“अंधविरोध की दूषित राजनीति”

लेखक – इंद्र दमन तिवारी
तरबगंज गोण्डा

प्रधानमंत्री ने देशवासियों से एक अपील की थी, अपने घर रहते हुए दिये, मोमबत्ती, या मोबाईल की फ़्लैश लाईट के ज़रिए रोशनी करने की ताक़ि एक तो लोग अलग-थलग रहते हुए अकेलापन न महसूस करें औऱ दूसरे इस संकल्प से ओतप्रोत हों कि हम सभी मिलकर इस संकट को अवश्य ही परास्त कर देंगे।

लेक़िन विकट परिस्थितियों में भी संकीर्ण मानसिकता का परिचय देने एवं नकारात्मक विचारों का ढ़ोल पीटने से कुछ लोग क़भी भी बाज़ नहीं आ सकते हैं, उनका मानना है कि दिया जलाना मूर्खतापूर्ण है तो विभिन्न सुअवसरों पर होने वाले कैंडल लाईट मार्च के विषय में क्या कहा जाना चाहिए !

छद्म लिबरल ज़मात के अग्रदूत औऱ विशेषकर कॉंग्रेस के नेताओं ने प्रधानमंत्री के इस निवेदन के विरोध में शरारत भरे दुष्प्रचार से माहौल बनाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा कि प्रधानमंत्री कोरोना के संक्रमण को थामने के बज़ाए लोगों का ध्यान बाँटने के लिए इस प्रकाशोत्सव का आयोजन कर रहे हैं। नकारात्मकता की पराकाष्ठा तो तब हो गई जब इस आयोजन को ले कर भ्रामक प्रचार किया गया कि घरों की सारी लाईटें बन्द कर देने से ग्रिड फ़ेल हो जाएगा, हैरानी की बात ये है कि ये मिथ्या प्रचार यह जानते हुए भी किया गया कि प्रति वर्ष ‘अर्थ आवर’ के मौक़े पर देश ही नहीं अपितु दुनिया भर में कुछ क्षणों के लिए बत्तियों को बंद कर दिया जाता है औऱ कोई ग्रिड फ़ेल जैसी घटना नहीं होती..

परिणामस्वरूप बिजली मंत्रालय को यह स्पष्ट करने के लिए आगे आना पड़ा कि ग्रिड फ़ेल होने की आशंका निराधार हैं..दरअसल देश में एक विशेष क्रांतिकारी तबक़ा है जो सरकार के प्रत्येक हितकारी निवेदन पर थू थू करने का औऱ करवाने का कोई भी मौक़ा नहीं छोड़ता, हमने देखा है कि वो पहले ताली बजाने पर थू थू कर रहे थे, अब दिया जलाने पर, लेक़िन विचारणीय प्रश्न है कि वे क्यों ज़हालत पर क़भी नहीं थूकते हैं ? क्योंकि इससे तथाकथित बुद्धिजीवी ज़मात में उनकी रेटिंग कम होने की आशंका रहती है ! यह उनका वैचारिक थूक है..

हाँ,जिन्हें यह लगता था कि अंधकार से प्रकाश की ओर जाने के प्रधानमंत्री के संकल्प वाली इस अनूठी पहल से कुछ नहीं हो पाना है, वे इस तथ्य से भी अवगत रहे ही होंगे कि इसमें भाग लेना कोई अनिवार्य नहीं था, इस सकारात्मक पहल से असहमत होने में कोई हर्ज़ नहीं था लेकिन ऐसे लोगों को कमश्कम नकारात्मक माहौल बनाने से तो बाज़ आना चाहिए था। आख़िर इस गहन संकटकाल में जनमानस के मनोबल बढ़ाने को, उनमें एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने की दिशा में उठाये गए एक क़दम के विरोध के क्या औचित्य हैं ?

ऐसे संबल प्रदान करने वाले आयोजनों का एक विशेष महत्व होता है, जिससे व्यथित देशवासियों में कोरोना से लड़ाई को लेकर एक संदेश जाएगा, साथ ही शायद पहली बार स्वयं को लंबे समय से घरों में बंद किये हुए औऱ सामाजिक दूरी के आह्वान का पालन कर रहे लोग अब एकदूसरे को एकता के सूत्र में बंधा हुआ पाएँगे..

1 COMMENT

  1. सही कहे हैं दद्दा …100 फीसदी सहमत ! 👍

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