैं। यह स्थिति न केवल सांस्कृतिक बल्कि आर्थिक एकता को भी प्रभावित करती है।संविधान निर्माताओं ने इन विषमताओं को ध्यान में रखते हुए समानता, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के सिद्धांतों को भारत के संविधान की आत्मा में शामिल किया। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से सरकार ने वर्गविहीन समाज की परिकल्पना की थी, जहाँ आर्थिक अवसर सभी के लिए समान हों। परंतु स्वतंत्रता के 78 वर्ष बाद भी वर्ग, जाति, भाषा और धर्म के नाम पर विभाजन की रेखाएं समाज में स्पष्ट दिखती हैं।</div>
<div> </div>
<div>भारत के आर्थिक विकास की सच्ची अवधारणा तभी संभव है जब सामाजिक समानता को प्राथमिकता दी जाए। पिछड़े वर्ग, दलित, आदिवासी और गरीब तबके को विकास की मुख्यधारा में जोड़ना सबसे आवश्यक कार्य है। यदि ये वर्ग आर्थिक और शैक्षिक रूप से सशक्त बनते हैं, तो गरीबी, भूखमरी और नक्सलवाद जैसी समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएंगीlभारत जैसे विविधतापूर्ण देश में विकास केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि मानसिक एकता से संभव है। हमें ‘समावेशी राष्ट्रवाद’ की अवधारणा को अपनाना होगा — जिसमें हर नागरिक खुद को राष्ट्र की प्रगति का सहभागी माने। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आर्थिक राष्ट्रवाद को एक सूत्र में पिरोकर ही हम एक सशक्त भारत का निर्माण कर सकते हैं।</div>
<div> </div>
<div>आज भी देश में गरीबी, बेरोजगारी, नक्सलवाद, आतंकवाद, भाषावाद और सांप्रदायिकता जैसी विसंगतियां ब्रिटिश शासन काल की तरह समाज को भीतर से कमजोर कर रही हैं। यह स्थिति बताती है कि अभी हमें बहुत लंबा रास्ता तय करना है। आर्थिक नीतियों के साथ-साथ सामाजिक सुधार भी आवश्यक हैं।राष्ट्र के आर्थिक विकास के लिए यह अनिवार्य है कि समाज के हर वर्ग में समान अवसर, समान सम्मान और समान भागीदारी सुनिश्चित की जाए। जब तक समाज में समानता का वातावरण नहीं बनेगा, तब तक आर्थिक प्रगति केवल आंकड़ों तक सीमित रहेगी, वास्तविक जीवन में नहीं उतरेगी।</div>
<div> </div>
<div>अब समय आ गया है कि हम अपने मतभेदों को भुलाकर ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना को सर्वोपरि रखें। यदि हर नागरिक अपनी सामाजिक पहचान से ऊपर उठकर भारतीयता को अपनाए, तो भारत विश्व मंच पर न केवल आर्थिक रूप से बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक रूप से भी अग्रणी राष्ट्र बन सकता है।भारत का आर्थिक उत्थान तभी संभव है जब सामाजिक विषमताओं को मिटाकर राष्ट्रवाद, समरसता और समानता को समाज की मूलधारा बनाया जाए। यही वह पथ है जो भारत को आत्मनिर्भर, सशक्त और विश्वगुरु के रूप में स्थापित कर सकता है।</div>
<div> </div>
<div>यदि भारत को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है, तो सबसे पहले सामाजिक समानता सुनिश्चित करनी होगी। पिछड़े वर्गों, दलितों, आदिवासियों और वंचित तबकों को मुख्यधारा से जोड़ना ही वास्तविक विकास की दिशा में पहला कदम है। जब समाज का हर वर्ग शिक्षित, स्वावलंबी और सशक्त बनेगा, तभी गरीबी, भुखमरी, नक्सलवाद और असमानता जैसी समस्याएं मिटेंगी।</div>
<div> </div>
<div>विकास केवल आर्थिक योजनाओं से संभव नहीं होता; इसके लिए मानसिक एकता और सामाजिक समरसता भी आवश्यक है। हमें “समावेशी राष्ट्रवाद” की उस अवधारणा को अपनाना होगा, जिसमें हर नागरिक खुद को राष्ट्र की प्रगति का सहभागी समझे। सांस्कृतिक और आर्थिक राष्ट्रवाद का समन्वय ही एक नए भारत की नींव रख सकता है।आज भी गरीबी, बेरोजगारी, भाषावाद, आतंकवाद और सांप्रदायिकता जैसी चुनौतियां भारत के विकास की रफ़्तार को रोक रही हैं।</div>
<div>ब्रिटिश शासनकाल की विसंगतियां कहीं न कहीं आज भी हमारी सोच में मौजूद हैं। आवश्यकता है कि हम इन सब विभाजनों से ऊपर उठकर “राष्ट्र प्रथम” की भावना को सर्वोपरि रखें।जब हर भारतीय अपने व्यक्तिगत, भाषाई या धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर ‘भारतीयता’ को अपनाएगा, तभी भारत विश्व मंच पर न केवल आर्थिक बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक दृष्टि से भी अग्रणी राष्ट्र बन सकेगा।</div>
<div> </div>
<div><strong>संजीव ठाकुर, लेखक, चिंतक</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Oct 2025 16:02:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sandeep Kumar ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उतरप्रदेश और बिहार में नींव से खिसकते अनेक राजनीतिक दल</title>
                                    <description><![CDATA[<div>राजनीतिक दल चुनाव लड़ने के लिए बनाए जाते जाते हैं।  उसका आधार एक विचार होता है। उसके लिए संगठ बनता है। जो लोगों को उस विचार के लिए प्रेरित करता है। यही नियम है। इसे उत्तर प्रदेश के  चुनाव मेंभी  ध्वस्त होते देखा गया  था। हर दल अपनी नींव से खिसक गए हैं। मानो उसमें भूकंप आ गया हो। इसे हर पल में घट रही घटनाओं के उदाहरण से समझा जा सकता है।पहले उस दल को देखना उचित ही होगा जो उत्तर प्रदेश में पांच साल से शासन में थ। वह सपा है। यह पार्टी सितंबर, 2016 से राजनीतिक भूकंप</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/156465/68df77f38ac57"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-10/उतरप्रदेश-और-बिहार-में-नींव-से-खिसकते-अनेक-राजनीतिक-दल.png" alt=""></a><br /><div>राजनीतिक दल चुनाव लड़ने के लिए बनाए जाते जाते हैं।  उसका आधार एक विचार होता है। उसके लिए संगठ बनता है। जो लोगों को उस विचार के लिए प्रेरित करता है। यही नियम है। इसे उत्तर प्रदेश के  चुनाव मेंभी  ध्वस्त होते देखा गया  था। हर दल अपनी नींव से खिसक गए हैं। मानो उसमें भूकंप आ गया हो। इसे हर पल में घट रही घटनाओं के उदाहरण से समझा जा सकता है।पहले उस दल को देखना उचित ही होगा जो उत्तर प्रदेश में पांच साल से शासन में थ। वह सपा है। यह पार्टी सितंबर, 2016 से राजनीतिक भूकंप के झटके लगातार झेल रही है। वह झटका जारी है। जिसने पार्टी बनाई वह बेगाने शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तरह हो गए हैं। वे मुलायम सिंह थे। जो कब क्या बयान देकर विवाद छेड़ देते, इसे वे भी नहीं जानते थे।समाजवादी ड्रामा तीन महीने तक चला।</div>
<div> </div>
<div>बाप-बेटे के बीच  विवादों की स्क्रिप्ट लिखी गई। लेकिन इतने समय के विरोधाभास के बाद आखिर जीत तो अखिलेश की हुई।कौन माता पिता इस दुनिया मे अपनी संतान से हारते हुए देखना चाहते है। हर अभिभावकों के मन मे एक ही इच्छा रहती है कि मैं भले ही हार जाऊ,लेकिन मेरी संतान हर कदम पर जीत की खुशियां मनाए और अंततः वही हुआ। मुलायम सिंह कोर्ट से हार गए। मान सकते हैं कि वे सदमे बहुत भारी थे। वैसे ही जैसे घर के ढेर हो जाने घर मालिक होता है। सपा के दूसरे कद्दावर नेता शिवपाल बोल पड़े थे कि चुनाव बाद नया दल बनाएंगे। इस तरह की उथल-पुथल ने अखिलेश यादव का मनोबल तोड़ दिया और वे उस कांग्रेस की गोद में जा बैठे।जोकि कांग्रेस का उतरप्रदेश में जनाधार नही था।अगर वो  जिंदा नही हुई और जिंदा हो जाती तो सपा को खा जाती।</div>
<div> </div>
<div>बसपा का हाल उससे भी बुरा था। वह कायदे से राजनीतिक दल बनने के रास्ते पर चली ही नहीं। वह जाति और मजहब के गठजोड़ की उपज है। बीते त 12 सालों से बसपा का घर उजड़ गया है। उसके ज्यादातर नेता भाजपा में जा चुके हैं। उनमें वे भी हैं जो बसपा के जन्मजात नेता रह थे। कुछ सालों पहले की बसपा को आज पहचानना कठिन है। हाथी की चाल मन्द पड़ चली है। मायावती की कोई राजनीतिक हलचल दिखाई नही देती है। कोई भी राजनीतिक दल दो बातों से पहचाना जाता है।</div>
<div> </div>
<div>विचार और नेतृत्व से। बसपा इन दोनों रूपों में भी अपनी पहचान खो चुकी है। वह खुद को खोज रही है। इस भटक़ाव में वह उत्तर प्रदेश में दलित-मुस्लिम गठजोड़ का ताना-बाना बुन रही होगी। ध्रुवीकरण पर उसकी आस टिकी है।योगी आदित्यनाथ के आने के बाद पूर्व पार्टियां सत्ता से बंधी हुई थी।आज के वर्तमान में उनके शासन को याद तक नही करते है।जंगलराज के तमगे से उपजी ये पार्टियां लोगो पर सितम ढाहने में अपना वर्चस्व स्थापित करचुकी थी। इनके शासनकाल में लखनऊ गुंडा और माफियो की शरणस्थली बन चुका था।</div>
<div> </div>
<div>कह सकते हैं कि2017 के पहले उत्तर प्रदेश गहरे राजनीतिक संक्रमण के दौर में  था।चुनाव ने उसे तेज कर दिया है। इसके साफ-साफ दो कारण थे। पहला यह कि विधानसभा का चुनाव पिछले परिणाम से उभरी राजनीति के उस चुनाव में हर दल ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। भारी जोखिम मोल ले ली थी।दूसरा यह कि चुनाव परिणाम से हर दल बदल जाएगा। लेकिन हर दल में 'परकाया प्रवेश' हो चुका था।</div>
<div> </div>
<div>इर्द-गिर्द नहीं हो रहा था।2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम से जो हस्तक्षेप उत्तर प्रदेश की राजनीति में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने किया, वही प्रमुख आधार हो गया था। दूसरा यह कि चुनाव उत्तर प्रदेश की सत्ता कौन संभाले, इसके लिए हो रहा था। पर यह 2019 के लोकसभा चुनाव का प्रहसन भी हो गया। इससे कोई दल बचा नहीं था। भाजपा भी नहीं। जितना असंतोष भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं मेंउस समय था  उतना कभी नहीं था।क्योकि भाजपा की 2014 के पहले शुरुआती दौर था। बगावत की आवाज चारों ओर से उठ रही थी। उसे शांत करने के लिए खून पसीना एक किया जा रहा था।</div>
<div> </div>
<div>हर चुनाव में थोड़ा बहुत असंतोष तो होता ही है। उस बार का अकल्पनीय था। इसके कारण बहुत साफ थे।</div>
<div>भाजपा में शामिल होने वालों की संख्या हर रिकार्ड तोड़ चुकी थी। कांग्रेस, सपा और बसपा से आए नेताओं को भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया था। उनकी संख्या 155 से ज्यादा थी।यानी इतने क्षेत्रों में भाजपा नेता अवसर से वंचित हो गए थे। वे बड़ी उम्मीद में थे। तब भाजपा का उम्मीदवार होना ही चुनाव जीतने की पक्की गारंटी मानी जा रही थी।</div>
<div> </div>
<div> भाजपा में आए हुए समूह मेंकोई गीले शिकवे नही थे। अक्सर चुनाव में परिणाम के बाद भाजपा अपनी समीक्षा में पाती रही है कि टिकट का बंटवारा ठीक नहीं हुआ था। उससे सबक लेकर कोई कदम भाजपा नेतृत्व पहले नहीं उठाता था। तब अमित शाह ने जो उम्मीदवार चयन की प्रणाली अपनाई वह हस्तक्षेप से अछूती रही थी। उन नेताओं की नहीं चली जो टिकट की बंदरबाट के लिए बदनाम हुए। इसमें वे भी कुछ नहीं कर सके जो 'नैतिक सत्ता' का दबाव बनाकर हस्तक्षेप कर लेते थे।</div>
<div> </div>
<div>उतरप्रदेश में कांग्रेस सालों से हासिए पर है। अपने पुनरोदय के लिए हाथ-पांव मार रही थी। राहुल गांधी की खाट यात्रा उसी कड़ी में थी। अगर वही राह कांग्रेस ने ली होती तो वह अपने बलबूते पर चुनाव लड़ती। उसने बिहार के अनुभव से फायदा इसमें ही देखा कि सपा की सहयोगी पार्टी बन जाए। इसी तरह अजीत सिंह का लोकदल कहीं आसरे की खोज में था। उसे सहयोगी बनाने से सपा हिचक गई। क्योंकि अफसरों ने अखिलेश यादव को बताया कि अजीत सिंह के आने से -प्रतिक्रिया में मुसलमान बसपा में चले जाएंगे।</div>
<div> </div>
<div>हर दल की राजनीति पर सरसरी निगाह डालने से कुछ निष्कर्ष निकलते हैं। एक यह है कि इस चुनाव में हर दल ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। भारी जोखिम मोल ले ली थी। दूसरा यह कि चुनाव परिणाम से हर दल बदल जाएगा। वह नहीं रहेगा जो होता था और है। क्योंकि हर दल में 'परकाया प्रवेश' हो चुका था।</div>
<div> तीसरा यह कि हर दल में पीढ़ी और पद परिवर्तन का दृश्य है। नई पीढ़ी नेतृत्व संभालने वाली रही। चौथा यह कि हर दल की नजर युवा मतदाता पर थी। युवा के नखरे पर राजनीति का कदम ताल तय होने  जा रहा था।बिहार की यही हालत है।</div>
<div> </div>
<div>लालू की राजद कई वर्षों से राजनीतिक गलियारों से बाहर है।नीतीश कुमार के गठबंधन के कारण तेजस्वी कुछ समय के लिए उपमुख्यमंत्री बन गए थे।जेडीयू कई वर्षों से गठबंधन की सरकार चला रही है। बिहार में कई प्रादेशिक दल है जो जशिये पर धकेल दिए गए है।उनका नाम राजनैतिक मंच पर चुनाव के समय ही सुनने को मिलता है। उतरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश ने भूल की थी,वही भूल तेजस्वी यादव कांग्रेस को साथ लेकर कर रहे है।बिहार की राजनीति में तीस वर्षों से सत्ता से बाहर कांग्रेस का भविष्य एक सर्वे पर भरोसा करें तो कांग्रेस के पास आज भी बिहार में जनाधार नही  है।नीतीश कुमार में चुनाव से पूर्व 75 लाख महिलाओं के खाते में दस दस हजार ट्रांसफर किये है।उससे और अधिक रकम ऋण के तौर पर देने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश ने घोषणा की है।</div>
<div> </div>
<div><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Oct 2025 18:20:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sandeep Kumar ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>करुणा,प्रेम और संतुलन की अधिष्ठात्री शक्ति माँ कात्यायनी।</title>
                                    <description><![CDATA[<div>नवरात्रि के छठे दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की उपासना की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार जब महिषासुर का अत्याचार बढ़ा और देवगण असहाय हो गए, तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महादेव ने अपने तेज से एक दिव्य ज्योति उत्पन्न की। उसी तेज से एक परम रूपवती कन्या प्रकट हुई और महर्षि कात्यायन के तपोबल से उनके घर अवतरित हुईं। इसीलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा। महिषासुर के संहार के लिए अवतरित यह शक्ति स्वरूपा सिंह पर आरूढ़, चार भुजाओं से अलंकृत और स्वर्ण के समान आभामयी हैं। उनके दाहिने हाथ अभय और वर मुद्रा में हैं,</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/156024/mother-katyayani-the-presiding-power-of-compassion-and-balance"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-09/करुणा,प्रेम-और-संतुलन-की-अधिष्ठात्री-शक्ति-माँ-कात्यायनी।.jpg" alt=""></a><br /><div>नवरात्रि के छठे दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की उपासना की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार जब महिषासुर का अत्याचार बढ़ा और देवगण असहाय हो गए, तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महादेव ने अपने तेज से एक दिव्य ज्योति उत्पन्न की। उसी तेज से एक परम रूपवती कन्या प्रकट हुई और महर्षि कात्यायन के तपोबल से उनके घर अवतरित हुईं। इसीलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा। महिषासुर के संहार के लिए अवतरित यह शक्ति स्वरूपा सिंह पर आरूढ़, चार भुजाओं से अलंकृत और स्वर्ण के समान आभामयी हैं। उनके दाहिने हाथ अभय और वर मुद्रा में हैं, जबकि बाएँ हाथ कमल और तलवार से सुशोभित हैं। यही रूप धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश का प्रतीक है।</div>
<div> </div>
<div>मां कात्यायनी का स्वरूप केवल युद्धिनी देवी का ही नहीं, बल्कि करुणा और प्रेम की अधिष्ठात्री का भी है। वे अनाहत चक्र की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं, जिससे साधक के भीतर सामंजस्य, करुणा और दिव्य प्रेम जागृत होता है। भक्ति-परंपरा में मां कात्यायनी का विशेष स्थान है। भागवत महापुराण में वर्णन आता है कि वृंदावन की गोपिकाओं ने श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए कात्यायनी व्रत किया और देवी का यह मंत्र जपा—</div>
<div>"कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि । नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः" इस मंत्र की महिमा आज भी वैवाहिक जीवन में सौभाग्य और अवरोध निवारण के रूप में मानी जाती है। जिन कन्याओं के विवाह में बाधाएँ आती हैं, वे मां कात्यायनी की उपासना कर इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करें तो देवी उनकी मनोकामना पूर्ण करती हैं।</div>
<div>सप्तश्लोकी दुर्गा में उनकी महिमा का वर्णन इस प्रकार किया गया है—</div>
<div> </div>
<div>"चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना । कात्यायनी शुभं दद्यात् देवी दानवघातिनी ॥ "नवरात्रि के छठे दिन मां की उपासना अत्यंत पवित्र मानी जाती है। साधक को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए, फिर पीले या सुनहरे वस्त्र पहनकर मां का ध्यान करना चाहिए। पूजा में रोली,अक्षत, पुष्प और धूप-दीप अर्पित करें तथा भोग के रूप में शहद समर्पित करें। यह मधु जीवन में मधुरता और सौहार्द का प्रतीक है।  उनकी उपासना से अविवाहित कन्याओं को इच्छित वर की प्राप्ति होती है, दांपत्य जीवन में प्रेम और मधुरता बनी रहती है तथा साधक को साहस और आत्मबल की प्राप्ति होती है। भय, चिंता और नकारात्मकता का नाश कर वे जीवन में सौभाग्य और संतुलन की स्थापना करती हैं। भागवत पुराण में वर्णन मिलता है कि वृंदावन की गोपिकाओं ने श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए कात्यायनी व्रत किया था। तभी से यह व्रत विशेषकर विवाह योग्य कन्याओं के लिए अत्यंत फलदायी माना गया।उनकी स्तुति में अनेक शास्त्रीय श्लोक उपलब्ध हैं। सप्तश्लोकी दुर्गा में मां</div>
<div> </div>
<div>कात्यायनी का गुणगान इस प्रकार है—</div>
<div>"चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना । कात्यायनी शुभं दद्यात् देवी दानवघातिनी ॥ "</div>
<div>इसी प्रकार विवाह बाधा निवारण हेतु प्रसिद्ध मंत्र है—</div>
<div>"कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि । नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः" </div>
<div>इन श्लोकों के जप से साधक को विशेष कृपा प्राप्त होती है।नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की उपासना करते समय स्नानादि से शुद्ध होकर पीले या सुनहरे वस्त्र धारण करने चाहिए। स्वच्छ पूजा स्थल पर मां का आवाहन कर रोली, अक्षत, पुष्प और धूप-दीप अर्पित करना चाहिए। इस दिन विशेष भोग के रूप में शहद अर्पित करने का विधान है, जिससे जीवन में मधुरता और शांति आती है।वास्तु शास्त्र की दृष्टि से मां कात्यायनी का संबंध दक्षिण दिशा से माना गया है। इस दिन घर की दक्षिण दिशा की विशेष सफाई और सजावट करनी चाहिए। उस दिशा में दीपक जलाने और पुष्प अर्पित करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। शहद से मिश्रित जल का छिड़काव घर के वातावरण में सामंजस्य और सौहार्द को बढ़ाता है।</div>
<div> </div>
<div>अविवाहित कन्याएँ यदि दक्षिण दिशा की ओर मुख करके मां कात्यायनी का ध्यान करें, तो विवाह संबंधी बाधाएँ दूर होती हैं। मां कात्यायनी के माध्यम से सक्रिय होने वाला अनाहत चक्र हृदय में प्रेम और संतुलन का भाव जागृत करता है, जिससे परिवार और समाज में समरसता आती है। अतः मां कात्यायनी का स्वरूप केवल महिषासुर संहारिणी का नहीं, बल्कि जीवन में प्रेम, सामंजस्य और सौभाग्य की स्थापना का भी प्रतीक है। उनका आशीर्वाद साधक को सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की उन्नति प्रदान करता है। नवरात्रि के छठे दिन की उनकी उपासना न केवल विवाह बाधाओं को दूर करने का मार्ग दिखाती है, बल्कि परिवार और समाज में सुख, शांति और संतुलन स्थापित करने का भी उपाय है।</div>
<div> </div>
<div>मां कात्यायनी की कृपा से साधक को साहस, सौभाग्य और शांति का वह दिव्य वरदान मिलता है जो जीवन को पूर्ण और अर्थपूर्ण बना देता है। उनका आशीर्वाद न केवल सांसारिक जीवन को सुखमय बनाता है, बल्कि साधक को आत्मिक शांति और आध्यात्मिक ऊँचाई भी प्रदान करता है। वे केवल दानव संहारिणी नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और धर्म-संरक्षण की अधिष्ठात्री हैं.नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की उपासना कर श्रद्धा-भक्ति से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि—</div>
<div>"हे मां! हमारे जीवन से भय और क्लेश का नाश करें, हमारे हृदय को करुणा और प्रेम से परिपूर्ण करें, और हमारे परिवार एवं समाज में धर्म, शांति और सौहार्द की स्थापना करें।"</div>
<div>जय माता दी, जय माता दी, जय माता दी।</div>
<div> </div>
<div><strong>संजीव ठाकुर,लेखक,चिंतक, स्तंभकार,</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>विचारधारा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Sep 2025 18:07:11 +0530</pubDate>
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