सर्वोत्तम उपचार……

आर्यन अत्यंत सुशील एवं कुशाग्र बुद्धि का छात्र था. वह किसी से लड़ाई झगड़ा बिल्कुल नहीं करता था, बल्कि अधिकतर अपने घर से लगभग डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित विद्यालय अन्य छात्रों के साथ ही जाया करता था.पढ़ने लिखने में अत्यंत तेजस्वी आर्यन को कहानियाँ पढ़ने का बड़ा शौक था, और सिर्फ पढ़ना ही नहीं पढ़ने के बाद वह कहानियाँ अन्य छात्र छात्राओं को विद्यालय आते जाते समय अथवा खाली समय में सुनाता रहता था.इस कारण अन्य छात्र छात्राएं आर्यन की बड़ी इज्जत करते थे, परन्तु यह सब सहपाठी प्रमोद को बिलकुल अच्छा नहीं लगता था. वह अत्यंत दुष्ट प्रवृत्ति का था.

हर दिन किसी न किसी से झगड़ा, मारपीट बेवजह किया करता था. इन्ही हरकतों की वजह से कोई भी छात्र-छात्रा उसके साथ आना-जाना और खेलना-कूदना पसंद नहीं करते थे. कई बार प्रमोद आर्यन से भी भिड़ चुका था, परन्तु कोई बड़ी वजह बनने से पहले आर्यन उससे पीछा छुड़ा लिया करता था. अत्यंत विचित्र बात यह थी कि प्रमोद की शैतानी प्रवृत्ति के कारण उसके घर वाले भी बड़े परेशान रहते थे, हालांकि उसकी माँ हमेशा उसका बचाव करती थी, जिसके कारण प्रमोद के हौंसलों में पर लग जाते थे, परन्तु वह अपने पिता जी एवं गुरु जी से लगभग नित्य प्रतिदिन ही डांट खाता रहता था. यह उसकी हर दिन की आदत में शुमार हो गया था, जिसके कारण उसकी ढीढता और बढ़ती जा रही थी.

 नित्य प्रतिदिन आर्यन प्रमोद की हरकतों को देख कर दुखी रहता था, क्योंकि वह अपने सभी सहपाठियों को बहुत मानता था, और मानता भी क्यों नहीं क्योंकि सभी साथी उससे इतना लगाव जो रखते थे. आर्यन की आदतों ने सहपाठियों को अपना मुरीद बना रखा था. सहपाठी आर्यन की किसी भी बात को टालते नहीं थे, कोई प्यार से उसे अपनी साइकिल की सवारी कराने का प्रयत्न करता तो कोई उसे अपने हांथों पर बिठा कर झूला झूलाता, कोई उसका बस्ता ले लेता, कोई उसकी पाटी चमका देता. मजाल क्या थी,

जो उसकी किसी बात की शिकायत आज तक उसके घर या विद्यालय पहुँची हो.अपने साथियों सहपाठियों के इसी स्नेह व सानिध्य के कारण आर्यन हमेशा यह सोंचता रहता था कि वह अपने सहपाठियों को इसढीठ प्रमोद से कैसे बचाए, कोई सही तरीका नजर नहीं आ रहा था, क्योंकि सामान्य शिकायतों को अब तक दैनिक क्रिया समझ कर गुरु जी द्वारा भी अब कोई बड़ी प्रतिक्रिया नहीं होती थी. बल्कि सामान्य रूप से डांटकर सचेत कर दिया करते थे. सामान्यतः आर्यन से दूर रहने वाला प्रमोद आज आर्यन से अकारण भिड़ गया था.

आर्यन को प्रमोद को सबक सिखाने के लिए अपने साथियों को बचाने के लिए एक ऐसे ही अवसर की तलाश थी. मौके की नजाकत को भांपते हुए, इससे पहले की अन्य साथी उसे बचाने के लिए आगे बढ़ते आर्यन खुद ही चालाकी से  इस प्रकार छीना-छपटी के दौरान प्रमोद से बिंध गया, जिससे अन्य लड़कों को लगे कि प्रमोद आर्यन से भिड़ा हुआ है.प्रमोद को यह प्रत्याशा बिल्कुल भी नहीं थी, उसने गलती से भी नहीं सोंचा था कि हमेशा उससे दूर रहने वाला आर्यन आज उससे खुद ही बिंध जाएगा. जबतक साथीगण बीच बचाव करते आर्यन और प्रमोद में हाथापाई हो गई. आर्यन बुद्धिकौशल का भरपूर इस्तेमाल करते हुए तेज-तेज चिल्लाने लगा. उसने अपना मुंह और एक तरफ का जबड़ा पकड़ रखा था. अन्य लड़के पूंछे जा रहे थे कि “क्या हुआ? क्या हुआ?” मौका देखकर आर्यन ने ऐसी जगह थूक दिया,

जहाँ पर कुछ देर पहले का ही पान खाया हुआ किसी ने थूक दिया था, और इशारा करके अपने साथियों को देखने के लिए कर दिया था, तथा पूर्व की भांति मुंह और एक तरफ का जबड़ा हांथ से दबा लिया, जिससे सभी साथी यह समझ लें कि प्रमोद ने आर्यन के जबड़े पर भीषण वार किया है, जिसके कारण उसके मुंह से खून निकल आया है. एक लड़के ने जैसे ही पान का लाल थूक देखा तो वह चिल्लाया अरे आर्यन को खून निकल आया है. अब सारे लड़के उस जगह को देखने लग गए थे,. आर्यन की युक्ति काम कर गई थी,

सबने यह समझ लिया था वास्तव में खून है, आर्यन ने सभी को विद्यालय की तरफ तेजी से चलने का इशारा करके सबको सरसरी निगाह से ही देखने दिया था, जिससे साथियों को उसकी चाल का पता न चल सके. स्थिति को देखकर आज प्रमोद पहली बार इतना सहमा था कि उसने खून वाली जगह को देखना गंवारा न समझा. शायद उसे भी यही लगा था कि उसका घूंसा आर्यन के जबड़े पर लग गया है. खैर धीमे-धीमे सब बच्चे विद्यालय पहुँच गए थे. गुरु जी भी विद्यालय पहुँच चुके थे. आर्यन के कठोर परिश्रमी होने के कारण उसे गुरु जी का विशेष प्यार हासिल था. आर्यन ने जाते ही रुआंसे मन से पूरे नाटकीय घटनाक्रम को वास्तविक जामा पहनाते हुए गुरु जी से कह सुनाया. 

साथीगण जो पहले से ही अत्यंत आक्रोशित थे, एक तो आर्यन जैसे प्रिय साथी के साथ मारपीट दूसरे आए दिन प्रमोद की सबसे ठनाठनी. आज हर एक ने पूरे घटनाक्रम को बढ़-चढ़ कर गुरु जी से बताया था. यह भी बताया कि “किस प्रकार प्रमोद के घूंसे की वजह से आर्यन के मुंह से खून निकल आया था.” इतना सुनते ही गुरु जी की आंखें लाल हो गई थी. उन्होंने तुरंत बड़े छ:-सात लड़कों को आदेश दिया “प्रमोद को बुलाकर लाओ और बुलाने से न आए तो उसे टांग कर लाओ”. प्रमोद आज डर की वजह से बाहर ही रुक गया था, उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी अंदर आने की. लड़कों ने उसे आवाज देकर कहा “प्रमोद अंदर आओ गुरु जी बुला रहे हैं.” यह सुनते ही स्थिति को समझते हुए प्रमोद भाग खड़ा हुआ.

लड़कों ने उसका पीछा किया, काफी दूर दौड़ाने के बाद आखिर वह पकड़ में आ ही गया था. लड़के उसे टांगकर अंदर कमरे में ले आए थे. गुरु जी अन्य लड़कों को कमरे से बाहर कर चुके थे. उन्होंने एक मानीटर लड़के से बेशर्मा का डण्डा लाने के लिए कहा. उस समय स्कूल के पास खांई व गड्ढे में लगे उसी के पौधों को छड़ी के रूप में प्रयोग किय जाता था. मानीटर भी शायद प्रमोद से त्रस्त हो चुका था. आज वह एक के बजाय दो डण्डे तोड़ लाया था. गुरु जी ने डण्डे देखे और हल्का सा मुस्कराते हुए कहा “तुम्हे डण्डे भी नहीं लाना मालूम है, ये ऊपर से तोड़ लाए हो” डराने के अंदाज में बोले “ये तो एक ही बार में टूट जाएंगे,

जाओ जड़ की तरफ के मोटे और मजबूत डण्डे लेकर आओ.” इस बार मानीटर के साथ दो लड़के और दौड़ पड़े थे. इस बार तो सचमुच मोटे और मजबूत डण्डे लेकर आए थे वह सब. इसके बाद गुरु जी ने आज प्रमोद की जमकर सुताई कर दी थी, और साथ ही डराने की नियत से सख्त हिदायत भी दे दी थी कि इस बार फिर तुमने किसी से लड़ाई झगड़ा किया, तो तुम्हारे हांथ पैर तोड़ देंगे, तुम्हे तुम्हारे घर वालो के सामने गाँव में ही मारेंगे. ऐसा शायद इसलिए गुरु जी ने कहा था जिससे प्रमोद दुबारा ऐसी हरकतें न करे. उस दिन की आर्यन की युक्ति इतना काम आई कि प्रमोद ने फिर कभी आर्यन और उसके साथियों को आते-जाते नहीं छेड़ा. उसे सबक मिल गया था, जिसकी उसे आवश्यकता थी.

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