आत्मज्ञान के लिए ज्ञान और अभिमान में संतुलन आवश्यक

जीवन में पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान धन-सम्पत्ति प्राप्त करने की इच्छा प्रत्येक व्यक्ति में होती है। किन्तु आत्मज्ञान की इच्छा विरले व्यक्तियों में ही होती है। सोना से अनेक गहनों का निर्माण किया जाता है ये गहने बहुत ही उपयोगी होते हैं। किन्तु इन गहनों में प्रयुक्त सोना शुद्ध नहीं होता है बल्कि उसमें मिलावट होती है। शुद्ध सोने को आत्म-ज्ञान की और गहनों को सांसारिक ज्ञान की संज्ञा दी जा सकती है। उपयोगिता की दृष्टि से गहना ज्यादा कीमती है लेकिन यथार्थ की दृष्टि से सोना ज्यादा कीमती है। गहना रुप सँवारने के कार्य में आता है

जबकि शुद्ध सोना को सुरक्षित रखा जाता है। सांसारिक ज्ञान जीवन के वाह्य रुप को सुन्दर बनाने सजाने एवं सँवारने के लिए उपयोगी होता है किन्तु आत्मज्ञान आत्मा-शक्ति को जागृत कर उसको स्वच्छ तथा उज्वल बनाने के लिए आवश्यक होता है। कुछ व्यक्ति सांसारिक ज्ञान को ही सब कुछ मानते हैं और आत्मिक ज्ञान के विषय में स्वप्न में भी विचार नहीं करते हैं। ऐसे ही लोगों की आत्माएं भूत-पिचाश के रुप में भटकती हैं। सांसारिक ज्ञान आवश्यक है किन्तु सांसारिक ज्ञान का अहंकार घातक है। यूँ तो अहंकार किसी के लिए भी घातक है l लेकिन इस संदर्भ में यह दोहरा घातक होता है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार आग के साथ घी। आग की एक चिंगारी दिया जलाकर उजाला भी कर सकती है l

किन्तु यही चिंगारी आग भी लगा सकती है। सांसारिक ज्ञान के साथ यदि अहंकार  न हो तो यह भी आत्म-प्रकाश एवं आत्मोन्नति में सहायक होता है] किन्तु इसके साथ अहंकार मिलता है तो यह व्यक्ति के जीवन की दिशा को कुमार्ग की तरफ मोड़ देता है। यह बड़ी ही सामान्य बात है कि सांसारिक ज्ञान के साथ प्रायः अहंकार मिल ही जाता है और मेहनत एवं परिश्रम से अर्जित ज्ञान को बेकार कर देता है। जो ज्ञान व्यक्ति के मानवीय जीवन एवं आत्मिक जीवन दोनों को ही सुन्दर बना सकता है] वही ज्ञान उसके मानवीय जीवन का ही सत्यानाश कर देता है। जो ज्ञान सोना के समान कीमती होता है वह अहंकार के मिलते ही कंकण- पत्थर के समान हो जाता है। इसलिए एक ज्ञानी व्यक्ति को बड़े ही जतन से रहना पड़ता है] बड़ी ही सजगता पूर्वक एक-एक कदम चलना पड़ता है।   

  जीवन की एक महत्वपूर्ण अंग हैं गलतियां] व्यक्ति कितना भी सजग हो,कितना भी सतर्कता पूर्वक चले उससे कहीं न कहीं गलतियां हो ही जाती हैं। कुछ लोग अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं] और कुछ लोग अपनी गलतियों को बिलकुल भी स्वीकार करना नहीं चाहते हैं] जैसे कि वे ही ईश्वर का प्रतिरुप हों। साक्षात धर्मस्वरुप युधिष्ठिर भी इस कर्म भूमि पर गलती से न बच सके तो साधारण इंसान कैसे बच सकता है। गलतियां हवा में उड़ते कीटाणुओं के समान हैं जो कि प्रत्येक जगह व्याप्त रहते हैं] कितनी भी सतर्कता बरती जाय ये कीटाणु संपर्क में आ ही जाते हैं। जिस प्रकार कीटाणु साँसों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं] उसी प्रकार गलतियां भी व्यवहार के माध्यम से जीवन में प्रवेश कर जाती हैं। शरीर में एक विशेष प्रकार के जीवाणु पाये पाये जाते हैं जो कि इन घातक विषाणुओं को नष्ट कर डालते हैl

ठीक इसी प्रकार क्षमाशीलता एक ऐसा व्यवहारिक गुण है जो व्यक्ति के समस्त दुर्गुणों के परिमार्जन में सहहायक होता है। यदि व्यक्ति सामने वाले व्यक्ति को क्षमा करता है तो सामने वाला व्यक्ति भी उसे क्षमा करता है जिससे कि विवाद नहीं होता है और विषमता की स्थिति नहीं रहती है। बहुत सारी गलतियां प्रत्यक्ष होती हैं और बहुत सारी गलतियां अप्रत्यक्ष होती हैं] प्रत्यक्ष गलतियों के लिए तो व्यक्ति चाहे तो क्षमा माँग सकता है किन्तु अप्रत्यक्ष गलतियों के क्षमा का क्या उपाय! सम्भवतः इन्हीं अप्रत्यक्ष गलतियों के क्षमा के लिए विद्वानों ने प्रार्थनाएं बनायीं हैं l

क्योंकि सभी प्रार्थनाएं एक सर्वशक्तिमान ईश्वर की स्तुति करतीं हैं। व्यक्ति के अहंकार को तोड़कर एक सर्वशक्तिमान सत्ता में विश्वास उत्पन्न करने की प्रेरणा देती हैं।  इस व्रह्मांड में ज्ञान का अनन्त भंडार है। इस संसार के किसी व्यक्ति] वस्तु या स्थान को उसके मूल रुप में जानने] पहचानने एवं परिभाषित करने की क्षमता को ज्ञान कहा जा सकता है। जिस व्यक्ति के अन्दर यह क्षमता जितनी अधिक मात्रा में होती है वह उतना ही बड़ा ज्ञानी होता है। ज्ञान अथवा ज्ञानी किसी परिस्थिति के आश्रित नहीं होते हैं] इस संसार के प्रत्येक वस्तु में ज्ञान है। व्यक्ति प्राकृतिक रुप से भी ज्ञानी हो सकता है और पठन-पाठन] मनन-चिन्तन के अभ्यास के द्वारा भी ज्ञान प्राप्त कर सकता है। जिस व्यक्ति के अन्दर जितना ज्ञान होता है उसी के अनुरुप वह किसी व्यक्ति] वस्तु अथवा स्थान की व्याख्या करता है।

एक ही विषय पर दो व्यक्तियों के मत अलग-अलग इसलिए हो जाते हैं] क्योंकि उनसें ज्ञान का स्तर भिन्न-भिन्न होता है] किन्तु दो व्यक्तियों में विवाद या झगड़ा इसलिए होता है क्योंकि उनमें ज्ञान का अहंकार होता है। ज्ञान में अहंकार उसी प्रकार मिश्रित होता है जिस प्रकार दूध में पानी। वास्तविक ज्ञानी हंस के समान होता है जो ज्ञान तो प्राप्त करता है किन्तु उसके साथ मिश्रित अहंकार त्याग देता है। अहंकार रहित ज्ञान ही आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग है जिस पर चलता हुआ व्यक्ति ईश्वर साक्षात्कार के लक्ष्य तक पहुँचता है।     ज्ञान प्राप्त करना और ज्ञान का प्रयोग सही दिशा में करना] ये दोनों दो बातें हैं। ज्ञान प्राप्त कर उसका सही दिशा में प्रयोग सभी लोग नहीं कर पाते हैं] अनेकों शिक्षित व्यक्तियों को अनैतिक कार्य करते हुए पकड़े जाना इस वात का प्रमाण है। मस्तिष्क ज्ञान का एक ऐसा केन्द्र होता है जिसमें असिमित ज्ञान संचित होता है। मस्तिष्क में संचित ज्ञान को जागृत करना एवं उसका सही दिशा में प्रयोग करना ही सम्पूर्ण शिक्षा पद्धति का उद्देश्य है। इस व्रहमांड के निर्माता ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में ज्ञान का असीम भंडार संचित किया है] जो व्यक्ति जितनी ही अधिक मात्रा में इस ज्ञान को जागृत कर पाता है l

वह उतना ही बड़ा ज्ञानी बन जाता है। ज्ञान प्राप्त करने जैसी कोई वस्तु नहीं है बल्कि एक आत्मिक एवं मानसिक जागरण की प्रक्रिया है। ज्ञान किसी भी व्यक्ति द्वारा प्राप्त नहीं किया जाता है] बल्कि उसके मस्तिष्क में प्राकृतिक रुप से संचित ज्ञान के पिटारे को किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा खोल दिया जाता है। ज्ञान के पिटारे को जिस व्यक्ति के द्वारा खोला जाता है उसे ही गुरु कहा जाता है। गुरु का तात्पर्य एक ऐसे व्यक्ति से होता है जो एक प्रज्वलित दीप के समान होता है जो कि दूसरे दीप में संचित प्रकाश की शक्तियों को जागृत कर उसे स्वयं के सदृश प्रकाशमान बना देता है। एक ज्ञानी एवं एक अज्ञानी व्यक्ति के अन्तर को यूँ समझा जा सकता है जैसा एक जलता हुआ दीप एवं एक जलने की प्रतिक्षा में पड़ा हुआ दीप। एक जलते हुए दीप की एकमात्र सार्थकता अपने परिवेश को प्रकाशित करने में है] इसी प्रकार एक ज्ञानी व्यक्ति की सन्पूर्ण कार्य कुशलता एक अज्ञानी व्यक्ति को ज्ञान प्रदान करने तथा उसका सही मार्गदर्शन करने में है। ज्ञानी व्यक्ति की यही पहचान है कि उसकी कार्यकुशलता उसके सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति को भी कार्यकुशल बना देती है]

ऐसा ही व्यक्ति वास्तव में किसी व्यक्ति का गुरु होता है।पिछले कुछ दशकों में जिस तेजी से राजनीतिक] सामाजिक] आर्थिक] वैज्ञानिक] एवं कृषि सम्बन्धी प्रगति हुई है] निश्चय ही वह बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इस प्रगति के साथ-साथ कुछ सवाल भी खड़े हुए हैं जिनका उपयुक्त हल ढ़ूढ़ना भी आवश्यक है। क्या भौतिक प्रगति की आड़ में नैतिक मुल्यों को नहीं झोंका जा रहा हैं\ वैयक्तिकता की आड़ में नैतिकता नंगा नहीं हो रहा है \ राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता पर वार नहीं हो रहा है \ राजनीतिक  धार्मिक अथवा सामाजिक उन्मादता को बढ़ावा नहीं मिल रहा l

क्या अपनी प्राचीन संस्कृति की अच्छी शिक्षाओं को भी नजरअन्दाज नहीं किया जा रहा \ क्या व्यक्तिगत उत्थान की सोच सामाजिक उत्थान की सोच पर हावी नहीं होती जा रही है \ ऐसे सैकड़ों सवाल हैं जिनका उपयुक्त हल ढ़ूढ़े बिना चाहे जितना भी प्रगति हो जाए अधूरा ही रहेगा। यह विचार करना आवश्यक है कि मनुष्यता के लिए उपयुक्त समाज का निर्माण हो रहा है या मनुष्य की अमानुषिक आसक्ति अनुसार साधनों का उपाय।    समस्त कर्मों का लक्ष्य है इन्द्रियों में अनासक्ति पैदा करना] और अनासक्त इन्द्रियों द्वारा किया गया कर्म ही जीवन का सार है। उच्च तकनीक के कारण अत्यन्त ही तीव्र गति से समाज विकसित हुआ है और विचार की दिशा और दशा परिवर्तित हुई है। तीव्र विकास की उपलब्धियों के बीच कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ अवश्य हैA जहाँ साधनों का अभाव है वहाँ तो असन्तोष है ही] जहाँ साधनों का अधिकता है वह स्थान भी असंतोष से अछूता नहीं है।    अनेकों कर्म योगों का ईजाद होता है l

कर्म के माध्यम से इन्द्रियों में अनासक्ति पैदा करने के लिए] लेकिन साधनों की भूख ऐसी है कि बढ़ती ही जाती है। यही कारण है कि इस बाजार के साधन योग के माध्यम होते हुए भी भोग के साधन बन जाते हैं और विरले ही किसी को इस मार्ग से आत्म-ज्ञान प्राप्त हो पाता है। व्यक्ति भोग के माध्यम से भव सागर से मुक्ति के मार्ग की तलाश करता है किन्तु वह भोग के दलदल में ऐसा सिर तक फँस जाता है कि उसका उसमें से निकलना मुश्किल हो जाता है। जब तक कीचड़ सिर के नीचे होता है व्यक्ति इन कुवासनाओं को ही स्वर्ग समझता रहता है लेकिन जब कीचड़ सिर से उपर उठना प्रारम्भ होता है तो उसे घुटन महशूश होता है और वह बाहर निकलने के लिए हाथ पाव मारना प्रारम्भ करता है लेकिन तब तक इतनी देर हो जाती है कि उसका बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है और वह अगले जन्म की शुरुआत भी असंतोष के साथ करता है। बात-बात पर फैलता असंतोष इस तथ्य की ओर इंगित करता है कि भौतिक स्तर पर चाहे कितना भी विकास हो जाए] शरीर से भी सूक्ष्म स्तर पर कहीं न कहीं कुछ न कुछ है जिसके ह्रास की स्थिति में अथवा अनुपलब्धता की स्थिति में सम्पूर्ण विकास अधूरा होता है।    कर्म जीवन का अभिन्न अंग है l

कर्म की नियति अत्यन्त ही गूढ़ है] प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कर्म स्वतः एवं स्वाभाविक रुप से जुड़ा हुआ है। व्यक्ति के कर्म की पवित्रता उसके पवित्र विचारों पर निर्भर करती है। समस्त साधन व्यक्ति की मानसिक शुद्धता के दृष्टिकोण से विकसित किए गये हैं। प्रायः ऐसा भी देखने में आता है कि व्यक्ति साधनों का अर्थ ही नहीं समझ पाते हैं और उसका दुरुपयोग भी करते हैं अतः जो साधन जीवन के उद्धारक होते हैं वही साधन व्यक्ति के जीवन के नाशक बन जाते हैं। साधनों के माध्यम से जीवन को मोह के बन्धन से मुक्त कर पाने में ही साधनों की सार्थकता है न कि साधनों के दासता में।    यह समस्त व्रह्मांड एक प्रयोगशाला है जिसमें कि आदि शक्ति के द्वारा अनेक प्रकार के प्रयोग किए जाते हैं। जिस प्रकार वैज्ञानिकों के द्वारा अनेक प्रकार के यन्त्रों का आविष्कार किया जाता है तथा उन यंत्रों के माध्यम से विभिन्न प्रकार के प्रयोग किए जाते हैं और नई-नई वस्तुओं की खोज होती है] उसी प्रकार परमपिता परमेश्वर] अनेकों प्रकार के जीव-जन्तु] पेड़-पौधों आदि की उत्पत्ति करता है] तत्पश्चात इनके माध्यम से अनेकों प्रकार के प्रयोग करता है और शक्ति निरुपण की नई सम्भावनाओं की तलाश करता है। शिव पुराण के अनुसार] आदि शक्ति की इच्छा हुई एक होने की तो शिव की उत्पत्ति हुई] उस एक की इच्छा हुई अनेक होने की तो व्रह्मा और विष्णु की उत्पत्ति हुई] तत्पश्चात उनके इच्छा अनुरुप समस्त व्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। इस दृष्टिकोण से आदि शक्ति की इच्छा ही समस्त व्रह्मांड की उत्पत्ति]

कर्म एवं विनाश का मूल है] अतः इस संसार में जो भी घटित होता है उस आदि शक्ति इच्छा के अनुरुप ही होता है। शिवपुराण में लिखित एक कहानी है] एक बार व्रह्मा एवं विष्णु में एक दूसरे से ज्यादा शक्तिशाली होने का अहंकार हो गया] दोनों लोगों ने मिलकर यह निश्चित किया कि दोनों में से जो पहले सृष्टि के ओर-छोर का पता लगा लेगा वह ज्यादा शक्तिशाली होगा। इस कार्य में दोनों ही लोग असफल रहे, दोनों लोगों का अहंकार टूट गया। दोनों लोगों ने तपस्या किया शिव का दर्शन प्राप्त किया तथा उनके द्वारा अपने-अपने कर्मों का मार्गदर्शन प्राप्त किया। तत्पश्चात व्रह्मा ने इस सृष्टि का निर्माण किया] तथा विष्णु इसका पालन करते हैं। इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि] अहंकार किसी भी बात का] किसी भी परिस्थिति में] किसी के लिए भी उचित नहीं होता है। एक सत्य यह भी है कि] इस संसार में शायद  अहंकार के प्रभाव से कोई बचा हो] यह कभी न कभी किसी न किसी रुप में प्रत्येक व्यक्ति को व्याप ही लता है। किन्तु यह भी सत्य है कि अहंकार किसी का रहता भी नहीं है] टूट ही जाता है।    अहंकार पूर्ण जीवन और अहंकार रहित जीवन इन दोनों में अत्यन्त ही सूक्ष्म अन्तर होता है। समस्त कर्मों का मूल है इच्छा] इच्छा उत्पन्न होती है मन से और मन का सम्बन्ध है] समस्त इच्छाओं के मूल परमपिता परमेश्वर से। जिनका मन पवित्र एवं स्वच्छ होता है उनका मन स्पष्ट रुप से ईश्वर से जुड़ा रहता है तथा अतः उनकी इच्छाएं भी पवित्र होती हैँ अन्यथा इच्छाएं दुर्भावनायें होती हैं। अहंकार एवं ज्ञान में एक तुलनात्मक सम्बन्ध होता है। अहंकार का अभाव ही ज्ञान है] ज्ञान की पूर्णता अहंकार के पूर्ण रुप से नाश से ही सम्भव है।

ज्यों-ज्यों अहंकार का नाश होता है त्यों-त्यों ज्ञान स्वतः बढ़ता जाता है] और ज्यों-ज्यों अहंकार बढ़ता है त्यों-त्यों ज्ञान का  नाश भी स्वतः होता जाता है। इस संसार में कोई पूर्णतः अहंकार से मुक्त हो जाए ऐसा विरले ही सम्भव होता है] इसलिए कोई पूर्णतः ज्ञानी हो जाए ऐसा भी करोड़ों-अरबों में किसी एक के साथ घटित होता है। प्रायः अहंकार ही ज्यादा दृष्टिगत होता है] सामान्यतः कोई व्यक्ति अहंकार का पूर्णतः नाश कर सकता अतः वह पूर्ण ज्ञानी भी नहीं बन सकता है] अतः यदि अहंकार एवं ज्ञान में संतुलन स्थापित किया जा सके तो उसको ही अहंकार से मुक्ति माना जा सकता है। नदी के दोनों किनारे यदि अपने-अपने स्थान पर सही सलामत रहते हैं तो नदी में पानी सही एवं स्वाभाविक रुप से बहता है] इसी प्रकार जब अहंकार एवं ज्ञान का संतुलन बना रहता है तो विचार एवं भावों का प्रवाह भी स्वभाविक एवं सही रहता है जिससे व्यक्ति जीवन का वास्तविक एवं पवित्र उद्देश्य समझ पाता है और आत्म ज्ञान प्राप्त कर पाता है।


डॉ इन्दुशेखर उपाध्याय 

     पूर्व प्राचार्य एवं भूगोल विभागाध्यक्ष सन्त तुलसीदास पी जी कॉलेज कादीपुर सुलतानपुर

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