कैसा होता हैं ये प्रेम ? या सिर्फ यही प्रेम होता …

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“कुछ तुमने नहीं कहा..


तो कुछ मैं न कह सकी,मगर रूह ने रूह से बात की..न कोई वादा किया कभी…न मुझसे ही लिया कोई वादा..फिर भी साथ चलते रहे…कभी अल्फ़ाज़ की जरूरत नहीं रहीं..दिल ने दिल से मुलाकात की…..
कुछ प्रेम देह के पिंजर से अलग
रूह के अवसान के लिए होते हैंप्रेम अभिव्यक्ति का…….मोहताज नहीं होता…..सिर्फ रूह ही रूह की ..माहताब होती हैं……….
कैसा होता हैं ये प्रेम ?यासिर्फ यही प्रेम होता है…!”
    डॉक्टर वंदना मंडल