मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखने की आवश्यकता…! प्रदीप दुबे (पत्रकार )

जो हमारी खुशी सुनिश्चित करते, वह भी हमारी तरह है इंसान.. । गौरव पुरी (रिपोर्टर ) भदोही । आजकल शादियों का मौसम चल रहा है। हर जगह वैवाहिक कार्यक्रम हो रहे हैं। कार्यक्रमों की सुचारु व्यवस्था के लिए बाहरी लोगों को काम पर बुलाया जाता है। टेंट वाले, डीजे, हलवाई, रसोई बनाने वाले आदि हर

जो हमारी खुशी सुनिश्चित करते, वह भी हमारी तरह है  इंसान.. ।

गौरव पुरी (रिपोर्टर )

भदोही ।

आजकल शादियों का मौसम चल रहा है। हर जगह वैवाहिक कार्यक्रम हो रहे हैं। कार्यक्रमों की सुचारु व्यवस्था के लिए बाहरी लोगों को काम पर बुलाया जाता है। टेंट वाले, डीजे, हलवाई, रसोई बनाने वाले आदि हर शादी में नजर आते है और आमतौर पर हम उनके साथ दुर्व्यवहार होते हुए देखते हैं।

शादी-ब्याह के जश्न में हम यह भूल जाते हैं कि जिन लोगों को हमने पैसे देकर काम पर बुलाया है, वे हमारी खुशी सुनिश्चित करते हैं और वे भी हमारी तरह इंसान ही हैं। अक्सर देखा जाता है कि लोग टेंट के बिस्तरों को बुरी तरीके से प्रयोग करते हैं और उम्मीद करते हैं कि टेंट वाला हमें हर बार नए बिस्तर ही दे।

उसी तरह दूसरे काम पर आए लोगों के प्रति हीन बर्ताव साफ नजर आता है। उनके न तो खाने का ध्यान दिया जाता और न ही सोने का। अपने मनोरंजन के लिए हम न जाने कितने लोगों के साथ बुरा बर्ताव कर बैठते हैं।आधुनिकता के इस बढ़ते युग में हमें मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखने की आवश्यकता है।

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